स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 32
1) धन्य है वह, जिसका अपराध क्षमा हुआ है, जिसका पाप मिट गया है!
2) धन्य है वह जिसे ईश्वर दोषी नहीं मानता, जिसका मन निष्कपट है!
3) जब तक मैं मौन रहा, तब तक मेरे निरन्तर कराहने से मेरी हड्डियाँ छीजती रहीं;
4) क्योंकि दिन-रात मुझ पर तेरे हाथ का भार था। मेरा शक्ति-रस मानो ग्रीष्म के ताप से सूखता रहा।
5) मैंने तेरे सामने अपना पाप स्वीकार किया, मैंने अपना दोष नहीं छिपाया। मैंने कहा, ''मैं प्रभु के सामने अपना अपराध स्वीकार करूँगा''। तब तूने मेरे पाप का दोष मिटा दिया।
6) इसलिए संकट के समय प्रत्येक भक्त तुझ से प्रार्थना करता है। बाढ़ कितनी ऊँची क्यों न उठे, किन्तु जलधारा उसे नहीं छू पायेगी।
7) प्रभु! तू मेरा आश्रय है। तू संकट से मेरा उद्धार करता और मुझे शान्ति के गीत गाने देता है।
8) मैं तुझे शिक्षा दूँगा, तुम को मार्ग दिखाऊँगा; तुम्हें परामर्श दूँगा और तुम्हारी रक्षा करूँगा।
9) नासमझ घोड़े या खच्चर-जैसे न बनो, जिन्हें लगाम और रास से बाध्य करना पड़ता है; नहीं तो वे तुम्हारे वश में नहीं आते।
10) दुष्ट को बहुत से दुःख झेलने पड़ते हैं, किन्तु जो प्रभु पर भरोसा रखता है, उसे प्रभु की कृपा घेरे रहती है।
11) धर्मियों! उल्लसित हो कर प्रभु में आनन्द मनाओ। तुम सब, जिनका हृदय निष्कपट है, आनन्द के गीत गाओ।
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