होशेआ का ग्रन्थ : अध्याय 2
1) ''तुम अपने भाइयों से 'मेरी प्रजा' कह कर पुकारो और बहनों से 'प्रेमपात्र' कहो।
2) ''तुम अपन माँ को समझाओ। क्या वह मेरी पत्नी नहीं है? क्या मैं उसका पति नहीं हूँ? उस से निवेदन करो कि वह अपने चेहरे और वक्षस्थल से व्यभिचार के चिन्ह हटा दे।
3) कहीं ऐसा न हो कि मैं उसे निर्वस्त्र और नंगा करूँ, जैसे वह अपने जन्म के दिन थी। मैं उसे उजाड बना कर मरुभूमि-जैसा बना दूँगा, जहाँ वह प्यास से मर जायेगी।
4) मैं उसकी सन्तान से प्रेम नहीं करूँगा, क्योंकि वे वेश्या से उत्पन्न हैं।
5) उनकी माँ तो वेश्या बन गयी, उनकी जननी निर्लज्ज थीः क्योंकि उसने कहा था, ''मैं तो अपने उन्हीं प्रेमियों से लगी रहूँगी, जो मुझे रोटी खिलाते और पानी पिताते हैं; जो मुझे ऊन, छालटी, तेल और अंगूरी देते हैं'।
6) ''अतः मैं उसके मार्ग में काँटों का घेरा लगाऊगा और पथ में दीवार खड़ी करूँगा कि वह अपने अभिसार मार्ग पर न जा सके।
7) वह अपने प्रेमियों का पीछा करेगी, किन्तु वह उन्हें पकड नहीं सकेगी; वह उन्हें ढूँढगी, किन्तु उन्हें नहीं पायेगी। तब वह कहेगी, 'मैं अपने पति के पास लौटूँगी, क्योंकि उस समय की मेरी स्थिति अब की स्थिति से कहीं अच्छी थी'।
8) वह नहीं जानती कि मैं ही उसे अन्न, अंगूरी, और तेल दे रहा था और जिस सोने-चांदी से वह बाल-देवता की मूर्तियाँ बना रही थी, वह भी मेरी उदारता की देन थी।
9) अतः मैं कटनी के समय अपना अनाज वापस ले लूँगा और अंगूर की फसल के समय अपनी अंगूरी भी। मैं उसके बदन पर से अपना ऊन और छालटी वापस ले लूँगा।
10) तब मैं उसके प्रेमियों के सामने उसकी कामुकता का पर्दाफाश करूँगा और मेरे वश से कोई उसे नहीं छुडा सकेगा।
11) मैं उसकी उन दाखलताओं और अंजीर के पेड़ों को उजाड दूँगा, जिनके विषय में उसने कहा था, 'इन्हें मेरे प्रेमियों ने मुुझे उपहार स्वरूप दिये हैं'। मैं उन को जंगल बना दूँगा, जहाँ जंगली जानवर उन को बरबाद कर देंगे।
12) मैं उसके सारे सुख-विलास का अन्त कर दूँग; उसके त्योहार, अमावस पर्व, व्रत-दिवस और सारा पँचाँग समाप्त कर दूँगा।
13) उसने पवोर्ं पर बाल-देवताओं को धूप चढायी है, वह नथ और हार पहन कर मुझ को भूल गयी और प्रेमियों के पीछे दौड गयी। मैं इन सब कायोर्ं के लिए उसे दण्ड दूँगा। यह प्रभु की वाणी है।
14) ''मैं उसे लुभा कर मरुभूमि को ले चलूँगा और उसे सान्त्वना दूँगा।
15) वहाँ मैं उसे उसकी दाखबारियाँ लौटा दूँगा; मैं कष्ट की घाटी को आशा के द्वार में परिणत करूँगा। वहाँ वह मुझे स्वीकार करेगी, जैसा कि उसने अपनी जवानी के दिनों में किया था- उस समय, जब वह मिस्र से निकली थीं।
16) ''प्रभु की यह वाणी हैः उस समय तुम मुझे 'अपना पति' कह कर पुकारोगी। तुम फिर कभी मुझे 'अपना बाल' कह कर नहीं पुकारोगी।
17) मैं उसके होठों के बाल-देवताओं के नाम मिटा दूँगा, जिससे वे फिर कभी याद नहीं रहेंगे।
18) उस समय मैं इस्राएल के पक्ष से वन के पशु-पक्षियों और भूमि पर रेंगेन वाले प्राणियों के साथ व्यवस्थापन स्थापित करूँगा। मैं धनुष, तलवार और युद्धास्त्र तोड दूँगा, जिससे तुम सुख-चैन से जीवन व्यतीत कर सको।
19) मैं सदा के लिए तुम्हें अपनाऊँगा। मैं तुम्हें धर्म और विधि के अनुसार कोमलता और प्यार से अपनाऊँगा।
20) मैं सच्ची निष्टा से तुम्हें अपनाऊँगा और तुम प्रभु को जान जाआंगी।
21) ''प्रभु की यह वाणी हैः मैं उस दिन उत्तर दूँगा। मैं आकाश को आदेश दूँगा कि वह पृथ्वी पर वर्षा करे;
22) मैं पृथ्वी को आदेश दूँगा, कि वह अन्न, अंगूरी और तेल उत्पन्न करे; मैं यिज्रएल को धनसंपन्न बनाऊँगा।
23) मैं उसे देश की भूमि में पुनः बो दूँूँगा। मैं लो-रूहामाह से प्रेम करूँगाः मैं लो-अम्मी को मेरी प्रजा कह कर पुकारूँगा, और उत्तर में वह कहेगा, ते मेर ईयवर है।''
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