स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 56
2) (१-२) ईश्वर! मुझ पर दया कर। मुझ पर अत्याचार किया जाता है। एक व्यक्ति दिन भर मुझे तंग करता है।
3) मेरे शत्रु दिन भर मुझ पर अत्याचार करते हैं मेरे विरोधियों की संख्या बड़ी है।
4) सर्वोच्च प्रभु! जब मैं डरने लगता हूँ, तो तुझ पर भरोसा रखता हूँ।
5) मैं ईश्वर पर, जिसकी प्रतिज्ञा की स्तुति करता हूँ, मैं ईश्वर पर भरोसा रखता हूँ और नहीं डरता। निरा मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?
6) वे दिन भर मेरी निन्दा करते और मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र रचते हैं।
7) मुझे मारने के लिए वे मेरी घात में बैठे हैं और पग-पग पर मेरी निगरानी करते हैं।
8) इतनी बुराई करने पर भी क्या वे बच सकेंगे? प्रभु! तेरा क्रोध उन राष्ट्रों का विनाश करे।
9) मेरी विपत्तियों का विवरण और मेरे आँसुओं का लेखा तेरे पास है।
10) जिस दिन मैं तेरी दुहाई दूँगा, उस दिन मेरे शत्रुओं को पीछे हटना पड़ेगा। मुझे दृढ़ विश्वास है कि ईश्वर मेरे साथ है।
11) ईश्वर पर, जिसकी प्रतिज्ञा की स्तुति करता हूँ, प्रभु पर, जिसकी प्रतिज्ञा की स्तुति करता हूँ,
12) मैं ईश्वर पर भरोसा रखता हूँ और नहीं डरता। निरे मनुष्य मेरा क्या कर सकते हैं?
13) ईश्वर! मुझे अपनी मन्नतें पूरी करनी है। मैं तुझे धन्यवाद के बलिदान चढ़ाता हूँ,
14) क्योंकि तूने मुझे मृत्यु से बचाया, तूने मेरे पैरों को नहीं फिसलने दिया, जिससे मैं जीवन की ज्योति में प्रभु के सामने चलता रहूँ।
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