विधि-विवरण ग्रन्थ : अध्याय 9
1) इस्राएल! सुनो! आज तुम उन लोगों के देष पर अधिकार करने के लिए यर्दन पार करने वाले हो जो तुम से बड़े और शक्तिषाली हैं और जिनके नगर गंगनचुम्बी परकोटों से घिरे हुए है।
2) वहाँ बड़े और ऊँचे क़द वाले अनाकियों की जाति रहती है। उनके विषय में तुम स्वयं जानते हो और तुमने यह कहावत भी सुनी है, 'अनाकियों का सामना कौन कर सकता है?'
3) आज तुम्हें यह मालूम होना चाहिए कि प्रभु, तुम्हारा ईष्वर भस्म करने वाली अग्नि की तरह तुम्हारे आगे-आगे उस पार चलेगा। वह उनका नाष करेगा और उन्हें तुम्हारे अधीन कर देगा, जिससे तुम उन को भगा दोगे और थोड़े ही समय में उनका विनाष करोगे, जैसा कि प्रभु वचन दिया है।
4) अब यदि प्रभु, तुम्हारा ईष्वर उन्हें तुम्हारे सामने से भगा देगा, तो यह नहीं सोचो कि तुम्हारे धर्माचरण के कारण ही प्रभु तुम्हें इस देष पर अधिकार कराने के लिए यहाँ लाया है। नहीं; उन लोगों के दुराचरण के कारण प्रभु उन्हें तुम्हारे सामने से भगा रहा है।
5) तुम अपनी धर्मपरायणता अथवा अपनी निष्कपटता के कारण उस देष पर अधिकार नहीं करोगे, बल्कि उन लोगों के दुराचरण के कारण प्रभु, तुम्हारा ईष्वर स्वयं उन्हें तुम्हारे सामने से भगायेगा। प्रभु इसलिए भी यह कर रहा है कि वह तुम्हारे पूर्वजों-इब्राहीम, इसहाक और याकूब - से शपथपूर्वक की हुई प्रतिज्ञा पूरी करना चाहता है।
6) यह समझ लो कि प्रभु तुम्हारा ईष्वर तुम्हें तुम्हारे धर्माचरण के कारण उस रमणीय देष पर अधिकार नहीं दे रहा है, क्योंकि तुम एक हठधर्मी प्रजा हो।
7) यह याद रखो और कभी नहीं भुलाओ कि तुमने उजाड़खण्ड में प्रभु को चिढ़ाया था। जिस दिन तुम मिस्र से निकले, उसी दिन से आज यहाँ आने तक तुम हमेषा प्रभु के विरुद्ध विद्रोह करते आ रहे हो।
8) होरेब पर्वत पर तुमने प्रभु के कोप को प्रज्वलित किया था और प्रभु तुम पर इतना कुपित हुआ था कि वह तुम्हारा विनाष कर डालने वाला था।
9) मैं पत्थर की पाटियाँ, प्रभु द्वारा तुम्हारे लिए निर्धारित विधान की पाटियाँ प्राप्त करने के लिए पर्वत पर चढ़ गया था। चालीस दिन और चालीस रात तक मैं बिना अन्न-पानी ग्रहण किये वहाँ पर्वत पर रहा।
10) उस समय प्रभु ने मुझे दो पाटियाँ दीं, जिन पर उसने अपने हाथ से वे सब आज्ञाएँ अंकित की थीं, जिन्हें प्रभु ने तुम्हारे समुदाय को अग्नि में से पर्वत पर सुनाया था।
11) चालीस दिन और चालीस रात बीत जाने पर प्रभु ने मुझे पत्थर की वे दो पाटियाँ, विधान की पाटियाँ दे दीं।
12) प्रभु ने मुझ से कहा, 'यहाँ से जल्दी नीचे जाओ, क्योंकि तुम्हारे उन लोगों ने कुकर्म किया है, जिन्हें तुम मिस्र से निकाल लाये। वे मेरे बताये पथ से जल्द ही भ्रष्ट हो गये है। उन्होंने अपने लिए एक प्रतिमा गढ़ी हैं'।
13) प्रभु ने मुझ से यह भी कहा, 'मैंने इन लोगों को देखा है। ये निष्चय ही एक हठधर्मी प्रजा हैं। मुझे इनका नाष करने दो।
14) मुझे मत रोको मैं इनका नाष करूँगा और पृथ्वी पर से इनका नाम मिटा दूँगा। मैं तुम्हारे द्वारा एक ऐसा राष्ट्र उत्पन्न करूँगा, जो इन से शक्तिषाली और संख्या में बड़ा होगा।'
15) ''इस पर मैं मुड़ कर अपने हाथों में विधान की वे दो पाटियाँ लिये पर्वत सें नीचे उतरा। अब तक पर्वत अग्नि से प्रज्वलित हो रहा था।
16) तब मैंने अपनी आँखों से देखा कि तुम लोगों ने धातु से बछडे+ की मूर्ति बना कर प्रभु के विरुद्ध पाप किया था। तुम जल्द ही प्रभु के बताये मार्ग से भ्रष्ट हो गये थे।
17) यह देख मैंने उन दोनों पाटियों को अपने हाथों से पटक दिया था और तुम्हारे देखते ही उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले थे।
18) फिर मै पहले की तरह चालीस दिन और चालीस रात, बिना अन्न-जल ग्रहण किये, प्रभु के विरुद्ध तुम्हारे पापों के कारण पड़ा रहा क्योंकि तुमने वही किया, जो प्रभु की दृष्टि में बुरा है और उसका क्रोध भड़काया।
19) मुझे डर था कि कहीं प्रभु अपने क्रोध के आवेष में तुम्हारा सर्वनाष न कर दे। परन्तु इस बार भी प्रभु ने मेरी प्रार्थना सुनी।
20) प्रभु हारून पर इतना कुपित हुआ था कि वह उसका भी नाष करने वाला था। उस बार मैंने हारून के लिए प्रार्थना की थी।
21) फिर मैंने तुम्हारी वह पापमय कृति, वह बछड़ा पकड़ कर अग्नि में जला लिया उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, उसे रेत कणों की तरह चूर-चूर कर दिया और पर्वत से बहती हुई नदी में बहा दिया।
22) ''तबएरा, मस्सा और किब्रोत-हत्तावा के पास भी तुम लोगों ने प्रभु का क्रोध भड़काया।
23) प्रभु ने तुम्हें कादेष-बरनेअ से यह आदेष दे कर भेजा कि उधर जाओ और उस देष को अपने अधिकार में ले लो, जिसे मैंने तुम्हें दे दिया है। लेकिन तुमने प्रभु, अपने ईष्वर के इस आदेष के विरुद्ध विद्रोह किया। तुमने उस पर भरोसा नहीं रखा और उसके आदेष का पालन नहीं किया।
24) तुम लोगों से जिस दिन से मेरा परिचय हुआ, उस दिन से तुम प्रभु से विद्रोह करते आ रहे हो।
25) मैं चालीस दिन और चालीस रात मँुह के बल प्रभु के सामने पड़ा रहा, क्योंकि प्रभु ने तुम्हारा विनाष करने को कहा था।
26) उस समय मैंने प्रभु से यह प्रार्थना की, 'प्रभु! ईष्वर! तू अपनी निजी प्रजा का विनाष नहीं कर, जिसका तूने अपने सामर्थ्य द्वारा उद्धार किया और जिसे तू अपने बाहुबल से मिस्र से निकाल लाया।
27) तू इब्राहीम, इसहाक और याकूब को, अपने सेवकों को स्मरण कर। इस प्रजा की हठर्धमिता, इसके अपराधों और पापों पर ध्यान न दे।
28) उस देष के लोग, जहाँ से तू इन लोगों को निकाल लाया, यह न कहने पायें कि प्रभु इन्हें उस देष में ले जाने में असमर्थ रहा, जिसके लिए उसने इन से प्रतिज्ञा की थी, या वह इन से घृणा करता है, इसीलिए वह इन्हें उजाड़खण्ड़ में मार डालने के लिए ले गया था।
29) वे तो तेरी अपनी प्रजा हैं, जिसे तू सामर्थ्य और बाहुबल से निकाल लाया।'
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