प्रवक्ता-ग्रन्थ : अध्याय 32
1) यदि तुम को अध्यक्ष बनाया गया, तो मत इतराओ; अतिथियों के साथ उन में एक-जैसे आचरण करो।
2) दूसरों को सुव्यवस्थित करने के बाद बैठ जाओ। अपना कर्तव्य पूरा करने के बाद ही अपना आसन ग्रहण करो।
3) तुम उनके साथ आनन्द मनाओगे और अपने आतिथ्य-सत्कार के लिए तुम्हारा सम्मान होगा।
4) वयोवृद्ध! तुम उन को सम्बोधित करो, क्योंकि तुम उसके योग्य हो।
5) किन्तु सावधानी से अपने शब्दों का चयन करो और गायन-वादन में बाधा मत डालो।
6) दावत के समय देर तक भाषण मत करो और असमय अपनी प्रज्ञा का प्रदर्षन मत करो।
7) स्वर्ण आभूषण में जड़ी लाल मणि की तरह अंगूरी की दावत में वादन-गायन शोभा देता है।
8) मधुर अंगूरी के पान के समय सुरीला संगीत सोने के खाँचे में मरकत-मणि जैसा है।
9) मौन रह कर दूसरों की बात सुनो; तुम्हारे षिष्टाचार की प्रषंसा की जायेगी।
10) युवको! जरूरत पड़ने पर बोलो,
11) किन्तु दो बार पूछे जाने के बाद ही।
12) उस व्यक्ति की तरह, जो बहुत जानता, किन्तु कम बोलता है, तुम संक्षिप्त, बल्कि सारगर्भित भाषण दो।
13) बड़ों के बीच विनयी बनो और बूढ़ों के सामने कम बोलो।
14) मेघगर्जन से पहले बिजली चमकती है, इसी तरह विनम्र व्यक्ति के आगे सम्मान चलता है।
15) समय पर मेज से उठ कर वहाँ देर मत करो। सीधे अपने घर जा कर मनोरंजन करो।
16) वहाँ अपनी इच्छा के अनुसार समय बिताओ। और घमण्डपूर्वक बातों द्वारा पाप मत करो।
17) सब कुछ के लिए अपने सृष्टिकर्ता को धन्यवाद दो, जिसने तुम को इतने उपकार प्रदान किये।
18) जो ईष्वर पर श्रद्धा रखता है, वह उसकी षिक्षा स्वीकार करता है। जो प्रातः उसकी खोज करता, वह उसकी कृपा प्राप्त करता है।
19) जो संहिता का अनुषीलन करता, उसे तृप्ति मिलेगी; किन्तु जो उसका विरोध करता, वह उसके जाल में फँसता है।
20) जो प्रभु पर श्रद्धा रखते हैं, वे धर्म का मर्म समझेंगे और उनके सत्कर्म प्रकाष की तरह चमकेंगे।
21) पापी चेतावनी स्वीकार नहीं करता और आज्ञाओें का मनमाना अर्थ लगाता है।
22) (२२-२३) समझदार व्यक्ति सोच-विचार करता, किन्तु मूर्ख और घमण्डी कभी नहीं डरते।
24) पुत्र! सोच-विचार किये बिना कुछ मत करो और तुम बाद में नहीं पछताओगे।
25) ऊबड-खाबड़ रास्ते पर मत चलो और तुम पत्थरों से ठोकर नहीं खाओगे। अज्ञात मार्ग पर सँभल कर चलो और अपना जीवन जोखिम में मत डालो।
26) अपने पुत्रों से भी सावधान रहो और अपने नौकरों पर निगरानी रखो।
27) तुम सावधानी से अपने सभी कार्य करो। इस प्रकार तुम आज्ञाओं का पालन कर लोगे।
28) जो संहिता का ध्यान रखता, वह आज्ञाओें का पालन करता है। जो प्रभु पर भरोसा रखता, उसे कोई हानि नहीं होगी।
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