यूदीत का ग्रन्थ : अध्याय 1
1) महानगर नीनवे में अस्सूरियों पर शासन करने वाला राजा नबूकदनेजर के बाहरवें वर्ष की बात हैं। उस समय एकबतना में मेदियों पर अरफ़क्षद राज्य करता था।
2) (इस अरफ़क्षद ने एकबतना के चारों ओर तीन-तीन हाथ चौड़े और छः-छः हाथ लम्बे गढ़े पत्थरों से एक दीवार बनवायी थी। उसने वह दीवार सत्तर हाथ ऊँची और पचास हाथ चौड़ी बनवायी थी।
3) उसने फाटकों के ऊपर सौ-सौ हाथ ऊँची मीनारें बनवायी थी, जिसकी नींव साठ हाथ चौड़ी थी।
4) उसने फाटकों को सत्तर हाथ ऊँचा और चालीस हाथ चौड़ा बनवाया था, जिससे उसके रथ और पैदल सैनिक पंक्तिबद्ध हो कर बाहर जा सकें।)
5) उस समय राजा नबूकदनेजर ने उस विशाल मैदान में, जो रागौ के प्रान्त में है, राजा अरफ़क्षद के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।
6) पहाड़ी प्रदेश के सब निवासियों ने, फ़रात, दजला और हिदास्पिस के तटों पर तथा एलामियों के राजा अर्योक के अधीनस्थ मैदानों के निवासी, सभी लोगों ने उसका पक्ष लिया। खलेऊद के लोगों के विरुद्ध लड़ने के लिए अनेक राष्ट्र एकत्र हुए।
7) तब अस्सूरियों के राजा नबूकदनेजर ने फ़ारस के सभी निवासियों और पश्चिम दिशा में रहने वाले सब लोगों, किलीकिया, दमिश्क, लेबानोन, लेबानोन के सामने के भाग के निवासियों और समुद्रतट पर रहने वाले सब लोगों को,
8) करमेल और गिलआद में रहने वाले और ऊपरी गलीलिया के विशाल मैदान एस्द्रालोन में रहने वाले लोगों को
9) तथा समारिया और उसके नगरों में रहने वाले सब लोगों और यर्दन के उसपार येरुसालेम, बताने, खलूस, कादेश, मिस्र के नाले पर तफ़ने, रामसेस और गोशेन के समस्त प्रान्त में,
10) तानिस और मेमफ़िस के आगे ऊपरी प्रान्तों तक तथा मिस्र के और इथोपिया देश की सीमा तक के सब लोगों को सन्देश भेजा।
11) परन्तु उन सभी देशों के लोगों ने अस्सूरियों के राजा नबूकदनेजर के सन्देश पर ध्यान नहीं दिया और युद्ध में उसका साथ नहीं दिया। वे उस से नहीं डरते थे, क्योंकि वे उसे अपना अकेला शत्रु समझते थे। उन्होंने उसके दूतों को अपमानित किया और ख़ाली हाथ लौटा दिया।
12) इस पर नबूकदनेजर उन सभी देशों पर क्रुद्ध हो उठा। उसने अपने सिंहासन और अपने राज्य की शपथ खायी कि वह उन सभी देशों से, किलीकिया, दमिश्क और सीरिया से बदला लेगा और सब मोआबियों, अम्मोनियों, सारे यहूदिया और दोनों समुद्रों के तटों तक के सभी मिस्रवासियों को तलवार के घाट उतारेगा।
13) उसने सत्रहवें वर्ष अपनी सेना ले कर राजा अरफ़क्षद पर आक्रमण किया। उसने विजयी हो कर अरफ़क्षद की सारी पैदल सेना, उसकी सारी अश्वसेना और उसके रथों को पराजित किया और उसके सब नगरों पर अधिकार कर लिया।
14) उसने एकबतना पहुँच कर उसके बुजोर्ं को जीता, उसके बाजार लूटे और उसकी शोभा मिट्टी में मिला दी।
15) फिर उसने रागौ के पर्वतों में अरफ़क्षद को पकड़ा और उसे अपनी साँगों से छेद कर उसका सदा के लिए सर्वनाश कर दिया।
16) इसके बाद वह और उसकी विशाल सेना लूट का माल साथ ले कर नीनवे लौट आयी। वहाँ उसने और उसकी सेना ने विश्राम किया और एक सौ बीस दिन तक दावत उड़ाता रहा।
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