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Sunday Homilies - December 04, 2011
आगमन का दूसरा इतवार
By फादर सबास्टीन तिग्गा

इसायाह 40:1-5,9-11; 2 पेत्रुस 3:8-14; मारकुस 1:1-8

पवित्र बाइबिल में हमें ईश्वर के दो रूप देखने को मिलते हैं।  एक तरफ बाइबिल ईश्वर को दयालु तथा कृपालु पिता के रूप में दर्शाती है, तो दूसरी तरफ उन्हीं ईश्वर को न्यायी और दण्ड देने वाले के रूप में प्रस्तुत करती है।  दोनों ही पापियों को पश्चात्ताप की ओर बुलाते हैं।  आज की धर्मविधि में हमें पश्चात्ताप तथा अनुताप की ओर बुलाती संत योहन बपतिस्ता की आवाज़ सुनाई पड़ती है।  संत योहन पश्चात्ताप के उपदेशक मात्र नहीं थे।  परंतु वे पश्चात्ताप का उत्तम रूप प्रस्तुत करते हैं।  उनके परिधान, उनके वस्त्र साधारण नहीं थे।  वे निर्जन प्रदेश में रहते थे और ऊँट के खुरदुरे रोओं का कपड़ा पहन, कमर में चमडे़ का पट्टा बाँधते थे।  जहाँ तहाँ मिलने वाली टिड्डियों और वनमधुओं से वे अपनी भूख-प्यास मिटाते थे।  इस प्रकार पश्चात्ताप का उत्तम रूप बनकर वे सुनने वालों को पश्चात्ताप का आह्वान देते हैं।

माक्र्स लुसाडो ¼Max Lucado½ ने कहा था, ’’ईश्वर और हमारे बीच एक हज़ार फुट की दूरी है।  ईश्वर इस दूरी के 999 फुट आगे आकर इसका इंतजार करते हैं कि हम ईश्वर की ओर बाकी एक फुट आगे बढ़ें।’’  पश्चात्ताप ईश्वर और हमारे बीच की दूरी को समाप्त करता और हमें ईश्वर से पुनः मिलाता है।

कभी कभी हम यह सोचते हैं कि ईश्वर की दया और करुणा असीम है और इस कारण हम चाहे कितनी भी गलती करें, वे हमें बचा ही लेंगे।  लेकिन यह बेवकूफ़ी है।  प्रवक्ता-ग्रन्थ 5:4-10 में हम पढ़ते हैं, ’’यह मत कहो, मैंने पाप किया, तो मेरा क्या बिगड़ा?  क्योंकि प्रभु बड़ा सहनशील हैं  क्षमा पाने की आशा में पाप-पर-पाप मत करते जाओ।  यह मत कहो, ’उसकी दया असीम है।  वह मेरे असंख्य पाप क्षमा करेगा’; क्योंकि दया के अतिरिक्त उसमें क्रोध भी है और उसका कोप पापियों पर भड़क उठता है।  प्रभु के पास शीघ्र ही लौट आओ, दिन-पर-दिन उसमें विलम्ब मत करो; क्योकि प्रभु का क्रोध अचानक भड़क उठेगा; दण्ड के दिन तुम्हारा विनाश होगा।  पाप की कमाई पर भरोसा मत रखो, विपत्ति के दिन इससे तुम्हें कोई लाभ नहीं होगा।’’

हम प्रभु की दयालुता का फायदा उठाना चाहते हैं।  परंतु हमारे मन परिवर्तन से ही हम प्रभु के कोप से बच सकते हैं।  जब तक हम प्रभु की दयालुता का फायदा उठाते हुए पाप-पर-पाप करते रहेंगे, हमें मुक्ति नहीं मिलेगी।  कभी कभी हम सोचते हैं कि अभी तो बहुत समय है, बाद में पश्चात्ताप करूँगा, कुछ समय और बीत जाने दो।  यह एक नाजुक स्थिति है।  कई बार ऐसे लोगों को पश्चात्ताप करने का मौका नहीं मिलता और वे पाप में ही मर जाते हैं।  इसी कारण प्रवक्ता-ग्रन्थ 17:25-29 में हम पढ़ते हैं, ’’यदि जीवित लोग ईश्वर का धन्यवाद नहीं करते, तो अधोलोक में कौन उसका स्तुतिगान करेगा?  अधर्मियों की भ्रांति में मत रहो और मृत्यु से पहले प्रभु की स्तुति करो।  जो मर चुका है, वह प्रभु का स्तुतिगान नहीं करता।  जो जीवित और सकुशल है, वही प्रभु को धन्य कहता है।  जीवित और सकुशल रहते हुए प्रभु को धन्य कहो।  प्रभु की स्तुति करो और उसकी दया पर गौरव करो।  कितनी महान है ईश्वर की दया और उसके पास लौटने वालों के लिए उसकी क्षमाशीलता!  सब कुछ मनुष्य के लिए संभव नहीं है, क्योंकि मनुष्य अमर नहीं है।’’  कभी कभी लोग यह सोचकर सो जाते हैं कि कल से मैं सुधर जाऊँगा लेकिन यदि आज रात को ही उसकी मृत्यु होती है तो उसकी योजना का क्या होगा।  मनपरिवर्तन के लिए सबसे उŸाम दिन आज है।  सबसे उत्तम समय अब है।

कभी कभी हम सोचते हैं कि हम धीरे-धीरे सुधर जायेंगे, एक दिन में संत बनना मुमकिन नहीं है।  हमारे समाज में ऐसे परामर्शदाता भी उपलब्द्ध हैं जो लोगों को लोकप्रिय बातें बताकर उन्हें सच्चाई से दूर रखते हैं।  एक व्यक्ति की पैसा चुराने की आदत थी।  वह उससे छुटकारा पाना चाहता था।  अपने से कुछ नहीं बन रहा था।  तो वर्ष के अंतिम दिन उसने यह निर्णय लिया कि क्यों न किसी परामर्शदाता के पास जायें और नूतन वर्ष में अच्छे जीवन बिताने की मदद माँगें!  परामर्शदाता ने उसकी समस्या के बारे में सुनने के बाद उससे पूछा, ’पिछले साल तुमने कुल मिलाकर कितने रुपयों की चोरी की?’’  उस चोर ने कुछ समय तक सोचने के बाद उŸार दिया, ’’करीब एक लाख रुपये की’’  तब परामर्शदाता ने कहा, ’’ एक काम करो, इस साल इस को कम करो, सिर्फ 90,000 रुपये की चोरी करो और अगले साल 80,000 की चोरी।  इस प्रकार दस साल के बाद तुम इस से छुटकारा पाओगे।  ऐसा उपदेष लोकप्रिय तो अवष्य होता है, परन्तु प्रभु की षिक्षा से बहुत दूर है।

कई लोगों की यह भी सोच हैं कि पाप तो सभी लोग करते ही हैं तो इसमें कौन-सी बड़ी बात है!  यह सच हैं सब मनुष्य पापी हैं।  परंतु याद रखिए जलप्रलय के समय सिर्फ नूह के परिवार के लोग ही बच गये थे।  जब ईश्वर ने आग से सोदम शहर को मिटा दिया था तब उन्होंने सिर्फ लोट के परिवार को सुरक्षित रखा था।  आइए अपनी अन्तरात्मा में संत योहन बपतिस्ता की आवाज़ ग्रहण कर आज ही अपने जीवन को प्रभु के लिए बदल दें।

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