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Sunday Homilies - December 25, 2011
ख्रीस्त जयन्ती (जागरण मिस्सा)
By फादर सौंदरा राजन

 

इसायाह 62:1-5; प्रेरित-चरित 13:16-17,22-25; मत्ती 1:1-25 या 1:18-25

 

उन्नीसवीं सदी में हवाई के मोलोकोय द्वीप में सरकार सभी कुष्ठरोगियों को भेजा करती थी ताकि देश के अन्य लोग इस संक्रामक रोग के शिकार न बनें।  इस भयानक बीमारी का उस समय कोई इलाज़ नही था।  इस बीमारी से रोगियों की उँगलियाँ, नाक, कान और शरीर के अन्य अंग गलकर लुप्त हो जाते थे।  धीरे-धीरे पूरा शरीर विकृत हो जाता था।  सन् 1873 में बेल्जियम से फादर जोसफ डामियन नामक एक पुरोहित मोलोकोय पहुँचे।  उन्होंने एक स्वास्थ्य केन्द्र और गिर्जे की स्थापना की तथा करीब 700 कुष्ठरोगियों की सेवा करने लगे।  उन्होंने देखा कि उनकी पल्ली के विश्वासीगण न केवल शारीरिक रूप से बीमार थे, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी।  वे शराब तथा अन्य शारीरिक वासनाओं के शिकार बन गये थे।  फादर डामियन ने बड़े प्रेम से उनकी हर संभव मदद की तथा उन्हें अच्छा मार्गदर्शन दिया।

फादर डामियन प्रवचन देते समय उन्हें ’’मेरे प्रिय भाइयों और बहनों’’ कहकर संबोधित करते थे।  लेकिन सन् 1885 में एक दिन फादर डामियन ने अपना प्रवचन ’’मेरे प्रिय कुष्ठरोगी भाइयों’’ कहकर शरू किया।  कुष्ठरोगियों की सेवा करते-करते वे खुद उस रोग के शिकार बन चुके थे।  चार साल बाद कुष्ठरोगियों की सेवा करते-करते 15 अप्रैल 1889 में उनकी मृत्यु हुई।  एक सदी बाद सन् 1995 में संत पापा योहन पौलुस द्वितीय ने उनको धन्य घोषित किया।  आज हम क्रिसमस का त्योहार मना रहे हैं।  फादर डामियन ने जो उन कुष्ठरोगियों के लिए किया, वही प्रभु ईश्वर क्रिसमस के द्वारा हमारे साथ करते हैं।  फादर डामियन ने ईश्वर के मनुष्य बनने के रहस्य को अपने जीवन में अनुवाद करके मोलोकोय के कुष्ठरोगियों को क्रिसमस का अनुभव कराया।

संत पौलुस कहते हैं, ’’मसीह का कोई पाप नहीं था।  फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बनाया, जिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें।’’ (2 कुरिन्थियों 5:21)  क्रिसमस ईश्वर के हमारे समान बनने का त्योहार है।  ईश्वर अपनी महानता के कारण ही दीनहीन बनते हैं, अतुल्य शक्तिषाली होने के कारण ही वे अपने को शक्तिहीन बनाते हैं और सब कुछ के स्रोत होने के कारण ही वे सब कुछ त्याग देते हैं।  इसी कारण कहा जाता है कि विनम्रता महानों का गुण है।  सबसे महान ही सबसे ज्यादा विनम्र बन सकते हैं, महान ही अपने को छोटा बना सकता हैं।  वास्तव में जब प्रभु सृष्टिकर्ता यूखारिस्तीय समारोह में एक छोटी रोटी का रूप धारण कर हमारे सामने अपने को प्रकट करते हैं तो इसी महानता की एक झलक हमें देखने को मिलती है। 

चरनी में गाय बकरी अपना भोजन पाते हैं।  जब बालक येसु का जन्म बेथलेहेम के गोशाला में होता है तो हम पापियों के लिए अपने को भोजन देने वाले पालनहार का दर्सन हमें होता है।  यहाँ अपनी भेड़ों के लिए अपनी जान देनेवाले भले गड़ेरिया से, अपने भेड़ों के लिए खुद भोजन बननेवाले स्नेहमय गडेरिये से, हमारी मुलाकात होती है। 

मानव को ईश्वर के दर्शन करने की आशा और इच्छा होती है।  इस इच्छा की पूर्ति के लिए वह इधर-उधर भटकता रहता है।  इस प्रकार अंधकार में भटकने वाले मानव के सामने ख्रीस्त जयंती के अवसर पर ईश्वर की ज्योति का उदय होता है।  इस ज्योति को ग्रहण करने के लिए हम पूरे आगमन काल में अपने को तैयार कर रहे थे।  हमारा अनुभव उतना गहरा होगा जितनी अच्छी तैयारी हमने की है।

प्रभु येसु इम्मानुएल हैं - ईश्वर हमारे साथ।  एक बालक बहुत ही सुभेद्य और असुरक्षित होता है।  उसे दूसरों पर पूरी तरह निर्भर रहना पड़ता है।  वह अपने आप को असहाय महसूस करता है।  चरनी में लेटा बालक गरीबी और लाचारी प्रस्तुत करता है।  ईश्वर गरीब से गरीब बनकर गरीब मानव के पास होने का, गरीब के साथ गरीब बनने का एहसास छोटे से छोटे मानव को कराते हैं।  उस विनम्र ईश्वर के साथ होने का अनुभव ही क्रिसमस का अनुभव है।  इस अनुभव को अपनाने के लिए हमें भी उन्हीं के समान विनीत बनना होगा।

आइए, हम भी फादर डामियन की तरह अपने विनम्र सेवाकार्य द्वारा दूसरों को ख्रीस्त जयंती का अनुभव करायें।

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