प्रवक्ता-ग्रन्थ : अध्याय 38
1) चिकित्सक का सम्मान करो, तुम को उसकी आवष्यकता है। सर्वोच्च प्रभु ने उसकी भी सृष्टि की है।
2) सर्वोच्च प्रभु से स्वास्थ्यलाभ होता और राजा की ओर से चिकित्सक को उपहार मिलता है।
3) चिकित्सक का उसके विज्ञान के कारण सम्मान किया जाता और बडे लोग उसकी प्रषंसा करते हैं।
4) प्रभु पृथ्वी से जड़ी-बूटियाँ उत्पन्न करता है और समझदार व्यक्ति उनकी उपेक्षा नहीं करता।
5) क्या पानी लकड़ी द्वारा मीठा नहीं बना,
6) जिससे मनुष्य प्रभु का सामर्थ्य पहचान सके?
7) उसने मनुष्योें को विज्ञान प्रदान किया है, जिससे वे उसके चमत्कारों के कारण प्रभु की महिमा करें।
8) चिकित्सक जड़ी-बूटियों द्वारा पीड़ा दूर करता हैं। भेषजज्ञ उनका मिश्रण तैयार करता है, जिससे प्रभु की कृतियाँ नष्ट न हों।
9) पुत्र! अपनी बीमारी में लापरवाह न बनो; प्रभु से प्रार्थना करो और वह तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेगा।
10) अपने अपराधों पर पष्चात्ताप करो, अपने हाथ निर्दोष रखो और अपना हृदय हर पाप से शुद्ध रखो।
11) सुगन्धयुक्त धूप एवं अन्न-बलि चढ़ाओ और शक्ति भर तेल का अर्पण करो। चिकित्सक को निवास दो,
12) क्योंकि प्रभु ने उसकी भी सृष्टि की है। वह तुम से दूर न जाये, क्योंकि तुम को उसकी जरूरत है;
13) क्योंकि कभी-कभी तुम्हारा स्वास्थ्य लाभ उनके हाथ में है।
14) वे भी प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें निदान पहचानने में और जीवन की रक्षा में सफलता प्रदान करें।
15) जो अपने सृष्टिकर्ता के सामने पाप करेगा, वह चिकित्सक के हाथोें पड़ेगा।
16) पुत्र! मृतक पर आँसू बहाओ और दुःखी हो कर विलाप करो। उसका शरीर योग्य रीति से दफनाओ और उसकी कब्र का ध्यान रखो।
17) फूट-फूट कर रोओ और विलाप करो।
18) लोगों की निन्दा से बचने के लिए एकाध दिन मृतक की योग्यता के अनुसार शोक मनाओ और इसके बाद अपना दुःख शान्त हो जाने दो;
19) क्योंकि शोक मृत्यु का कारण बन सकता है और मन का दुःख शक्ति घटाता है।
20) शोक विपत्ति में बना रहता है और दरिद्रता का जीवन हृदय के लिए अभिषाप है।
21) अपना हृदय शोक में मत डूबने दो, उसे हटाओ और अपनी अन्तगति पर विचार करो।
22) मृतक को भूल जाओ, वह लौट कर नहीं आयेगा। उसे तुम से कोई लाभ नहीं होता और तुम अपने को हानि पहुँचाते हो।
23) यह याद रखो कि उसकी गति तुम्हारी भी होगी- कल उसकी और आज तुम्हारी।
24) मृत्यु के बाद मृतक की स्मृति मिट जाने दो, उसके प्राण निकलने के बाद अपना दुःख शान्त होने दो।
25) अवकाष मिलने के कारण ही शास्त्री को प्रज्ञा प्राप्त होती है। जो काम-धन्धों में नहीं फँसा रहता, वही प्रज्ञ बन सकता है।
26) जो हल चलाता और घमण्ड से पैना भाँजता है, जो बैलोें को जोतता और उनके कामों में लगा रहता है, जो अपने साँड़ों की ही बात करता है, उसे प्रज्ञा कैसे प्राप्त हो सकती है?
27) वह हल की रेखा खींचने की चिन्ता करता रहता और रात में देर तक बछड़ों को चारा देता है।
28) यही हाल प्रत्येक षिल्पकार और हर कारीगर का है, जो दिन-रात अपने काम में लगा रहता है। यही हाल उन लोगों का है, जो मुद्राएँ उकेरते हैं और निरन्तर नयी आकृतियाँ बनाते रहते हैं। ऐसा व्यक्ति सच्ची प्रतिकृति बनाने मेें तल्लीन रहता और रात में देर तक अपनी कृति का परिष्कार करता है।
29) यही हाल लोहार का है, जो निकाई के पास बैठ मन लगा कर लोहे का काम करता है। आग की भाप उसका शरीर गलाती है; वह भट्टी की गरमी में परिश्रम करता रहता है।
30) हथोड़े की आवाज उसके कानों में निरन्तर गूँजती रहती है। उसकी आँखें अपनी कृति के नमूने पर टिकी रहती हैं।
31) यह दत्तचित्त हो कर अपने कार्य में लगा रहता। और रात में देर तक उसका परिष्कार करता है।
32) यही हाल कुम्हार का है, जो अपने चाक के पास बैठ कर उसे अपने पैरों से घुमाता रहता है। वह अपने काम पर निरन्तर ध्यान रखता और समय पर उसे पूरा करने की चिन्ता करता है।
33) वह अपने हाथों से मिट्टी के लोंदे बनाता और पैरों से उसे गूँधता है।
34) वह दत्तचित्त होकर बरतनों पर रोगन लगाता और रात में देर तक अपना आँवा साफ करता है।
35) इन सबों को अपने हस्तकौषल का भरोसा है। ये सभी अपने-अपने कार्य में निपुण हैं।
36) इनके बिना कोई भी नगर नहीं बसाया जा सकता।
37) इनके बिना यहाँ न तो कोई रह सकता और न कोई आ-जा सकता; किन्तु नगर परिषद में इन से परामर्ष नहीं लिया जायेगा। इन्हें सार्वजनिक सभाओं में प्रमुख स्थान नहीं दिये जायेंगे।
38) ये न्यायाधीष के आसन पर नहीं बैठेंगे। ये न तो संहिता के निर्णय समझते और न षिक्षा एवं न्याय के क्षेत्र में योग देते हैं। शासकों में इन मेें से कोई नहीं,
39) किन्तु ये ईष्वर की सृष्टि बनाये रखते हैं। इनका काम ही इनकी प्रार्थना है।
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