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Sunday Homilies - January 15, 2012
वर्ष का दूसरा इतवार
By फादर सबास्टीन टिग्गा

1 समूएल 3:3ब-10,19; 1 कुरिन्थियों 6:13स-15,17-20; योहन 1:35-42

 

एक मुख्य राजमार्ग के बायें ओर लगे संकेत पटल पर, ’’ठहरिए, देखिए, जाइए’’ लिखा हुआ है।  यात्रियों और वाहन चालकों को रात में या दिन में स्पष्ट रूप से पढ़ सकने की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इसकी लम्बाई और चैथाई काफी बड़ी रखी गयी है और सफेद रेडियम पटी से लिखे गये अक्षर भी काफी बड़े-बड़े हैं।  वहाँ से गुजरने वाले किसी भी यात्री को यह स्वतः अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।  सुरक्षित यात्रा करते हुए गंतव्य स्थान तक सही सलामत पहुँचने के लिए यह चेतावनी उचित तथा आवश्यक भी है।  इससे दुर्घटना नहीं होने की कम होने की संभावना के साथ-साथ, यात्रा सुखमय एवं गंतव्य स्थान तक पहुँचना प्रायः निश्चित भी हो जाता है। 

            हम सब के सब स्वर्गराज्य के यात्री है जो इस शरीर रूपी गाड़ी में सवार होकर, अपनी-अपनी राह ढूंढकर इस संसार से यात्रा कर रहे हैं।  हर राह की बगल में किसी न किसी प्रकार की चेतावनी, सावधानी, मार्ग-संकेत, मंगल-कामना आदि के संकेत पटल हमें देखने को मिलते ही है।  यह हमें उसके गंतव्य स्थान, उसकी दूरी, तथा मार्ग की विषेषता के संकेत देते रहते हैं। 

स्वर्ग का रास्ता वे ही जानते हैं जो स्वर्ग से उतर कर आये है और जो स्वर्ग में है।  प्रभु येसु ही इसी कारण हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं।  इसके अलावा इस संसार में जन्में किसी भी व्यक्ति ने स्वर्ग न तो देखा है और न ही वह वहाँ जाने का रास्ता जानता है।  आज के सुसमाचार में जिंदगी के चैराहे पर ठहरे हुए अपने शिष्यों के लिए संत योहन बपतिस्ता संकेत पटल बनते हैं।  वे इशारा करते हुए अपने शिष्यों से कहते हैं, ’’देखो, ईश्वर का मेमना’’ यह सुनकर ही योहन के शिष्य प्रभु के पीछे-पीछे जाते है।  प्रभु उनकी ओर मुड़कर उनसे प्रष्न करते हैं, ’’क्या चाहते हो?’’  इस पर वे कहते हैं, ’’गुरूवर आप कहाँ रहते हैं?’’ प्रभु ने उनसे कहा, ’आओ और देखो।’’  इसपर वे षिष्य न केवल प्रभु के चेले बनते हैं बल्कि वे खुद योहन बपतिस्ता के समान अन्य लोगों के लिये प्रभु की ओर जाने के रास्ते का संकेत पटल बन जाते हैं।  अंद्रेयस उन शिष्यों में एक था।  वे योहन बपतिस्ता रूपी संकेत पटल के इशारे पर स्वेच्छा से स्वंतत्रापूर्वक, ठहरकर, देखकर सच्चे मार्ग का चुनाव कर आगे बढ़ने से सुरक्षित सबसे गंतव्य स्थान पर पहुँच जाते हैं।  वे इस गंतव्य स्थान का अनुभव अपने भाई-बहनों सगे-संबंधियों तथा पडो़सियों के साथ बाँटना नहीं भूलते।  जैसे काले कलूटे ठण्डे लोहे का टुकड़ा आग की भट्टी में तपकर अग्नि बन जाता है वैसे ही प्रभु येसु के साथ रहने से शिष्यों का जीवन बदल जाता है।  वे प्रभु के साथ बात करने, चलने-फिरने, खाने-पीने, बैठने-उठने लगते हैं।   इस अनुभव से उन्हें यह तो पता चलता हैं कि प्रभु की राह कँटीली, पथरीली और चुनौतीपूर्ण होती है।  लेकिन चलते-चलते प्रभु शत्रुओं को क्षमा करते, रोगियों को चंगा करते, भूखों को खिलाते तथा मुर्दों को जिलाते हैं।  अपने पिता की इच्छानुसार स्वर्गराज्य को फैलाना ही वे अपना खाना-पीना मानते हैं।  प्रभु के साथ रहने से, प्रभु के बारे में जानने की षिष्यों की तमन्ना पूर्ण होती है, पर और जानने की जिज्ञासा और अपना अनुभव दूसरों के साथ बाँटने की जिज्ञासा बढ़ती जाती है। 

हमारे जीवन में हम साधारतः कई बार प्रभु के पास पहुँच जाते हैं लेकिन वहाँ ठहरने, देखने और सोच-समझकर आगे बढ़ने का धैर्य हम खो बैठते हैं।  इसी कारण हमारे जीवन को बदलने की क्षमता रखने वाले अनुभवों से हम वंचित रह जाते हैं।

किसी येसु समाजी भाई ने मुझे अपने जीवन का अनुभव बताते हुए मुझसे एक बार कहा था कि संत इग्नासियुस की आध्यात्मिक साधना से परिचित होने के बाद उनका जीवन बदल ही गया।  उनका यह कहना है कि बचपन से ही वे प्रभु येसु को धर्मशिक्षा तथा प्रवचनों के द्वारा जानते तो थे परन्तु जब उनको संत इग्नासियुस की आध्यात्मिक साधना से परिचित कराया गया तब वे प्रभु येसु को एक मित्र के रूप में अनुभव करने लगे और इसी कारण उनका दृष्टिकोण बदल गया तथा उनका जीवन भी नवीन बन गया।  आज के सुसमाचार द्वारा संत अंद्रेयस हमें भी न्यौता देते हैं कि हम भी पेत्रुस के समान उनके साथ चले और मसीह से मुलाकात करे।  मसीह से मुलाकात से हमारा जीवन भी बदल जायेगा।  मिस्सा बलिदान के समय हम प्रभु के पास आते जो ज़रूर हैं परन्तु परम प्रसाद में उपस्थित प्रभु के अनुभव में ठहरने का धैर्य हम जुटा नहीं पाते हैं।  परमप्रसाद में उपस्थित प्रभु हमें बारंबार निमंत्रण देते हैं।  इस निमंत्रण को सुनने के लिए हमें, समूएल की मनोभावना को अपनाना चाहिए जिन्होंने कहा, ’’हे प्रभु बोल, तेरा दास सुन रहा है’’  आप क्या जवाब देना चाहेंगे?

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