बारूक का ग्रन्थ : अध्याय 2
1) इसीलिए प्रभु ने अपनी चेतावनी पूरी की, जो उसने हमें और इस्राएल पर शासन करने वाले हमारे न्यायकर्ताओं, हमारे राजाओं, हमारे नेताओं और इस्राएल तथा यूदा के लोगों को दी थी,
2) अर्थात् यह कि वह हम पर ऐसी भयंकर विपत्तियाँ ढाह देगा, जैसी आज तक पृथ्वी पर कभी नहीं हुई, जैसी मूसा की संहिता के अनुसार येरुसालेम में हुई थी।
3) हम में कोई अपने पुत्र का माँस खायेगा और अपनी पुत्री का।
4) उसने उन्हें हमारे आसपास के सब राष्ट्रों के अधिकार में दे दिया और उन्हें आसपास के सब राष्ट्रों के बीच बिखेर कर अपमान और आतंक का पात्र बनाया।
5) हम शासक नहीं, बल्कि दास बन गये; क्योंकि हमने उसकी वाणी का तिरस्कार किया और अपने प्रभु-ईश्वर के विरुद्ध पाप किया।
6) प्रभु, हमारे ईश्वर के यहाँ न्याय है, किन्तु हम और हमारे पूर्वज आज तक लज्जा के साथ उसके सामने खडे हैं।
7) जैसे प्रभु ने हमारे विरुद्ध कहा था, वैसे ही वे सारी विपत्तियाँ हमारे ऊपर आ पड़ी हैं।
8) हमने अपना कुमार्ग त्याग कर उस से प्रार्थना नहीं की।
9) इसलिए प्रभु ने उन विपत्तियों के ऊपर दृष्टि दौड़ायी और उसने उन्हें हम पर आने दिया। उसने हमारे साथ जो भी किया, वह न्याय के अनुसार ही है।
10) हमने उसकी वाणी पर ध्यान नहीं दिया और उसके दिये हुए आदेशों का पालन नहीं किया।
11) प्रभु! इस्राएल के ईश्वर! तू चिन्ह एवं चमत्कार दिखा कर और हाथ उठा कर अपने महान् सामर्थ्य से अपनी प्रजा को मिस्र देश से निकाल लाया था। इस प्रकार तूने अपने नाम का गौरव बढ़ाया।
12) हमारे प्रभु-ईश्वर! तेरे सब आदेशों के बावजूद हमने पाप किया, हमने दुष्टता और अन्याय किया।
13) तेरा क्रोध हम से दूर हो, क्योंकि हम में केवल कुछ ही उन राष्ट्रों के बीच बच गये हैं, जिन में तूने हमें बिखेर दिया है।
14) प्रभु! हमारी प्रार्थना और हमारे निवेदन पर ध्यान दे और अपने नाम को कारण हमारी रक्षा कर। ऐसा कर कि हम उन लोगों के कृपापात्र बनें, जिन्होंने हमें निर्वासित किया।
15) इसी से सारा संसार जान जाये कि तू ही हमारा प्रभु-ईश्वर है; क्योंकि इस्राएल और उसका राष्ट्र तेरा कहलाता है।
16) पभु! अपने पवित्र निवासस्थान से नीचे देख और हमारी सुधि ले। प्रभु! कान लगा कर हमारी सुन।
17) प्रभु! अपनी आँखें खोल और देख। अधोलोक के मृतक, जिनके प्राण छीन लिये गये हैं, प्रभु की महिमा और न्याय का गुणगान नहीं करते,
18) बल्कि वही तेरी महिमा और न्याय का गुणगान करता है, जिसकी आत्मा अत्यन्त दुःखी है, जो दीन-हीन और दुर्बल है, जिसकी आँखें क्षीण हो गयी हैं, जिसका हृदय भूखा है।
19) ेहमारे प्रभु-ईश्वर! हम अपने पूर्वजों और राजाओं की धर्मिकता के भरोसे तेरे सामने प्रार्थना नहीं करते।
20) जैसा तूने अपने सेवक, नबियों द्वारा घोषित किया था, तूने हमारे विरुद्ध अपना क्रोध और प्रकोप यह कहते हुए भेजा-
21) प्रभु यह कहता हैः बाबुल के राजा के सामने अपने सिर झुका कर उसके अधीन हो जाओ। तभी तुम उस देश में रह सकोगे, जिसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को दिया है।
22) किन्तु यदि तुम प्रभु की वाणी का तिरस्कार कर बाबुल राजा के अधीन नहीं होंगे,
23) तो यूदा के नगरों और येरुसालेम की गलियों में प्रसन्नता एवं आनन्द की ध्वनि और वर-वधु के गीत समाप्त कर दूँगा और सारा देश अपने निवासियों से वंचित हो कर उजड़ जायेगा।
24) किन्तु हमने तेरी वाणी पर ध्यान नहीं दिया, जिसके अनुसार हमें बाबुल के राजा के अधीन रहना चाहिए था। इसलिए तूने अपने सेवक, नबियों द्वारा घोषित अपने इन शब्दों को चरितार्थ किया कि हमारे राजाओं और हमारे पूर्वजों की हाड्डियाँ उनकी कब्रों से निकाल ली जायेंगी।
25) अब वे दिन में ताप और रात में शीत में बिखरी पड़ी हैं। वे अकाल, तलवार और महामारी के कारण घोर कष्ट सह कर मर गये।
26) इस्र्राएल के घराने और यूदा के घराने की दुष्टता के कारण तूने उस मन्दिर की वर्तमान दशा कर दी, जो तेरे नाम से प्रसिद्ध है।
27) प्रभु! तूने अपने धैर्य और अपनी दया के अनुरूप हमारे साथ व्यवहार किया,
28) जिस तरह तूने उस दिन अपने सेवक मूसा के माध्यम से घोषित किया था, जब तूने यह कहते हुए उन्हें इस्राएलियों के सामने संहिता को लिपिबद्ध करने का आदेश दिया थाः
29) ''यदि तुम मेरी बात पर ध्यान नहीं दोगे, तो मैं तुम्हें तितर-बितर कर दूँगा और तुम्हारी यह बड़ी और विशाल जनसंख्या छोटे-छोटे दलों में बँट जायेगी।
30) मैं जानता हूँ कि वे मेरी बात नहीं मानेंगे, क्योंकि वे लोग हठीले हैं। किन्तु वे उस देश में, जहाँ निर्वासित हो कर जायेंगे, पश्चात्ताप करेंगे।
31) वहाँ वे जान जायेंगे, कि मैं ही प्रभु, उनका ईश्वर हूँ। मैं उन्हें एक नया हृदय प्र्रदान करूँगा और ऐसे कान, जो मेरी बात सुनेंगे।
32) तब वे अपने निर्वासन के देशा में मेरी स्तुति और मेरे नाम को याद करेंगे।
33) वे प्रभु के विरुद्ध पाप करने वाले अपने पूर्वजों के मार्ग का स्मरण करते हुए अपनी हठधर्मी और अपने पापाचरण का परित्याग करेंगे।
34) तब मैं उन्हें उस देश में वापस ले चलूँगा, जिसे मैंने शपथ खा कर उनके पूर्वज इब्राहीम, इसहाक और याकूब को देने का वचन दिया था और वे उसे अपने अधिकार में करेंगे। मैं उनकी संख्या बढ़ाऊँगा, उन्हें घटने नहीं दूँगा।
35) मैं उनके लिए एक चिरस्थायी विधान निर्धारित करूँगा; मैं उनका ईश्वर होऊँगा और वे मेरी प्रजा होंगे। तब में कभी भी अपनी प्रजा इस्राएल को उस देश से नहीं निकालूँगा, जिसे मैंने उसे दिया था।''
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