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Sunday Homilies - January 22, 2012
वर्ष का तीसरा इतवार
By फादर जोमी पनिथास

योना 3:1-5,10 1 कुरिन्थियों 7:29-31; मारकुस 1:14-20

 

हमारी छोटी-मोटी गलतियाँ हमें एक दूसरे से अलग कर देती है।  जब तक हम उन गलतियों को भूलकर एक-दूसरे को माफ नहीं करते हैं तब तक हम एक-दूसरे से दूर ही रह जाते हैं, और न केवल एक-दूसरे से बल्कि अपने आप से भी नफ़रत करने लगते हैं।  यही भावना हमें ईश्वर से भी दूर रखती है।  इसलिए हमें मन-परिवर्तन तथा पश्चात्तापप की आवश्यकता है।  आज के तीनों पाठ हमारे पापों के प्रति पश्चात्ताप, मन-परिवर्तन तथा ईश्वर की बुलाहट पर जोर देते हैं।  यह पश्चात्तापप या मन-परिवर्तन हमें जल्दी ही करना चाहिए क्योंकि जैसे संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में कहते हैं, ’’समय थोड़ा ही रह गया है’’ और पाप ईश्वर और हमारे बीच में दीवार बनकर खड़ा है।

ख्रीस्तीय धर्म में पापों के पश्चात्ताप पर इतना जोर क्यों दिया जाता है?  यह इसलिए है कि मानव में ऐसा कोई भी नहीं है जिसने पाप नहीं किया हो।  संत योहन अपने पहले पत्र में कहते हैं, ’’यदि हम कहते हैं कि हम निष्पाप हैं तों हम अपने आप को धोखा दे रहे हैं।’’  हम सब पाप करते हैं और हमारा हर पाप हमें ईश्वर से तथा एक-दूसरे से दूर ले जाता है।  केवल सही पश्चात्तापप ही ऐसा एक रास्ता है जिसके द्वारा हम स्वर्गराज्य में प्रवेष कर सकते हैं, ईश्वर तथा एक-दूसरे से फिर से संबंध जोड़ सकते हैं।  हममें मन-परिवर्तन लाकर हमें स्वर्गराज्य में ले जाने के लिए येसु ख्रीस्त इस धरती में जन्में और हमारे लिए जी कर उन्होंने अपना जीवन त्याग दिया।  इसलिए हमें अपने पापों के लिए पश्चात्तापप करना आवश्यक है।

येसु के पूर्व योहन बपतिस्ता ने भी पश्चात्ताप का अनुरोध किया।  उनका बुलावा हमारे पापों से, बुरी आदतों से, दुर्गुणों से पश्चात्ताप का बुलावा था।  ठीक यही बुलावा नबी योना ने निनीवे के लोगों को दिया था।  निनीवे के लोगों ने उसे तुरन्त अपनाया और उसके जवाब में सभी लोगों ने उपवास किया और टाट ओढ़ ली।  इसी प्रकार योहन बपतिस्ता के ज़माने में भी लोगों ने अपने आपको बदलकर, बुरी आदतों, बुरी संगती तथा गलत कार्यों को छोड़कर नये मार्गों को अपनाया।  अब हम भी दूसरों को यही कहते हैं कि बुरी आदतों को छोड़ दे, बुरा काम न करे इत्यादि।  हम भी संकल्प लेते हैं कि अब से मैं कोई बुरा काम नहीं करूँगा।  लेकिन हम बिरले ही स्वयं को या दूसरों को यह सलाह देते हैं कि हमें अपने आचार-व्यवहार को बदलना है।  यदि हम अपने आचार-व्यवहार को बदलते हैं तो बुरी आदतें, बुरे काम और दुर्गुण अपने आप ही बदल जाते हैं।  योहन ने हमें पश्चात्ताप के लिए बुलाया जबकि प्रभु येसु ने हमें आचार-व्यवहार को बदलने का निमंत्रण दिया।  इसलिए परिवर्तन की आवश्यकता है।

हममें से अनेक ऐसे हैं जो मरने मारने के लिए तैयार हो जाते हैं, पर अपने को बदलना नहीं चाहते हैं।  मान लीजिए कि एक रोगी डाक्टर के पास जाकर अपनी बीमारी बताता है।  डाक्टर उसकी जाँचकर उससे कहता है कि उसकी बीमारी के बारे में उसने अच्छी तरह समझ लिया है, लेकिन दवाई उस रोगी को नहीं बल्कि उसके पड़ोसी को देता है।  यह सुनकर हमें आश्चर्य अवश्य होगा।  वास्तव में हम शायद यही करते हैं।  हम बीमार हैं, परंतु हम चाहते हैं कि और कोई हमारी जगह पर दवाई ले।  हमारी यह सोच है कि दूसरों को बदलने से हम अच्छा जीवन जी सकते हैं।  हम सब दूसरों के, यानि मेरे पिता के, मेरे पुत्र के, मेरी पत्नी के, मेरे पति के, मेरे पड़ोसी, मेरे मालिक के मन-परिवर्तन की कामना करने वाले हैं।  हम खुद को बदलना नहीं चाहते हैं।

पश्चात्ताप तभी शुरू हो सकता जब मैंने अपना आचार व्यवहार बदलने का मन बना लिया हो।  मेरी बीमारी के लिए मुझे ही दवाई लेनी है।  निनीवे के लोगों के समान हमें समय गवाएं बिना हमारे पापों के लिए पश्चात्ताप करते हुए हमारे जीवन को बदलना चाहिए।  आइए हम न केवल प्रभु के पश्चात्ताप के आह्वान को स्वयं ग्रहण करें, बल्कि दूसरों को भी इसी पश्चात्ताप की ओर लाने के लिए शिष्यों के समान सुसमाचार के वाहक बनें।  हमारा जीवन दूसरों के लिए प्रेरणादायक बने।

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