स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 4
2) (१-२) ईश्वर! मेरे रक्षक! मेरी पुकार का उत्तर दे। तूने मुझे सदा संकट से उबारा है। मुझ पर दया कर और मेरी प्रार्थना सुन।
3) मनुष्यों! कब तक अन्धे बने रहोगे? कब तक मोह में पड़ कर असत्य की खोज करते रहोगे?
4) समझ लो-प्रभु अपने भक्त के लिए अपूर्व कार्य करता है। वह सदा मेरी प्रार्थना सुनता है।
5) प्रभु पर श्रद्धा रखो! पाप से दूर रहो! शय्या पर मौन हो कर ध्यान करो।
6) प्रभु को योग्य बलिदान चढ़ाओ और उस पर भरोसा रखो।
7) कितने ही लोग कहते हैं : हमें सुख-शान्ति कहाँ से मिलेगी? प्रभु! हम पर दयादृष्टि कर!
8) जो आनन्द तू मुझे प्रदान करता है, वह उस आनन्द से गहरा है, जो लोगों को अंगूर और गेहूँ की अच्छी फसल से मिलता है।
9) प्रभु! मैं लेटते ही सो जाता हूँ, क्योंकि तू ही मुझे सुरक्षित रखता है।
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