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Sunday Homilies - November 27, 2011
आगमन का पहला इतवार
By फादर जोसफ पी.पी.
इसायाह 63:16ब-17,19ब, 64:2ब-7, ; 1 कुरिन्थियों 1:3-9; मारकुस 13:33-37

आज पूजन-विधि के आगमन काल का प्रथम रविवार है।  इस अवसर पर आगमन के सही अर्थ को समझना एवं ख्रीस्त-जयंती के पर्व की प्रतीक्षा के संदर्भ पर प्रकाश डालना आवश्यक हो जाता है। 
हम उस परम् पिता परमेश्वर के एकमात्र पुत्र येसु के आगमन की प्रतीक्षा उसी तरह करते हैं जिस तरह एक किसान अपने खेतों को जोतने से पहले ऋतु की प्रथम वर्षा की प्रतीक्षा करता है।  प्रथम बारिष के आगमन से उसकी सारी खुशियाँ, उम्मीदें, आशायें एवं अभिलाषायें पूर्ण हाने लगती हैं।  इस वर्षा का उपयोग वह पूरे परिवार एवं समाज में ऊर्जा संचारित करने के लिये करता है।  उसी तरह हम प्रभु येसु के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं कि वे हम सभी के हृदयों में आयें और बसें।  इसी कारण हम प्रभु की प्रतीक्षा में आगमन काल में विभिन्न कार्यों का आयोजन करते हैं।  हम उनके आगमन से प्रफुल्लित होते हैं और नयी ऊर्जा के साथ जीवन में सत्कर्म करने की प्रेरणा लेते हैं।  
प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा सिर्फ आज से नहीं की जा रही है, अपितु कलीसिया के उद्भव के पहले यहूदियों ने भी मसीह की प्रतीक्षा की थी।  वह मसीह और कोई नहीं, प्रभु येसु ही थे।  परन्तु इसको पहचानने में यहूदी समुदाय असमर्थ रहा।  रोम के सम्राटों के हाथ मिली पराजय से यहूदी समुदाय अत्यंत निराश था एवं अपने आपको असहाय समझने लगा था।  उन्हें राजाओं और नबियों द्वारा बताये गए मसीह का इन्तजार था।  लेकिन उस मसीह के आगमन पर वे उन्हें पहचान नहीं पाये।  इसी प्रकार हम सभी अपने दिलों में किसी भी कारण से उत्पन्न निराशाओं को दूर करने के लिये अपने मसीह प्रभु येसु की प्रतीक्षा इस आगमन पर्व के द्वारा करते हैं।  हमारी कामना है कि वे आयें और हमारे दिलों को रोशन करें,  खुशियों से भरें और दूसरों के जीवन को प्रकाशमान करने की शक्ति भी हमें प्रदान करें।
अगर हम अपवित्र जीवन बिता रहे हैं तो हम पर हमारा विनाश हावी होगा।  इसलिये हमारे हृदय में प्रभु का आगमन आवश्यक है।  हमारी प्रतीक्षा उन आशाओं की पूर्ति के लिये है जब प्रभु येसु हमारे हृदय में बसकर हमारे पापों का नाश करेंगे और हमें मुक्ति प्रदान करेंगे।  
प्रतीक्षा या इन्तज़ार करना मानवीय जीवन का एक साधारण पहलू है।  हमारे समाज में प्रतीक्षा करना एक साधारण सी बात है।  रेल्वे स्टेषन तथा बस स्टेंड पर लोग न जाने कितना समय प्रतीक्षा में बिताते हैं।  दूर से बहुत दिनों के बाद घर लौटनेवाले परिजनों का इन्तज़ार हम कितनी बेचैनी से करते हैं!  किसान अपने खेत में बीज बोने के बाद बड़ी उत्सुकता से फसल का इन्तज़ार करता है।  इन्तजार का समय निष्क्रियता का समय नहीं है।  इस इन्तज़ार के दौरान वह न केवल सतर्क रहता है, परन्तु कठिन परिश्रम भी करता है।  वह वर्षा के लिए ईष्वर से करबद्ध प्रार्थना करता है।  समय-समय पर खाद डालता है।  विभिन्न जीवजन्तुओं से अपनी फसल को बचाता है।  इसी प्रकार इन्तजार के साथ कुछ तैयारी भी ज़रूरी है।  जब हम रेलगाड़ी का इन्तज़ार करते हैं तो हमारे लिए यह सुनिष्चित करना अनिवार्य है कि हमारे पास यात्रा का टिकट है।  दीपावली के त्योहार के इन्तज़ार में हम घरों को साफ करके सजाते तथा विभिन्न प्रकार के पकवान बनाते हैं।  जब सन्त पापा योहन पौलुस द्वितीय भारत आये थे तो पूरे भारत देष में बड़ी तैयारियाँ की गई थी। 
जीवन के रहस्यों को समझने तथा परखने के लिए इन्तज़ार का समय लाभदायक साबित होता है।  कहा जाता है कि जिन्दगी एक ऐसा जटिल रहस्य है जिसे समझने के लिए एक पूरी जिन्दगी भी पर्याप्त नहीं है।  जीवनदाता ईष्वर के आगमन का रहस्य कितना अधिक निगूढ़ होगा!  हर आगमन काल में हम इस रहस्य को और अधिक गहराई से समझने की कोषिष करते हैं।  आगमन काल हमें ईष्वर रूपी महान सत्य को समझने में पर्याप्त तैयारी की ज़रूरत को समझाता है।  संत पौलुस कुरिन्थियों को लिखते हुए अपनी अभिलाषा व्यक्त करते हैं कि प्रभु के आगमन पर वे सब निर्दोष पाये जायें (1 कुरिन्थियों 1:8)।
आज के सुसमाचार मेें लेखक प्रभु येसु के आगमन के लिये हमें चैकस करते हंै।  प्रभु ने हमें अपने जीवन में सुकर्म करने के लिये प्रेरणा दी है और अपने द्वारा रचे हुए इस संसार को हमें सौंप दिया कि हम अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह सदाचार से और नियमित होकर करें।  वे आयेंगे, यह अटल सत्य है और इसी कारण हम उनके आगमन की प्रतीक्षा करते हैं।  इस आगमन पर्व की प्रतीक्षा में हम अपने घरों को सुसज्जित करते हैं, दीपों से सजाते हैं।  चरनी में प्रभु येसु को प्रतिष्ठित करने के लिये स्थान बनाते हैं किन्तु शायद हम अपने अंदर इस ईश्वर को धारण करने के लिये स्थान बनाने से चूक जाते हैं।  हमें चैकस रहना चाहिये कि पता नहीं कब प्रभु अपने आगमन से हमें अनुग्रहित करेंगे।  हमें अपने हृदय को निष्कलंक, निष्कपट एवं निर्मल बनाना चाहिये।  तभी सही अर्थों में हम प्रभु को अपने हृदयों में धारण कर उस आनन्द का अनुभव कर पायेंगे। 
प्रभु का आगमन विभिन्न रूप लेता है।  कभी वे मन्द समीर के समान जिन्दगी के सुखद पलों में हम से मिलने आते हैं तो कभी आँधी-तूफान की तरह कुछ कड़वे अनुभवों के द्वारा वे अपने आप को प्रकट करते हैं।  वे सैकडों रूपों में हमारे पास आते रहते हैं।  इसलिए हमें सतर्कता से उनका इन्तजार करना चाहिए।  आइए हम प्रार्थना करें कि वे हमें शक्ति प्रदान करें कि हम अपने आपको इस तरह तैयार करें कि प्रभु हमेशा हमारे हृदय में समाये रहे।  हम अपवित्रता की ओर देखें भी नहीं, वासनाओं को पास न आने दें, अपने आपको निष्कपट एवं निर्मल बनायें और पाप रहित बनने की इच्छा करें।  यह तभी संभव है जब हम अपने अन्दर के अंधेरे से बाहर आयें, अपने को रोशन करें, अपने अन्दर मंदिर बनायें जिससे प्रभु हमारे अंदर अपना स्थान बना सकें।

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