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Sunday Homilies - February 19, 2012
वर्ष का सातवाँ इतवार
By फादर माईकल सबास्टीन

 

इसायाह 43:18-19,21-22,24ब-25; 2 कुरिन्थियों 1:18-22; मारकुस 2:1-12

आधुनिक चिकित्सा विधि तथा विज्ञान इस बात से सहमत है कि हमारे मन की दशा का हमारे शरीर पर प्रभाव अवश्य पड़ता है।  जब एक मनुष्य का मन अस्वस्थ्य रहता है तब उसका शरीर भी स्वस्थ्य नहीं रह सकता।  कई मनोवैज्ञानिकों का यह मानना है कि हमारी 60 से 90 प्रतिशत बीमारियाँ मनोदेहिक हैं।  हम अधिकत्तर बीमारियों के शारीरिक कारण ढूँढते हैं परन्तु हमें कुछ ज्ञात नहीं होता है।  समचिकित्सा तथा योग प्रणाली में चिकित्सा के समय रोगी की शारीरिक तथा मानसिक अवस्था पर ध्यान दिया जाता है।  इन प्रणालियों के चिकित्सक मन को शांत करने तथा स्वच्छ वातावरण में रहने पर जोर देते हैं।  श्वास लेने और छोड़ने की प्रक्रिया पर भी वे ध्यान देते हैं।  जब हम गुस्सा करते हैं तो हम जल्दी-जल्दी श्वास लेते हैं और जब हम भयभीत हो जाते हैं तो हमारी श्वास प्रक्रिया मंद हो जाती है। 

            आज के सुसमाचार में प्रभु एक अर्द्धांगरोगी को सम्पूर्ण चंगाई प्रदान करते हैं।  जिस बात को वे ज्यादा महत्व देते हैं उसी का वे पहले ख्याल करते हैं।  इसी कारण प्रभु उस अर्द्धांगरोगी से कहते हैं, ’’तुम्हारे पाप क्षमा हो चुके हैं।’’  इस प्रकार सबसे पहले प्रभु उस रोगी को आध्यात्मिक चंगाई प्रदान करते हैं।  बाद में ही उसे शारीरिक चंगाई प्राप्त होती है।  इस चंगाई का अनुभव वहाँ उपस्थित अन्य लोग भी करने लगते हैं और वे ईश्वर की स्तुति करते हैं।  प्रभु के जीवनकाल में फिलीस्तीन में कई लोगों का यह विचार था कि कोई भी रोग पाप का नतीजा है और किसी रोग की चंगाई पापों की क्षमा के बाद ही होती है।  यह हमारा भी अनुभव है कि जब हम पाप में डूबे रहते हैं तब हम आंतरिक रूप से अर्द्धांगरोगी बन जाते हैं।  हमारा मन और हृदय एक प्रकार की निराशा का गुलाम बन जाता है।  इसी प्रकार दूसरों को क्षमा न करने से भी हम फँसे रहते हैं। 

एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से अनुरोध किया कि कल से प्रवचन में आते समय अपने साथ एक थैली में बड़े-बड़े आलू लेकर आये, और हर एक आलू पर एक ऐसे व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिनसे वे ईष्या करते हैं।  जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों से घृणा करता हो वह उतने आलू लेकर आये।  अगले दिन सभी लोग आलू लेकर आये।  किसी के पास चार आलू थे किसी के पास छः या आठ और प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफ़रत करते थे।  तब महात्मा ने कहा कि अगले सात दिनों तक ये आलू आप सदैव अपने साथ रखे।  जहाँ भी जाए खाते-पीते, सोते-जागते ये आलू आप सदैव अपने साथ रखे।  शिष्यों को कुछ समझ नहीं आया लेकिन महात्मा के आदेश का पालन उन्होंने अक्षरश: किया।  दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों ने आपस में एक-दूसरे से शिकायत करना शुरू कर दी।  आलूओं की बदबू से वे परेशान हो गये।  जैसे तैसे उन्होंने सात दिन बिताये और महात्मा की शरण ली।  महात्मा के पूछने पर शिष्यों ने आप बीती सुनाई।  महात्मा ने कहा, ’’ये सब मैंने आपको एक षिक्षा देने के लिए किया था।  जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईष्र्या या नफ़रत करते हैं उनका बोझ आपके मन पर कितना होता होगा।  सोचिए कि आपके मन और दिमाग की इस ईष्र्या के बोझ से क्या हालत होती होगी?  यह ईर्ष्या हमारे मन पर अनावश्यक बोझ डालती है।  इसके कारण तुम्हारे मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलूओं की तरह।

क्षमा के अभाव में हम भी उस अर्द्धांगरोगी के समान आंतरिक रीति से बीमार हो जाते हैं।  अर्द्धांगरोगी को ईश्वर की क्षमा की बड़ी ज़रूरत थी हम भी ईश्वर से क्षमा प्राप्त करना चाहते हैं।  ईश्वर पिता हमारेप्रार्थना में एक शर्त रखते है-हमें क्षमा कर जैसे हम भी अपने अपराधियों को क्षमा करते हैं  हमें ईश्वर से तभी क्षमा मिलेगी जब हम दूसरों को क्षमा करते हैं।  यह कोई आसान बात नहीं है।  दूसरो से क्षमा माँगने और उन्हें क्षमा प्रदान करने के लिए हमें विनम्र बनना पड़ता है।  क्षमा के अभाव में कितने ही लोगों के वैवाहिक जीवन गतिहीन और दिशाहीन हो जाते हैं?  क्षमा के अभाव में कितने परिवारों के वातावरण बिगड़ जाते हैं।  क्षमा के अभाव में कितने मित्र शत्रु बन जाते हैं?  आइये हम अपने ही बारे में सोचें क्या हमें भी किसी को क्षमा करने या किसी से क्षमा माँगने की ज़रूरत है?  क्षमा का अभाव एक गुलामी है जिसके कारण हम स्वतंत्रता के साथ ईष्वर के सामने प्रस्तुत नहीं हो सकते हैं।  हो सकता है कि हमें किसी ने चोट पहुँचायी हो लेकिन उनके विरूद्ध घृणा की भावना को अपने दिल में पालना अपने ही घर में विषैले साँप को रखने के बराबर है।  जितनी जल्दी हम इस प्रकार की गुलामी से छुटकारा पा सकते हैं उतना ही हमारे लिए लाभप्रद होगा।  आइए इस मिस्सा बलिदान में जोकि चंगाई और क्षमा का संस्कार है हम ईष्वर से सविनय निवेदन करे कि वे हमें आध्यात्मिक तथा शारीरिक चंगाई प्रदान कर हमें पुनः स्वस्थ्य बनाये।

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