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Sunday Homilies - February 05, 2012
वर्ष का पाँचवाँ इतवार
By फादर अंथोनियुस टोप्पो

योब 7:1-4,6-7; 1 कुरिन्थियों 9:16-19,22-23; मारकुस 1:29-39

संघर्ष में छुपा है सुख का रहस्य राज’’  इस संसार में आँख खुलते ही हमारा जीवन-संघर्ष शुरू हो जाता है।  जीने के लिए, सुविधाओं के लिए तथा सम्मान के लिए हम लगातार संघर्ष करते रहते हैं और कई दफा इसमें हम जीत भी जाते हैं।  यह भी कोई असाधारण बात नहीं है कि लोग अपने लक्ष्य तक पहुँचने पर भी स्वयं को विपत्तियों, असंतोष एवं तनाव से घिरा पाते हैं।

            एक भरापूरा परिवार किसे अच्छा नहीं लगता, जहाँ सुबह क्रिसमस, दिन में होली एवं रात में पास्का मनाया जाता है, जहाँ रिश्तों के अर्थ होते है, अपनापन और आत्मीयता होती है?  लेकिन अक्सर मानव प्रवत्ति यह रही है कि जब हमारे जीवन में दुख तकलीफों के बादल छा जाते हैं तो हम परेशान हो जाते हैं।  हम बैचेन हो जाते हैं, हमें न खाने की, न प्रार्थना करने की और न किसी से बात करने की इच्छा होती है।  हम निराश हो जाते हैं और दुःख-तकलीफों का समाधान ढूंढ़ने में लगे रहते हैं।  इस परिस्थिति में हम अपने-आप को कोसने लगते हैं और ईष्वर के विरूद्ध कुड़कुड़ाते हैं। 

            आज हमने योब के जीवन का वर्णन सुना।  योब का जीवन शुरू में खुशियों से भरा हुआ था।  वह स्वयं को बहुत खुश नसीब समझता था।  वह बहुत ही ईमानदार तथा धार्मिक स्वभाव का व्यक्ति था।  उसने अपनी सम्पत्ति का उपयोग अतिथि सत्कार और ज़रूरत मंदों की मदद में किया।  लेकिन उसकी धार्मिकता और ईमानदारी की परीक्षा ली गयी।  श्रृंखलाबद्ध घोर विपत्ति में उसने अपने परिवार, मित्रगणों एवं सम्पत्ति को खो दिया।  इसपर वह प्रार्थना करते हुए ज़मीन पर मुँह के बल गिर पड़ा और कहा, ’’प्रभु ने दिया है, प्रभु ने ले लिया।  धन्य है प्रभु का नाम’’  (योब 1:21)  इन सब विपत्तियों के होते हुए भी योब ने कोई पाप या ईश्वर की निंदा नहीं की।  योब का जीवन चारों ओर से विपत्तियों से घिरा हुआ था।  उसने अपने जीवन में कड़वाहट, घृणा, झूठ और विश्वासघात का अनुभव किया, विशेषरूप से दुःख और पीड़ा का।  कई लोगों का यह विचार है कि उन्हें किसी न किसी पाप के कारण ही दुःख, बीमारी, दुर्घटना आदि का सामना करना पड़ता है।  लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है।  कई बार निष्कंलक तथा निष्पाप लोगों को भी इन मुसीबतों को झेलना पड़ता है।  योब अपने दुःख कष्टों को स्वीकार करता है, वह पिता ईष्वर में अपने विश्वास को कम नहीं होने देता है तथा उम्मीद रखता है कि ईष्वर अपने समय में उसकी सुनेगा।

            जोन एवं रूबी पति-पत्नी थे।  उनका जीवन खुशियों से भरा हुआ था।  परन्तु उनके विवाह के तीन साल बाद एक दुर्घटना में जोन की मृत्यु हो जाती है।  रूबी को इस दुःखद परिस्थिति का सामना करना पड़ता है तथा अपनी दो साल की बेटी की देखरेख अकेले ही करनी पड़ती है।  लेकिन आगे चलते-चलते अपनी जवान बेटी के कैंसर से पीडि़त होने और असमय मर जाने की घटना का सामना भी उसे करना पड़ता है।  उसका दिल टूट जाता है और धीरे-धीरे इस सारे घटनाक्रम के लिये ईश्वर को दोषी ठहराकर रूबी चर्च जाना भी बंद कर देती है।  हम शायद रूबी के समान ईष्वर से पूरी तरह अपना नाता तोड़ नहीं देते होंगे परन्तु अपनी मुसीबतों के सामने हम ईश्वर के विरूद्ध कई बार कुडकुड़ाते हैं। 

            ईश्वर हमारे दुःखों को घटाना चाहते है न कि बढ़ाना।  आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि पेत्रुस की सास को प्रभु चंगा कर देते हैं और उसके बाद शाम होने के बावजूद भी प्रभु एक-एक करके सभी रोगियों को चंगा करते और अपदूतों को निकालते है।  इस प्रकार प्रभु अपने विश्वासियों के दुःखों को दूर करने में लगे रहते हैं।  हमारे जीवन की घटनाओं को खुषी के साथ स्वीकारना और झेलना ख्रीस्तीयों का कर्तव्य बन जाता है।  ख्रीस्तीयों को ईश्वर पर इतना भरोसा होना चाहिए कि प्रेममय पिता के संरक्षण में उसे कोई हानि नहीं होगी।  स्त्रोत 23 में स्रोतकार कहता है, ’’प्रभु मेरा चरवाह है मुझे किसी बात की कमी नहीं।’’  इस प्रकार का विश्वास ख्रीस्तीय जीवन के लिए बहुत ही ज़रूरी है।  ख्रीस्तीय अपने जीवन की सभी घटनाओं को ईश्वर की योजनाओं के अंतगर्त ही देखते हैं।  फलस्वरूप उन्नति में वह घमंड नहीं करता और कठिनाई में वह निराष नहीं होता।  प्रभु पर विश्वास करने वाले प्रभु को ही अपने जीवन के अनुभवों को चढ़ाते हैं और हर प्रकार की परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए सर्वशक्तिमान, सर्वशक्तिसम्पन्न, सर्वगुणसम्पन्न तथा सर्वज्ञ ईश्वर से कृपा माँगते हैं।

            आइए हम ईश्वर से कृपा माँगे की योब की तरह ईश्वर की इच्छा को हर परिस्थिती में स्वीकारने की शक्ति हमें प्राप्त हो।

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