मेल–मिलाप संस्कार

प्रार्थना :

हे ईश्वर मैं पाप स्वीकार करने आता हूँ। मैं अति प्रसन्न हूँ क्योंकि तू मेरे पाप क्षमा कर देगा। मैंने अनेक बार पाप किया है, तू मेरे सब पाप क्षमा कर, क्योंकि तू असीम भला है। हे प्रिय येसु, मैं तुझे हार्दिक धन्यवाद देता हूँ क्योंकि तू इस संसार में मुझ से मिलने आता है और मुझे अपने पिता के प्रेम का अनुभव देता है। हे पवित्र आत्मा, मैं अच्छा पाप– स्वीकार करना चाहता हूँ। मेरे हृदय में सब पापों के लिए सच्चा पछतावा डाल दे, और मुझे बल दे ताकि मैं पाप छोड़ देने का दृढ़ निश्चय करूँ।

 

दिल की जाँच:

दिल की जाँच करने का सबसे सरल तरीका यह है कि हम ईश्वर की दस आज्ञाओं की याद करें। फिर दिल की जाँच करते समय हम इस पर भी ध्यान दे सकते हैं कि हमने अपना कत्र्तव्य और काम ईश्वर, पड़ोसी और अपने प्रति कैसे पूरा किया है, जैसे,

 

ईश्वर के प्रति

क्या मैंने ईश्वर को अपना पिताजी समझकर प्रेम किया ?

क्या मैंने क्रोधित होकर ईश्वर का नाम व्यर्थ लिया ?

क्या मैंने अपनी दैनिक प्रार्थना ध्यान से की ? या सुस्ती के कारण छोड़ दी ?

क्या मैंने मिस्सा–पूजा में ध्यान लगाकर भाग लिया ?

क्या मैंने मिस्सा–पूजा के गीत और प्रार्थना सीखने के लिए कोशिश की ? संस्कार ग्रहण करने के लिए अच्छी तरह से तैयारी की?

 

पड़ोसी के प्रति

क्या मैंने अपने परिवार में माँ–बाप और भाई–बहनों के साथ अच्छा व्यवहार किया ?

दूसरों को क्षमा करने के लिए तैयार था या नहीं ?

क्या मैंने चोरी की ?

दूसरों को धोखा दिया ?

किसी को नुकसान या दु:ख पहुँचाया ?

दूसरों की गलतियों को बिना कारण प्रकट किया ?

अपने अधिकारियों और शिक्षकों के प्रति मेरा व्यवहार कैसा था?

 

अपने प्रति कत्र्तव्य

क्या मैंने स्वार्थी बनकर दूसरों की उपेक्षा की ?

क्या मैंने बातचीत और व्यवहार के द्वारा दूसरों को अच्छा नमूना दिया है ?

क्या मैंने भोजन के समय दूसरों के बारे में भी ध्यान रखा ?

स्कूल के अध्ययन पर ध्यान रखा ?

क्या मैंने सुस्ती के कारण माँ–बाप और भाई–बहनों के काम में मदद देने से इन्कार किया?

(अपने पापों के लिए पछतावा कीजिए और फिर पाप नहीं करने का निर्णय लीजिए।)

 

पुरोहित के पास:

हे पिता मुझे आशिष दीजिए क्योंकि मैंने पाप किया है। मेरा अन्तिम पाप–स्वीकार.......दिन के पहले हुआ था।

 

(एक–एक करके अपने पापों को पुरोहित को बताइए। बाद में पुरोहित जो कहता है उसे ध्यान से सुनिए।)

 

पछतावे की विनती.....................

 

(अपने स्थान पर जाकर प्रायश्चित पूरा कीजिए और ईश्वर को धन्यवाद दीजिए।)