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Sunday Homilies - February 12, 2012
वर्ष का छठवाँ इतवार
By फादर सुसई पी.

 

लेवी 13:1-2, 45-46; 1 कुरिन्थियों 10:31-11:1; मारकुस 1:40-45

लेवी ग्रन्थ से जो पाठ हमने सुना, उसमें ये निर्देष दिय गये हैं कि चर्मरोगी फटे कपड़े पहन ले, उसके बाल बिखरे हुए हो, वह अलग रहे, शिविर के बाहर निवास करे और वह अपना मुँह ढ़क कर अशुद्ध, अशुद्धचिल्लाते रहे।  सुसमाचार में हम यह देखते हैं कि एक चर्मरोगी यानि कोढि़ इन सारे नियमों को तोड़ते हुए चंगाई प्राप्त करने के लिए ईसा के पास आता है।

प्राचीन काल में लोग कोढ़ी को बहुत भयानक एवं अछूत मानते थे।  लोग उस संक्रामक रोग से बहुत डरते थे।  कोढ़ी का जीवन इस कारण बहुत दर्दनाक तथा तिरस्कृत था।  ऐसे ही एक व्यक्ति की मनोव्यथा स्तोत्र ग्रन्थ 31:12-13 में झलकती है।  ’’मेरे परिचित मुझ से भय खाते हैं।  जो मुझे रास्ते में देखते हैं वे मुझ से दूर  भागते हैं।  मैं मरे हुए की तरह भुला दिया गया हूँ, टूटे घडे़ के जैसा फेंक दिया गया हूँ।’’  प्रभु ऐसे ही तिरस्कृत तथा भयानक व्यक्ति के पास चंगाई और अपना प्यार भरा सन्देश लेकर पहुँचते हैं।  वे उन्हें स्पर्ष कर चंगा कर देते हैं।

हमारे जीवन में जब कोई भयानक दुर्घटना घटती है, हमारे प्रियजनों में से कोई गुजर जाता है, दुर्घटना के कारण बच्चा विकलांग हो जाता है या पिता जी को नौकरी से निकाल दिया जाता है - ऐसी स्थिति में हम भी कभी-कभी अपने को अकेला, लाचार और असहाय पाते हैं।  ऐसे में हमारा एकमात्र सहारा प्रभु ही हैं।  हमारा विश्वास हमें ईष्वर के पास ले आता है।  प्रभु हमारे टूटे हुए जीवन को सुधार कर नवीन कर सकते हैं।

इससे भी बड़ी दुर्दशा तब होती है जब हम पापकुण्ड में इतने फंस जाते हैं कि हम ख्रीस्तीय समुदाय से ही अलग हो जाते हैं।  विभिन्न प्रकार के पाप हमारी आत्मा को विकृत बना देते हैं।  हमारे घावों से शत्रुता तथा नफ़रत की दुर्गन्ध निकलती रहती है।  इस शोचनीय स्थिति से बाहर निकलने हेतु हमें ईश्वर की मदद की बडी ज़रूरत होती है।

एक अमेरिकी शहर में एक महिला रहती थी।  वह बचपन से पोलियो से पीडित थी।  वह चल नहीं पाती थी और अपनी बीमारी को लेकर वह ईश्वर के विरुद्ध हमेशा भुनभुनाती रहती थी।  उसके हृदय में ईश्वर तथा अन्य लोगों के प्रति नफ़रत की भावना भरी थी।  एक दिन उसके पड़ोस में एक ख्रीस्तीय परिवार किराये पर रहने लगा।  वह धीरे-धीरे उस परिवार के लोगों के प्यार तथा सहानुभूति का अनुभव करने लगी।  वह उनके पल्ली समुदाय की ओर आकर्षित होने लगी।  इसके साथ-साथ ईष्वर के प्रति उसकी भक्ति तथा प्यार में भी वृद्धि हुई।  वह ख्रीस्तीय विश्वासियों के साथ ज्यादा समय बिताने लगी।

ऐसे में पल्लिवासियों ने एक नये चर्च का निर्माण करने का निर्णय लिया और इसके लिए पैसा इकट्ठा करने लगे।  तो उस स्त्री ने पहले दिन ही 45000 डालर इस कार्य के लिए दिये।  तो लोग अचंभे में पड़ गये और आपस में पूछने लगे कि यह तो गरीब और बीमार स्त्री है, फिर भी यह इतना दान क्यों और कैसे दे पा रही है?  क्यों न ये पैसे उसी के इलाज के लिए ही बचा लेती?  तो उन्होंने कहा,  ’’यह बचपन से आज तक की मेरी कमाई है।  मैं चल तो नहीं सकती, इसलिए मैंने सोचा कि इस पैसे से एक ऐसी गाड़ी खरीद लूँ जिसे विकलांग लोग चला सकते हैं।  लेकिन इस चर्च में शामिल होने के बाद मुझे यह महसूस हुआ कि मेरे शरीर के पोलियों से कहीं अधिक खतरनाक मेरी आत्मा का पोलियों था।  आप लोगों ने इस आन्तरिक पोलियों से मुझे छुटकारा दिलाया।  इसी के धन्यवाद स्वरूप मैं मेरी आज तक की कमाई इस चर्च के निर्माण के लिए अर्पित करती हूँ।  मुझे अब किसी गाड़ी की ज़रूरत नहीं है।’’

बहुत लोगों की मदद से उस चर्च का निर्माण कार्य सम्पन्न हुआ।  नये चर्च के उद्घाटन समारोह में चर्च की आशिष की धर्मविधि के बाद पल्ली के युवक-युवतियों के प्रतिनिधि के रूप में एक व्यक्ति आगे आया।  उसने उस स्त्री की सराहना करने के बाद उसे उस गाड़ी की चाबी सौंप दी जिसे युवक-युवतियों ने मिलकर उसके लिए खरीदी थी।

सुसमाचार में प्रभु एक कोढ़ी को चंगा कर उसके जीवन के दुख-दर्द को मिटा देते हैं।  वे उसे समाज में वापस लाते हैं।  कोढ़ी का मानसिक पीड़ा उसकी शारीरिक पीड़ा से कहीं अधिक दर्दनाक है।  जब कोई व्यक्ति शारीरिक और मानसिक पीड़ा दोनों का शिकार बन जाता है तो वह विचलित होने लगता है।  किसी-किसी का मानसिक संतुलन भी बिगड़ जाता है।  ऐसी स्थिति में उसका ईश्वरीय विश्वास ही उसका सहारा बन सकता है।  इस प्रकार दर्द भोगने वालों को प्रभु चंगाई प्रदान करते हैं।  लेकिन वही इस चंगाई का लाभ पा सकता है जो इसकी तीव्र इच्छा रखता है तथा प्रभु के पास जाता है।  आज प्रभु हम सबको निमंत्रण दे रहे हैं कि हम अपनी बीमारियों तथा अशुद्धता को महसूस कर उनके पास जायें।  वे हमें चंगाई प्रदान करने की इच्छा रखते हैं।  प्रभु के उदाहरण से प्रेरणा पा कर आइए हम भी दूसरों के दुख-दर्द मिटाने में अपना योगदान अवष्य दें।  ईश्वर इस पुण्य कार्य के लिए हमें सक्षम बनायें।

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