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Sunday Homilies - January 29, 2012
वर्ष का चैथा इतवार
By फादर शैल्मोन अंथोनी

विधि-विवरण 18:15-20; 1 कुरिन्थियों 7:32-35; मारकुस 1:21-28

 

एक व्यक्ति के पास दो कुत्ते थे एक काला और दूसरा गोरा।  ये दोनों बहुत ऊँचे और तगड़े थे।  यह व्यक्ति उनके दोनों कुत्तों को कभी-कभी बाजार लेकर जाता था।  बाजार में वह इन दोनों कुत्तों को आपस में लड़ाते थे।  कुत्तों की लड़ाई देखने के लिए भारी भीड़ आती थी और शर्त लगाती थी।  इस प्रकार यह व्यक्ति बहुत पैसा कमाता था।

एक दिन उसके एक दोस्त ने आकर उसने पूछा, देखो मैंने नोटिस देखा है कि दोनों कुत्ते एक ही प्रकार के है लेकिन हर बार वहीं कुत्ता जीतता है जिस पर तुम शर्त लगाते हो।  इसका क्या कारण है?  यह सुनकर इस आदमी ने कहा यह बहुत सरल है दोनों कुत्ते एक ही समान शक्तिशाली है इसलिए जिस कुत्ते को लड़ाई में हारना है उसको मैं लड़ाई से दो तीन दिन पहले से भूखा रखता हूँ और लड़ाई के दिन दूसरे पर शर्त लगाता हूँ।

यह एक कहानी है लेकिन इस कहानी से हमें एक सबक मिलता है।  यहाँ हमने दो कुत्तों के बारे में (एक काला और एक गोरा) सुना।   ठीक इसी प्रकार हमारे अंदर भी दो प्रकार की शक्तियाँ हैं - अच्छाई की और बुराई की।  और हमारा मन इन दोनों शक्तियों की युद्ध भूमि है।  यह सब का अनुभव है।  इसलिए किसी ने कहा है, “मैं दो सम्मोहक (compelling) शक्तियों के बीच में हूँ, एक में मुझे शरण लेना है और दूसरे के विरुद्ध मुझे लड़ना है या संघर्ष करना है।“  रोमियों के नाम संत पौलुस के पत्र में हम पढ़ते हैं, “मैं अपना ही आचरण नहीं समझता हूँ, क्योंकि मैं जो करना चाहता हूँ, वह नहीं बल्कि वही करता हूँ, जिससे मैं घृणा करता हूँ। रोमियों 7:15  इस प्रकार का संघर्ष येसु के जीवन में भी हुआ था, विशेष करके चालीस दिन बाद हुई परीक्षा (मत्ती 4) और गेथसेमनी में येसु की प्राणपीड़ा (मत्ती 26:36-46) 

अगर इस युद्ध में विजय हासिल करना है तो हमें क्या करना होगा,  हमें बुराई की शक्ति को भूखा मार डालना होगा।  हमें अपने ही विरुद्ध लड़ना होगा।  इसका मतलब यह है कि हमें हमारी शारीरिक वासनाओं एवं अन्य अभिलाषाओं जो ईष्वर के विरुद्ध है के विरुद्ध लड़ना होगा।  यह बहुत कठिन है।  इसलिए कहा गया है कि इस दुनिया का सबसे बड़ा युद्ध अहम के विरुद्ध है। 

इस लड़ाई में विजय हासिल करने के लिए प्रभु येसु ने एक उपाय दिया है।  वह है प्रार्थना एवं उपवास।  हाँ जब शिष्यों ने येसु से पूछा “हम लोग अपदूतों को क्यों नहीं निकाल सके?”  इस पर प्रभु ने कहा कि प्रार्थना तथा उपवास के सिवा किसी और उपाय से अपदूतों की यह जाति नहीं निकाली जा सकती (मत्ती 17:21)  कहने का मतलब यह है कि हमें अपदूतों को अपने अंदर से और किसी अन्य व्यक्ति के अंदर से निकालने के लिए भी प्रार्थना एवं उपवास की आवश्यकता है।

आज के सुसमाचार में हम दो व्यक्तियों को पाते है एक जो अच्छाई की शक्ति से भरपूर है वे है येसु एवं दूसरा जो बुराई की शक्ति से प्रभावित एवं अशुद्ध आत्मा के वश में है।  प्रभु येसु में ईश्वर की कृपा और प्रकाश इसलिए है कि वे चालीस दिन और चालीस रात निर्जन प्रदेश में उपवास और प्रार्थना में लीन रहे (मत्ती 4:1-2)  इस प्रकार वे अपने आप को पूर्ण रूप से पिता परमेष्वर के हाथों में देते हैं (फि़लिप्पियों 2:8) और वह व्यक्ति जो अशुद्ध आत्मा के वष में है वह जन्म से ही ऐसा नहीं था।  क्योंकि हर एक मनुष्य ईश्वर से है।  इसलिए वह उसके जन्म से पवित्र एवं निष्कलंक होता है।  तो हम कह सकते हैं कि वह अशुद्ध आत्मा ग्रस्त व्यक्ति भी पहले पवित्र एवं निष्कलंक था।  लेकिन अलग-अलग, जाने-अंजाने कारणों से उसने अपने आपको अशुद्ध आत्मा के हाथों में दे दिया।

खुशी के बात यह है कि प्रभु येसु इस मनुष्य को चंगा करते हैं।  येसु इस व्यक्ति को अशुद्ध आत्मा की गुलामी से ईश्वर की ओर ले जाते हैं।  इसलिए इस दुनिया में जो भी व्यक्ति अशुद्ध आत्मा के वश में पूर्ण रूप या आंशिक रूप से हो और जो भी व्यक्ति जो बहुत कोशिश करने के बावजूद भी पाप करने की आदत पर काबू नहीं पा रहा हो तो उन्हें निराश एवं हताश होने कि ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनके लिए येसु है जिन्होंने संसार पर विजय पायी है (योहन 16:33)  वे हमें अनाथ नहीं छोड़ना चाहते हैं।

आइए हम पूर्ण विश्वास के साथ प्रभु येसु के पास जायें क्योंकि उन्हीं ने कहा है, “थके-मांदे और बोझ से दबे हुए लोगों तुम सभी मेरे पास आओ।  मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।“ (मत्ती 11:28)

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