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Sunday Homilies - December 30, 2011
पवित्र परिवार का पर्व
By फादर जोसफ पी.पी.

09.

प्रवक्ता 3:2-6, 12-14; कलोसियों 3:12-21; लूकस 2:22-40

 

लूकस 2:51-52 में हम पढ़ते हैं, ’’ईसा उनके साथ नाज़रेथ गये और उनके अधीन रहे।  उनकी माता ने उन सब बातों को अपने हृदय में संचित रखा।  ईसा की बुद्धि और शरीर का विकास होता गया।  वह ईश्वर तथा मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़़ते गये।’’  पवित्र परिवार के बारे में इससे ज्यादा जानकारी पवित्र ग्रन्थ हमें नहीं देता है।  पवित्र ग्रन्थ इस विषय में मौन साधता है।  यह मौन ही पवित्र परिवार की सबसे बड़ी विशेषता है।  आज की शोर शराबे की दुनिया में मौन साधते हुए बड़े कार्यों को करना ईश्वरीय तरीका है, पवित्रीकरण का तरीका है।  सुसमाचारों में पवित्र परिवार के कार्य-कलापों के बारे में हमें बहुत ही कम जानकारी मिलती है।  पवित्र परिवार का जीवन छिपा हुआ जीवन था।  वहाँ बालक येसु माता पिता के अधीन रहकर मानव-मुक्ति का कार्य कर रहे थे।

अच्छे परिवारों में बहुत मौन साधा जाता है।  परिवार के सदस्यों के व्यवहार में कमियाँ तो अवश्य ही होती हैं।  इन कमियों के सामने मौन साधा जाता है।  घर की चार दीवारों के अन्दर ऐसी कई घटनाएं घटती हैं जिनके बारे में परिवार के बाहर के लोग अनभिज्ञ होते हैं।  अच्छे परिवार के सदस्य एक दूसरे पर दोष लगाने के बजाय मौन रूप से उन्हें क्षमा करते हैं और सहभागिता में आगे बढ़ते हैं।  वे विनम्रता के साथ अपने कत्र्तव्यों को निभाते हुए आगे बढ़ते हैं।  जिनमें क्षमाशीलता नहीं है वे शोर शराबे में लग जाते हैं।  दार्शनिक सुक़रात के पारिवारिक जीवन में भी कई कठिनाईयाँ थी।  वे महान दार्शनिक थे और ज्ञान की बातों में डूब जाते थे।  उनकी पत्नी को उनका व्यवहार पसन्द नहीं था।  इस कारण वह कई बार सुक़रात के विरुद्ध चिल्लाती थी।  एक दिन उसने गुस्से में आकर सुकरात के सामने बहुत चिल्लाया।  सुक़रात ने मौन साधा।  यह देखकर कि उसके चिल्लाने का उसके पति पर कोई असर नहीं पड़ रहा है, उसने अन्दर जाकर एक घडे़ में गन्दा पानी भरकर सुक़रात के सिर पर डाल दिया।  सुक़रात ने पानी पोंछकर मुस्कुराते हुए कहा, ’’जब बादल गर्ज रहा था और बिजली चमक रही थी तो मुझे लग रहा था कि बारिश होने ही वाली है’’  मैं समझता हूँ कि यह कई घरों की कहानी है।  क्षमाशीलता के अभाव में कोई भी आगे नहीं बढ़ सकता।  वह परिवार की एकता में बाधा डालती है।

आज हम पवित्र परिवार का त्योहार मना रहे हैं।  रोटी, कपड़ा और मकान मानव की प्राथमिक आवश्यकताएं मानी जाती हैं।  पत्थर और सीमेंट से तो मकान बन सकता है, परन्तु घर बनाने के लिए हमें विनम्र दिलों की ज़रूरत है।  घर बनाने के लिए विनम्र दिलों को प्यार रूपी सीमेंट से जोड़ना पड़ता है।  घर परिवार का निवास स्थान है।  परिवार जीवन की प्रथम पाठशाला है।  वहाँ अनुकम्पा, सहानुभूति, विनम्रता, कोमलता और सहनशीलता धारणा करने के लिए आज के दूसरे पाठ के द्वारा संत पौलुस हमें बाध्य करते हैं।

यह त्योहार हमें वर्तमान समुदायों के परिवारों के बारे में सोचने को मज़बूर करता है।  कई विवाहित लोग यह गलती करते हैं कि वे आदर्श या काल्पनिक पति या पत्नी से शादी करते हैं, वास्तविक पति या पत्नी से नहीं।  आदर्श या काल्पनिक पति या पत्नी में कोई कमी नहीं होती, उनमें परिपूर्णता देखने को मिलती है।  लेकिन ऐसे व्यक्तित्व उपन्यासों तथा फिल्मों तक ही सीमित रहते हैं।  वास्तविक पति या पत्नी में कमियाँ होती ही हैं।  उनमें अपर्याप्तता तथा अपूर्णता होती है।  जो इस प्रकार के काल्पनिक आदर्श जीवन साथी के साथ विवाह करता है उसका जीवन सफल नहीं होता है क्योंकि उस आदर्श पति या पत्नी का कोई अस्तित्व नहीं होता।  जो अच्छा पारिवारिक जीवन बिताना चाहता है, उसे अपनी वास्तविक पत्नी को, उसकी सभी क्षमताओं तथा कमज़ोरियों, अच्छाईयों तथा बुराईयों, गुणों तथा अवगुणों के साथ स्वीकार करना पड़ता है।  तभी पारिवारिक जीवन सफल होता है।  इस प्रकार जब वास्तविक व्यक्तियों का मिलन होता है तो वहाँ एक आदर्श परिवार जन्म लेता है।  वे एक-दूसरे की कमियों को विनम्रता के साथ दूर करते हुए सहभागिता का जीवन शुरू करते हैं।

आज के परिवारों के सामने कई चुनौतियाँ हैं।  संचार माध्यम परिवारों का जो चित्र प्रस्तुत करते आ रहे हैं उनमें वास्तविकता का अभाव है।  साथ ही जीवन्त नमूनों तथा उदाहरणों की कमी है।  कहा जाता है कि आज के बच्चों की यह चुनौती है कि वे अवगुणों से भरी दुनिया में रहकर अपने जीवन में गुणों को प्रस्तुत करना सीखें, हिंसक वातावरण में रहकर भी अहिंसा का मूल्य सीखें, अनैतिकता से भरे समुदाय में रहते हुए भी नैतिकता को प्राथमिकता दें।  आज परिवारों में बच्चे बड़ों के चाल चलन से ही सबसे ज्यादा सीखते हैं।  परिवार सबसे प्रभावशाली प्राथमिक पाठशाला है।

इस संदर्भ में हम आज जिस पवित्र पर्व को मना रहे हैं वह एक आदर्श उदाहरण है।  इस परिवार का मूल मंत्र था करुणामय प्रेम एवं प्रभु पर विश्वास।  इस परिवार के सदस्य थे संत जोसफ, माता मरियम और प्रभु येसु।  जिस पारिवारिक आदर्श को संत जोसफ ने स्थापित किया है वह  आज हमारे लिए आदर्श है।  इस परिवार के द्वारा स्थापित आदर्शों पर चलकर हम भी उस परिवार की पवित्रता का अनुभव कर सकते हैं।  इसके लिए प्रभु पर विश्वास एवं प्रार्थना अत्यंत आवश्यक हैं।  जिस परिवार के सदस्य एक साथ प्रार्थना करते हैं, उनका परिवार सदैव एक रहता है।  वहीं छलकता है प्रेम का अमृत जो संबंधों को सार्थक और समाज को कल्याणकारी बनाता है।

आइए हम ईश्वर से निवेदन करें कि ख्रीस्तीय माता-पिता अपने बच्चों के लिए अच्छे उदाहरण बनने की कृपा उन्हीं से प्राप्त करें।  सभी बच्चे बालक येसु की ही तरह माता-पिता के अधीन रहें तथा उनकी बुद्धि और शरीर का विकास हो।

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