स्तोत्र ग्रन्थ : अध्याय 76
2) (१-२) ईश्वर ने अपने को यूदा में प्रकट किया। उसका नाम इस्राएल में महान् है।
3) सालेम में उसका शिविर है और सियोन में उसका निवास।
4) उसने वहाँ धनुष के बाणों को, शस्त्रों को, ढाल और तलवार को खण्ड-खण्ड कर दिया।
5) प्रभु! तू शक्तिशाली और प्रतापी है, शत्रुओं से लूटा माल पहाड़-जैसा ऊँचा है।
6) शूरवीर चिरनिद्रा में सो गये। उन सब योद्धाओं का बाहुबल नष्ट हो गया।
7) याकूब के ईश्वर! तेरी धमकी सुन कर रथ और युद्धाश्व निष्प्राण हो गये।
8) तू आतंकित करता है। जब तेरा क्रोध भड़क उठता है, तो तेरे सामने कौन टिक सकता है?
9) ईश्वर! जब तू न्याय करने और देश के दीन-दुखियों का उद्धार करने उठा,
10) जब तूने स्वर्ग से अपना निर्णय सुनाया, तो पृथ्वी भयभीत हो कर शान्त हो गयी।
11) विद्रोही एदोम तेरी स्तुति करेगा, हामाथ के बचे हुए लोग तेरे पर्व मनायेंगे।
12) मन्नतें मानो; उन्हें अपने प्रभु-ईश्वर के लिए पूरा करो। निकटवर्ती राष्ट्र तेजस्वी प्रभु को भेंट चढाने आयें;
13) क्योंकि वह शासकों का घमण्ड तोड़ता और पृथ्वी के राजाओं को आतंकित करता है।
पड़ें अध्याय - 7677787980