तपस्याकाल की पवित्र यात्रा।
तपस्याकाल की पवित्र यात्रा। येसु ख्रीस्त के दुःख-भोग और पुनरुथान में पूर्ण रुप से भाग लेने हेतु! शब्दार्थ : Lent का अर्थ है बंसत ऋतु ष्ख्रीस्तीय मायने में तपस्याकाल प्रार्थना, उपवास, आध्यात्मिक नवीनीकरण का समय है, जो पास्का पर्व की तैयारी के लिए है। जिस प्रकार प्रक्रति अपने नियमानुसार अपने आप में परिवर्तन लाती है। बसन्त ऋतु के पूर्व पतझड़ के समय पेड़ अपनी पत्तियाँ गिरा कर अपनी जड़ों को और गहराई में ले जाते हैं, इसी प्रकार तपस्याकाल (चालीसा) हमारे लिए संसार के आकर्षणों को त्याग कर आध्यात्मिक गहरीकरण का समय है, ताकि हम बंसत ऋतु के फूलों के समान पास्का के समय येसु के साथ नवीनता में पुनर्जीवित हो सकें। यह एक आत्म विष्लेषण का समय है कि हम कौन हैं? अधिकतर हम बाहरी वस्तुओं पर निर्भर रहते है, उनके बिना हमारा जीना असम्भव-सा लगता है। ष्हम रंग-रुप को निखारने में इतने उत्सुक रहते है कि हमारे आंतरिक रंग-रुप या आत्मिक सौन्दर्य को नजर-अंदाज कर देते हैं। जिस प्रकार गेहूँ का दाना जो बाहर से बहुत सुंदर व कठोर दिखता है पर जब वह मिट्टी में गिरता है तो उसकी सुंदरता लुप्त हो जाती है। वह मर जाता है। मरने के बाद ही वह अंकुरित होकर कई गुना फल उत्पन्न करता है। उसी प्रकार तपस्याकाल अपने आपको त्याग कर या सांसारिकता को त्याग कर प्रार्थना, उपवास, त्याग और तपस्या द्वारा अपने आप को कष्ट देकर नहीं पर अपने आप को विनम्र बनाकर, ईश्वर पर पूर्ण निर्भर होकर, अपनी आध्यात्मिकता में नवीनीकरण का समय है। तपस्याकाल एक यात्रा: जब हम कभी यात्रा करते हैं हम सभी वस्तुओं का पूर्ण ध्यान रखते है जिनकी हमें जरुरत होती है। जब हम किसी वाहन के द्वारा यात्रा करते हैं तो हम ध्यान रखते है कि वह सही सलामत है या नहीं। अगर वह सही हालत में नहीं रहता है तो हम उसको सुधरवाते है, उसमें पर्याप्त मात्रा में तेल भरते हैं ताकि हमारी यात्रा बीच में ही न रुक जाये। उसी प्रकार तपस्याकाल की इस आध्यात्मिक यात्रा में हमें कुछ वस्तुओं की जरुरत होगी जैसे ............... 1 ईश-वचन जब हम यात्रा करते हैं तो सड़क के किनारे अनेक चिन्ह, निर्देषन व चेतावनी लिखे होते हैं। ये हमारी यात्रा को सुगम बनाते हैं। उसी प्रकार हमारी जीवन-यात्रा में हमें अनेक लोगों के द्वारा अनेक निर्देशन व सुझाव मिलते रहते हैं, जिसके द्वारा हम आगे बढ़ने का प्रयास करते रहते है। चालीसा एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसमें हमें आध्यात्मिक मार्गदर्शन की आवष्यकता होती है। ईष-वचन आध्यात्मिक मार्गदर्षन का सर्वोत्तम स्रोत है। इसलिए हमें ईश-वचन को पढ़कर मनन करते हुए अपनाना जरुरी है। ‘क्योंकि ईश्वर का वचन जीवन्त, सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से तेज है। वह हमारी आत्मा के अन्तरतम तक पहुँचता और हमारे मन के भावों तथा विचारों को प्रकट कर देता है। ईश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है। उसकी आँखों के सामने सब कुछ निरावरण और खुला है। हमें उसे लेखा देना पड़ेगा।’ (इब्रा. 4:12-13) उसने तुम्हे त्रस्त किया, भूखा रखा फिर तुम्हें मन्ना भी खिलाया, जिसे न तुम जानते थे और न तुम्हारे पूर्वज ही। इससे उसने तुमको यह समझाना चाहा कि मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है। वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है। (विधि-विवरण 8:3)