स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 16
1) प्रभु! मैं तेरी शरण आया हूँ, मेरी रक्षा कर।
2) मैं प्रभु से कहता हूँ, ''तू ही मेरा ईश्वर है। तुझ में ही मेरा कल्याण है।''
3) पृथ्वी के तथाकथित शक्तिशाली देवताओं से मुझे कल्याण की आशा नहीं।
4) उनकी मूर्तियों असंख्य हैं, सब उनकी पूजा करने दौड़ते हैं। मैं उन्हें रक्त-बलि नहीं चढ़ाऊँगा, मैं प्रार्थना में उनका नाम नहीं लूँगा।
5) प्रभु! मेरे सर्वस्व और मेरे भाग्य! तू ही मुझे संभालता है।
6) मेरा दायभाग बहुत रमणीय है, वह मुझे आनन्द प्रदान करता है।
7) मैं अपने परामर्शदाता ईश्वर को धन्य कहता हूँ। रात को भी मेरा अन्तःकरण मुझे पथ दिखाता है।
8) मैं प्रभु को सदा अपनी आँखों के सामने रखता हूँ। वह मेरे दाहिने विराजमान हैं, मैं विचलित नहीं होऊँगा।
9) मेरे हृदय में आनन्द है और मेरी आत्मा में उल्लास, मेरा शरीर भी सुरक्षित है;
10) क्योंकि तू मेरी आत्मा को अधोलोक में नहीं छोड़ेगा, तू अपने भक्त को कब्र में गलने नहीं देगा।
11) तू मुझे जीवन का मार्ग दिखायेगा, तेरे साथ रह कर परिपूर्ण आनन्द प्राप्त होता है और तेरे दाहिने सदा के लिए सुख-शान्ति।
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