स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 51
3) (१-३) ईश्वर! तू दयालु है, मुझ पर दया कर। तू दयासागर है, मेरा अपराध क्षमा कर।
4) मेरी दुष्टता पूर्ण रूप से धो डाल, मुझ पापी को शुद्ध कर।
5) मैं अपना अपराध स्वीकार करता हूँ। मेरा पाप निरन्तर मेरे सामने है।
6) मैंने तेरे विरुद्ध पाप किया है। मैंने वही किया, जो तेरी दृष्टि में बुरा है; इसलिए तेरा निर्णय सही और तेरी दण्डाज्ञा न्यायसंगत है।
7) मैं तो जन्म से ही अपराधी, अपनी माता के गर्भ से ही पापी हूँ।
8) तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है। मेरे अन्तःकरण को ज्ञान की बातें सिखा।
9) मुझ पर जूफ़ा से जल छिड़क दे और मैं शुद्ध हो जाऊँगा।
10) मुझे आनन्द और उल्लास का सन्देश सुना और तुझ से रौंदी हुई हड्डियाँ फिर खिल उठेंगी।
11) मेरे पापों पर दृष्टि न डाल, मेरा अपराध मिटाने की कृपा कर।
12) ईश्वर! मेरा हृदय फिर शुद्ध कर और मेरा मन फिर सुदृढ़ बना।
13) अपने सान्निध्य से मुझे दूर न कर, अपने पवित्र आत्मा से मुझे वंचित न कर।
14) मुक्ति का आनन्द मुझे फिर प्रदान कर, उदारता में मेरा मन सुदृढ़ बना।
15) मैं अपराधियों को तेरे मार्ग की शिक्षा दूँगा और पापी तेरे पास लौट आयेंगे।
16) ईश्वर! तू मेरे मुक्तिदाता! मेरा उद्धार कर और मैं तेरी भलाई का बखान करूँगा।
17) प्रभु! मेरे होंठ खोल दे और मेरा कण्ठ तेरा गुणगान करेगा।
18) तू बलिदान से प्रसन्न नहीं होता। यदि मैं होम चढ़ाता, तो तू उसे अस्वीकार करता।
19) मेरा पश्चाताप ही मेरा बलिदान होगा। तू पश्चातापी दीन-हीन हृदय का तिरस्कार नहीं करेगा।
20) प्रभु! सियोन पर दयादृष्टि कर, येरुसालेम की चारदीवारी फिर उठा
21) तब तू योग्य बलिदान - होम तथा पूर्णाहुति - स्वीकार करेगा और तेरी वेदी पर बछड़े चढ़ाये जायेंगे।
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