मक्काबियों का पहला ग्रन्थ : अध्याय 9
1) इसी बीच देमेत्रियस ने सुना कि निकानोर और उनकी सेना युद्ध में हार गयी है। तब उसने बक्खीदेस और अलकिमस को फिर यूदा में भेजने का निश्चय किया और उसने उन्हें सेना का पार्श्व-भाग दिया।
2) वे गलीलिया हो कर चल पड़े और अरबेला के मैसालोथ पहुँचे। उन्होंने उसे अधिकार में कर लिया और बहुत लोगों का वध किया।
3) वे एक सौं बावनवें वर्ष के पहले महीने येरुसालेम के सामने आ पहुँचे।
4) वहाँ से वे बीस हजार पैदल सैनिक और दो हजार घुड़सवार ले कर बरेआ की ओर आगे बढे।
5) इधर तीन हजार चुने हुए योद्धाओं को ले कर यूदाह एलासा के पास पड़ाव डाले पड़ा था।
6) जब उसके आदमियों ने एक विशाल सेना को आते देखा-सचमुच वह सेना बहुत बड़ी थी-तो वे बहुत अधिक डर गये। बहुत-से लोग पड़ाव से भाग गये। उन में केवल आठ सौ रह गये।
7) जब यूदाह ने देखा कि उसकी सेना भाग रही है और लडाई एकदम सिर पर आ गयी है, तो उसका साहस टूट गया; क्योंकि अब लोगों को एकत्रित करने का समय भी नहीं था।
8) उसने निराशा में उन शेष लोगों से कहा, ''चलों हम अपने विरोधियों से लडने चलें। संभव है, हम उनका सामना कर सकें।''
9) लेकिन वे उस से असहमति प्रकट करते हुए कहने लगे, ''नहीं, हम असमर्थ हैं। इस बार हम अपने प्राणों की रक्षा की ही सोच सकते हैं। हम अपने भाइयों को ले कर शत्रुओं से लडने फिर लौटेंगे। हमारी संख्या बहुत थोड़ी रह गयी है।''
10) यूदाह ने कहा 'ऐसा नहीं होगा! हम उन्हें पीठ क्यों दिखायें? मरना ही है, तो हम अपने भाइयों के लिए लडते हुए मरे। हम अपने सम्मान पर आँच क्यों आने दें?''
11) उस समय शत्रुओं की सेना उनका मुकाबला करने के लिए पडाव से बाहर आ रही थी। उनके घुडसवार दो दलों में विभक्त थे, गोफन चलाने वाले और तीर चलाने वाले लोग सेना में आगे-आगे चल रहे थे। सर्वोत्तम सैनिक सब से आगे थ। बक्खीदेस दाहिन ओर था।
12) सैनिक दल तुरहियाँ बजाते हुए दोनों ओर से आगे बढ रहे थे। इधर यूदाह के लोगों ने भी तुरहियाँ बजायीं। सेनाओं के कोलाहल से पृथ्वी हिल उठी।
13) लड़ाई सबेरे से शाम तक चलती रही।
14) जब यूदाह ने देखा कि बक्सीदेस और उसकी सेना का प्रधान अंग दाहिनी ओर है, तो उसने अपने सब साहसी लोगों को अपने पास बुलाया।
15) और उन्होंने उस दाहिये अंग को पीस डाला। वे उन्हें अजोत की पहाड़ियों तक खदेड ले गये।
16) जब बायीं ओर से सैनिकों ने देखा कि दाहिना अंग पिस रहा है, तो वे मूड़ कर यूदाह और उसके आदमियों का पीछा करने गये।
17) घमासान युद्ध हुआ और दोनों ओर से बहुत-से लोग मारे गये।
18) यूदाह भी खेत रहा। शेष लोग भाग खड़े हुए।
19) तब योनातान और सिमोन अपने भाई यूदाह को उठा कर ले गये और उन्होंने उसे मोदीन के अपने पूर्वजों के क़ब्रिस्तान में दफनाया।
20) उन्होंने उसके लिए शोक मनाया और इस्राएल भर के लोगों ने उसके लिए विलाप किया। वे उसके लिए कई दिनों तक शोक मनाते और कहते रहे,
21) ''यह वीर योद्धा कैसे मारा गया? यही तो इस्राएल का उद्धारक था!''
22) यूदाह का शेष इतिहास, उसकी लड़ाइयाँ और उसके द्वारा किये गये वीरता के कार्य तथा उसकी महत्ता-वह सब लिखित नहीं है, क्योंकि वह अपार है।
23) यूदाह की मृत्यु के बाद विधर्मी इस्राएल भर में फिर दिखाई पड़ने लगे।
24) उन दिनों घोर अकाल पड़ा और लोगों ने उनका साथ दिया।
25) बक्खीदेस ने विधर्मियों को चुन-चुन कर उन्हें देश का अधिकारी बनाया।
26) वे यूदाह के समथकों को ढूँढ-ढूँढ कर बक्सीदेस के पास ले जाते और बक्सीदेख उन्हें दण्ड देता और उनकी हँसी उड़ाता था।
27) इस तरह इस्राएल की स्थिति ऐसी दुःखद हो गयी, जैसी वह तब से कभी नहीं हुई थी, जब से उनके यहाँ कोई नबी नहीं था।
28) इसलिए यूदाह के सभी मित्रों ने आ कर योनातान से कहा,
29) ''जब से आपके भाई यूदाह की मृत्यु हुई, उनके समान ऐसा कोई नहीं रहा, जो शत्रुओं के विरुद्ध, बक्खीदेस और हमारी जाति के विरोधियों से युद्ध कर सके।
30) इसलिए आज हम आपका चुनाव करते है, जिससे आप यूदाह के स्थान पर हमारे नेता बनें और हमारी ओर से युद्ध करें।''
31) योनातान ने उसी समय नेता बनना स्वीकार कर लिया और अपने भाई यूदाह का पद ग्रहण किया।
32) जैसे ही बक्खीदेस को इस बात का पता चला, वह उसकी हत्या करने की सोचने लगा,
33) जब योनातान, उसके भाई सिमोन और उनके सभी साथियों को यह बात मालूम हुई, तो वे तकोआ के उजाडखण्ड की ओर भाग गये और उन्होंने अस्फारकुण्ड के पास पड़ाव डाला।
34) बक्खीदेस को विश्राम के दिन इसका पता चल गया और वह अपनी सारी सेना ले कर यर्दन पार कर गया।
35) इधर योनातान ने अपने एक भाई को युद्ध की सामग्री के साथ अपने मित्र नबातैयी लोगों के पास भेजा और उन से निवेदन किया कि वे वह विपुल सामग्री अपने पास सुरक्षित रखें।
36) किंतु मेदेबा से यमब्री लोगों ने छापा मार कर योहन को गिरफ्तार किया और उसका सारा सामान ले लिया। इसके बाद वे अपनी लूट के साथ लौटे।
37) योनातान और उसके भाई सिमोन को कुछ ही दिनों बाद मालूम हुआ कि यमब्री लोगों के यहाँ भारी धूमधाम से विवाह हो रहा है और प्रतिष्ठित सामन्त की कन्या नदाबाय से विशाल बारात के साथ लायी जा रही है।
38) उन्हें अपने भाई योहन की हत्या की याद आयी और उन्होंने जा कर अपने को पहाड़ियों में पीछे छिपा लिया।
39) जब उन्होंने आँखे उठायी तो यह देखा कि भारी धूमधाम से बड़ी भीड चली आ रही है। वर, उसके मित्र और उसके भाई बाजों, संगीतकारों और बहुत-से अस्त्र-शस्त्रों के साथ उनकी ओर आ रहे हैं।
40) तब वे ओट से उन पर टूट पड़े और उन को मार गिराया। बहुत लोग मारे गये और शेष पहाडियों पर भाग खड़े हुए। उन्होंने उनका सारा सामान लूट लिया।
41) विवाह शोक में और उनका वाद्य-संगीत विलाप में बदल गया।
42) इस तरह उन्होंने अपने भाई की हत्या का बदला लिया और वे फिर यर्दन के निकट की दलदल भूमि में लौट आये।
43) बक्खीदेस को इसका पता लगा। वह एक विशाल दलबल के साथ यर्दन तट पर आया। वह दिन विश्राम-दिवस था
44) योनातान ने अपने आदिमयों से कहा, ''चलो, हम जा कर अपने प्राण-रक्षा के लिए लडें। आज हमारी स्थिति वही नहीं रही, जो कल तक थी।
45) हम पर सामने से या पीछे से आक्रमण हो सकता है। हमारे एक ओर यर्दन फैली है, दूसरी ओर दलदल है, झाडिया है। भाग निकलने का कोई उपाय नहीं।
46) अब स्वर्ग के ईश्वर की दुहाई करो, जिससे तुम शत्रुओं के हाथ से बच निकलो।''
47) युद्ध आरंभ हुआ। योनातान ने बक्खीदेस को मार गिराने के लिए हाथ उठाया, लेकिन वह पीछे हट गया।
48) तब योनातान और उसके आदमी यर्दन के जल में कूद पडे जिससे वे तैर कर उस पार हो जायें। शत्रुओं ने उनका पीछा नहीं किया, वे यर्दन पार नहीं गये।
49) उस दिन बक्सीदेस के लगभग एक हजार आदमी मारे गये।
50) तब वह येरुसालेम की ओर चल पडा और उसने यहूदिया के अनेक किलाबंद नगरों का निर्माण किया। उसने येरोखों, अम्माऊस, बेत-होरोन, बेतेल, थमनाथा, फारथोन और तेफोन के गढ बनवाये और उन्हें ऊँची दीवारों, फाटकों और अर्गलाओं से सुदृढ़ किया।
51) उन सब में उसने एक सेना-दल रखा, जिससे वह इस्राएल पर छापा मारता रहे।
52) उसने बेत-सूर और गेजेर नगरों और (येरुसालेम के) गढ को भी सुदृढ़ किया तथा उन में सैनिक और खाद्य-सामग्री रखी।
53) उसने देश के कुलीन पुत्रों को पकड कर और येरुसालेम के गढ में बंद कर बंधक के रूप में रखा।
54) अलकिमस ने एक सौ तिरपनवें वर्ष के दूसरे महीने में मंदिर की भीतरी आंगन की दीवार गिराने की आज्ञा दी। उसने नबियों द्वारा निर्मित भवन का विनाश करना चाहा। जैसे ही विध्वंस शुरू हुआ,
55) अलकिमस को दौरा पड़ा और काम रूक गया। अलकिमस का मुँह बंद हो गया उसे ऐसा लकवा मार गया कि वह न एक शब्द बोल सकता था और न अपनी गृहस्थी के विषय में कोई आदेश दे सकता था।
56) अलकिमस का कष्ट बढ़ता गया और उन्हीं दिनों उसकी मृत्यु हो गयी।
57) जब बक्खीदेस ने देखा कि अलकिमस की मृत्यु हो गयी हैं, तो वह राजा के पास लौट गया। इसके बाद यूदा में दो साल तक शांति रही।
58) इसके बाद विधर्मियों ने मिल कर यह कहते हुए परामर्श किया, ''देखो, योनातान और उसके आदमी शांति का जीवन बिताते हैं और अपने को सुरक्षित समझते हैं अब हम बक्सीदेस को बुलायें। वह रात भर में ही सब को पकड लेगा''।
59) इसलिए वे उसके पास गये और उसे ऐसा करने का परामर्श दिया।
60) बक्खीदेस ने एक बड़ी सेना ले कर चलने का निश्चय किया। उसने यहूदिया में अपने मित्रों के पास छिपे तौर पर चिट्ठियाँ भी लिख भेजी, जिससे वे योनातान और उसके दल को पकड लें। किंतु वे ऐसा नहीं कर सके, क्योंकि उन लोगों को इस बात का पता चल गया था।
61) बल्कि इसके विपरीत योनातान के लोगों ने ही यह षड्यंत्र रचने वालों के लगभग पचास आदमियों को पकड कर मार डाला।
62) इसके बाद योनातान और सीमोन अपने सारे लोग के साथ बेत-बासी गये, जो उजाडखण्ड में अवस्थित नगर है। उसने वहाँ खडहरों को फिर से बसाया और उन्होंने उस नगर को सुदृढ़ किया।
63) जब बक्खीदेस को इस बात का पता चला, तो उसने अपनी सारी सेना एकत्रित की और यहूदिया से भी आदमी बुलाये।
64) उसने आ कर बेत-बासी को घेर लिया और बहुत दिनों तक उसके लिए युद्ध करता रहा और उसने युद्ध-यंत्र बनवाये।
65) योनातान ने अपने भाई सिमोन को नगर में ही छोड़ दिया और कुछ आदमियों को लेकर खुले मैदान में निकल पड़ा।
66) उसने अदोमेर और उसके भाई-बंधुओं को हराया और फरीसी लोगों के शिविर में घुस कर उन्हें पराजित किया। इन विजयों के फलस्वरूप उसकी सेना की वृद्धि होती गयी।
67) उधर सिमोन और उसके आदमी नगर के बाहर टूट पड़े और युद्ध यंत्र जला डाले। वे बक्खीदेस के विरुद्ध लड़ते रहें,
68) जो बुरी तरह हार गया और अपनी योजना की असफलता देख कर बहुत उदास हुआ।
69) इसलिए उसका क्रोध उन विधर्मियों पर भड़क उठा, जिन्होंने उसे यहाँ बुलाया था। उसने उन में से बहुतों को मार डाला और अपने लौट जाने का निश्चय किया।
70) जब योनातान को इसका पता चला, तो उसने उसके पास दूत भेजे, जिससे वे उसके साथ संधि कर लें और युद्धबंदियों को लौटाने का प्रबंध करें
71) बक्खीदेस ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर उसके अनुसार कार्य किया और यह शपथ खायी कि वह आजीवन उसकी हानि नहीं करेगा।
72) वह युद्धबंदी लौटा कर अपने देश लौट गया उसने यह निश्चित किया कि वह उनके देश में फिर कभी नहीं आयेगा।
73) इस प्रकार इस्राएल में तलवार को विश्राम मिला। योनातान मिकास में रहने लगा और वहाँ रह कर लोगों का न्याय करता था। उसने इस्राएल के समस्त विधर्मियों का वध किया।
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