स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 11
1) मैं प्रभु की शरण आया हूँ; तुम मुझ से कैसे कह सकते हो : ''पक्षी की तरह पर्वत पर भाग जाओ''?
2) देखो, अंधेरे में निष्कपट लोगों को मारने के लिए दुष्ट जन धनुष चढ़ाते और प्रत्यंचा पर बाण साधते हैं।
3) यदि नींव उखाड़ दी गयी है, तो धर्मी क्या कर सकेगा!
4) प्रभु अपने मन्दिर में विराजमान है, प्रभु का सिंहासन स्वर्ग में है। वह संसार को देखता रहता और मनुष्यों पर दृष्टि दौड़ाता है।
5) प्रभु धर्मी और विधर्मी, दोनों की परीक्षा लेता है। वह अत्याचारी से घृणा करता है।
6) वह दुष्टों पर जलते अंगारे और गन्धक बरसाये, उन्हें झुलसाने वाली लू झेलनी पड़े;
7) क्योंकि प्रभु न्यायी हैं और न्याय के कार्य उसे प्रिय हैं। जो निष्कपट हैं, वे उसके मुख के दर्शन करेंगे।
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