प्रज्ञा-ग्रन्थ : अध्याय 1
1) पृथ्वी के शासको! न्याय से प्रेम रखो। प्रभु के विषय में ऊँचे विचार रखो और निष्कपट हृदय से उसे खोजते रहो;
2) क्योंकि जो उसकी परीक्षा नहीं लेते, वे उसे प्राप्त करते हैं। प्रभु अपने को उन लोगों पर प्रकट करता है, जो उस पर अविष्वास नहीं करते।
3) कुटिल विचार मनुष्य को ईष्वर से दूर करते हैं। सर्वषक्तिमत्ता उन मूर्खों को पराजित करती है, तो उसकी परीक्षा लेते हैं।
4) प्रज्ञा उस आत्मा में प्रवेष नहीं करती, जो बुराई की बातें सोचती है और उस शरीर में निवास नहीं करती, जो पाप के अधीन है;
5) क्योंकि षिक्षा प्रदान करने वाला पवित्र आत्मा छल-कपट से घृणा करता है। वह मूर्खतापूर्ण विचारों को तुच्छ समझता और अन्याय से अलग रहता है।
6) प्रज्ञा मनुष्य का हित तो चाहती है, किन्तु वह ईषनिन्दक को उसके शब्दों का दण्ड दिये बिना नहीं छोड़ेगी; क्योंकि ईष्वर मनुष्य के अन्तरतम का साक्षी है। वह उसके हृदय की थाह लेता और उसके मुख के सभी शब्द सुनता है।
7) प्रभु का आत्मा संसार में व्याप्त है। वह सब कुछ को एकता में बाँधे रखता है और मनुष्य जो कुछ कहते हैं, वह सब जानता है।
8) इसलिए जो दुष्टतापूर्ण बातें करते हैं, वे छिप नहीं सकते और न्यायकर्ता उन्हें अवष्य दण्ड देगा।
9) दुष्ट की योजनाओं की जाँच की जायेगी और उसके शब्दों की आवाज प्रभु तक पहुँचेगी, जिससे उसे उसके अपराधों का दण्ड दिया जाये।
10) धर्मोत्साही कान सब कुछ सुनता है; धीमी फुसफुसाहट भी उस से नहीं छिप सकती।
11) इसलिए व्यर्थ फुसफुसाहट से बचते रहो; अपनी जीभ की परनिन्दा नहीं करने दो; क्योंकि गुप्त में कही बात व्यर्थ नहीं जाती और झूठ बोलने वाला मुख आत्मा का विनाष करता है।
12) अपने असंयम से मृत्यु को मत बुलाओ; अपने कर्मर्ाें से अपने विनाष का कारण मत बनो।
13) ईष्वर ने मृत्यु नहीं बनायी; वह प्राणियों की मृत्यु से प्रसन्न नहीं होता।
14) उसने सब कुछ की सृष्टि इसलिए की है कि वह अस्तित्व में बना रहे। संसार में जो कुछ है, वह हितकर है; उस में कहीं भी घातक विष नहीं। अधोलोक पृथ्वी पर शासन नहीं करता;
15) क्योंकि न्याय का कभी अन्त नहीं होगा।
16) दुष्टों ने अपने कर्मों और वचनों से अधोलोक को निमन्त्रण दिया। वे उसे मित्र समझ कर उसकी लालसा करते रहे उन्होंने उसके साथ सन्धि कर ली; इसलिए वे उसके षिकार बनने योग्य हैं।
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