समूएल का पहला ग्रन्थ : अध्याय 5
1) ईष्वर की मंजूषा छीन लेने के बाद फ़िलिस्ती उसे एबेन एजे+र से अषदोद ले गये।
2) फिर फ़िलिस्तियों ने ईष्वर की मंजूषा ले जा कर उसे दागोन के मन्दिर में दागोन के पास रखा।
3) अब दूसरे दिन सबेरे अषदोदवासी जागे, तो वे देखते क्या हैं कि प्रभु की मंजूषा के सामने दोगान सिर के बल भूमि पर गिर पड़ा है। उन्होंने दागोन को उठा कर फिर उसके स्थान पर रख दिया।
4) जब वे तीसरे दिन सबेरे उठे, तो फिर दागोन प्रभु की मंजूषा के सामने सिर के बल भूमि पर गिरा हुआ था। दागोन का सिर तथा उसके दोनों हाथ कट गये थे और देहली पर पड़े हुए थे। दागोन का अब धड़ ही रह गया था।
5) इसी कारण दागोन के पुजारी और सारे लोग, जो अषदोद में दागोन के मन्दिर में आते हैं, आज तक देहली पर पैर नहीं रखते।
6) प्रभु का हाथ अषदोद के निवासियों के लिए भारी पड़ा। उसने अषदोद और उसके आसपास के लोगों के शरीर में गिल्टियाँ उत्पन्न कर उन्हें उत्पीड़ित किया।
7) यह देख कर अषदोद के निवासियों ने कहा, ÷÷इस्राएल के ईष्वर की मंजूषा हमारे यहाँ न रखी जाये, क्योंकि उसका हाथ हम पर और हमारे देवता दागोन के लिए भारी पड़ रहा है।''
8) इसलिए उन्होंने फ़िलिस्तियों के सब शासकों को बुला कर उन से पूछा, ÷÷हम इस्राएल के ईष्वर की मंजूषा का अब क्या करें?'' उन्होंने कहा, ÷÷इस्राएल के ईष्वर की मंजूषा गत नगर पहुँचायी जाये।'' इसलिए इस्राएल के ईष्वर की मंजूषा वहीं ले जायी गयी।
9) वह वहाँ ले जायी गयी, तो प्रभु का हाथ उस नगर को दण्डित करने लगा, जिससे वहाँ आतंक छाया रहा। उसने उस नगर के सभी निवासियों को, क्या छोटे, क्या बडे+ को, मारा। उनके शरीर में गिल्टियाँ निकल आयी।
10) इस पर उन्होंने ईष्वर की मंजूषा एत्रोन भेज दी। जैसे ही ईष्वर की मंजूषा एत्रोन पहुँची, एन्नाोनवासी चिल्ला उठे, ÷÷वे हमें और हमारे लोगों को मार डालने के लिए इस्राएल के ईष्वर की मंजूषा हमारे यहाँ लाये हैं।
11) इसलिए उन्होंने फ़िलिस्तियों के सब शासकों को बुला कर उन से निवेदन किया, ÷÷इस्राएल के ईष्वर की मंजूषा वापस भेजिए। वह जहाँ पहले थी, वहीं लौटे। नहीं तो वह हमारा और हमारे लोगों का विनाष करेगी।'' सारे नगर पर मृत्यु का आतंक छा गया। ईष्वर के हाथ ने उस नगर को दण्डित किया।
12) जिन लोगों की मृत्यु नहीं हुई थी, वे गिल्टियों से पीड़ित थे। नगर का हाहाकार आकाष में गूँज उठा।
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