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Sunday Homilies - March 11, 2012
चालीसे का तीसरा इतवार
By फादर सीबी जोसफ
निर्गमन 20:1-17; 1 कुरिन्थियों 1:22-25; योहन 2:13-25

 

जब हम प्रांरभिक कलीसिया के इतिहास का अध्ययन करते हैं तो हमें यह देखने को मिलता है कि उस समय तीन पाप संगीन माने जाते थे।  वे हैं, हत्या, मूर्ति-पूजा और व्यभिचार।  पूरी बाइबिल में ईष्वर हमें इन पापों के विरुद्ध सर्तक रहने तथा लड़ने को सिखाते हैं।  आज के पहले पाठ में निर्गमन ग्रंथ के द्वारा ईष्वर देवमूर्तियों की पूजा से बचे रहने के लिए विश्वासियों को चेतावनी देते हैं।  प्रभु कहते हैं कि ’’ऊपर आकाश, या नीचे पृथ्वी तल पर, या पृथ्वी के नीचे के जल में रहने वाले किसी भी प्राणी का चित्र मत बनाओं।  उन मूर्तियों को दण्डवत् करके उनकी पूजा मत करो’’  प्रभु यह भी कहते हैं कि मूर्ति-पूजा करके प्रभु से बैर करने वालों को तीसरी और चैथी पीढ़ी तक वे दण्ड देते हैं।  मूर्ति-पूजा ख्रीस्तीय धर्म के विरुद्ध है।  यह दस आज्ञाओं में पहली आज्ञा के विरुद्ध पाप है।  इस संदर्भ में कुछ गैर-काथलिक भाई-बहन काथलिक विश्वासियों के बीच में गलतफहमी फैलाते हैं।  इन लोगों का आरोप यह है कि प्रभु येसु ख्रीस्त की मूर्ति बनाकर उसके सामने सिर झुकाकर काथलिक विश्वासी मूर्ति-पूजा करते हैं।  काथलिक परपंरा को ठीक रूप से समझ न पाने के कारण ही ये लोग काथलिक विश्वासियों पर यह आरोप लगाते हैं।  इस बात को समझने के लिए हमें विधि-विवरण ग्रंथ 4:15-16 का अध्ययन करना चाहिए।  ’’जिस समय प्रभु ने होरेब पर्वत पर अग्नि के भीतर से तुम्हारे साथ बात की, तुमने कोई आकृति नहीं देखी।  इसलिये सावधान रहो।  तुम भ्रष्ट न हो जाओं और अपने लिए किसी प्रकार की मूर्ति नहीं बनाओं’’  प्रभु का यह कहना है जब तक हम उनकी आकृति नहीं देखते हैं तब तक हमें कोई मूर्ति नहीं बनाना चाहिए।  प्रभु येसु ईष्वर की आकृति है।  ईष्वर ने नाज़रेथ के येसु में अपने आपको प्र्रकट किया।  उनमें ईश्वर मनुष्य बन गये।  ईश्वर ने कहा था कि हम तब तक मूर्ति न बनाये जब तक हम उनकी आकृति नहीं देखते हैं।  तो जब ख्रीस्तीय विष्वासी प्रभु येसु की मूर्ति बनाते है तो वे ईष्वर की उस मानवीय आकृति के जरिए ईष्वर की ही आराधना तथा पूजा करते हैं। 

आज के पाठ हमें सचेत करते हैं कि जो कुछ हमें ईष्वर से अलग करते हैं या दूर रखते हैं उससे हमें दूर रहना चाहिए।  सुसमाचार में हम देखते हैं कि येरुसालेम मंदिर में प्रवेष करके प्रभु उसकी पवित्रता को दूषित करने वाली सभी चीज़ों को वहाँ से निकाल फैंकते हैं।  उन्होंने मंदिर को बाजार बनाने वाले सभी लोगों को वहाँ से भगाया तथा वहाँ से बैल, भेड़े और कबूतर बेचने वालों को रस्सियों के कोड़े से मारकर बाहर निकाल दिया।  यह सब उन्होंने अपने पिता के घर के प्रति उत्साह के कारण किया।  सुसमाचार हमें यह नहीं बताता कि क्या किसी ने प्रभु के इस कार्य पर एतराज जताया।  परन्तु यहूदियों ने येसु से यह ज़रूर कहा, ’’आप हमें कौन-सा चमत्कार दिखा सकते हैं जिससे हम जानें कि आपको ऐसा करने का अधिकार है’’  इसके उत्तर में प्रभु कहते हैं, ’’इस मंदिर को ढहा दो और मैं इसे तीन दिनों के अंदर फिर खड़ा कर दूँगा’’  जब यहूदी लोग कहते हैं कि छियालिस वर्षों में बने इस मंदिर को आप कैसे तीन दिनों के अंदर बनाने का दावा कर सकते हैं?  सुसमाचार के लेखक कहते है कि येसु अपने शरीर के मंदिर के विषय में कह रहे थे और प्रभु के पुनरूत्थान पर ही लोगों ने इस कथन का अर्थ समझा। 

प्रभु येसु ही ईश्वर का मंदिर हैं।  मंदिर ईश्वर का निवास स्थान है।  प्रभु ईश्वर भी है एवं मंदिर भी, क्योंकि वे ईश्वर का मानवीय रूप हैं।  पुनरूत्थान के बाद प्रभु येसु अपने विश्वासियों के बीच उपस्थित रहते हैं।  इसी कारण विश्वासियों का समुदाय ईश्वर का मंदिर है।  संत पौलुस कहते हैं, ’’आप लोगों का निर्माण उस भवन के रूप में हुआ है, जो प्रेरितों तथा नबियों की नींव पर खड़ा है और जिसका कोने का पत्थर स्वयं ईसा मसीह हैं।  उन्हीं के द्वारा समस्त भवन संघटित होकर प्रभु के लिए पवित्र मंदिर का रूप धारण कर रहा है।’’ (एफेसियों 2:20-21)  ’’हम जीवंत ईश्वर के मंदिर हैं, जैसा कि ईश्वर ने कहा है - मैं उनके बीच निवास करूँगा और उनके साथ चलूँगा।’’ (2 कुरि. 6:16)  संत पेत्रुस भी हमसे आग्रह करते हैं कि हम जीवंत पत्थर प्रभु येसु के पास जाकर जीवंत पत्थरों का आध्यात्मिक भवन बनें। (देखिये 1 पेत्रुस 2:4-5)  विश्वासियों का समुदाय वह आध्यात्मिक भवन या मंदिर है जिसे हमें पवित्र रखना चाहिये। 

इसी प्रकार हमारे शरीर को भी संत पौलुस ईश्वर का मंदिर कहते हैं।  ’’क्या आप लोग यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मंदिर है?  वह आप में निवास करता है और आप को ईष्वर से प्राप्त हुआ है।  आपका अपने पर अधिकार नहीं है; क्योंकि आप लोग कीमत पर खरीदे गये हैं।  इसलिए आप लोग अपने शरीर में ईष्वर की महिमा प्रकट करें।’’ (1 कुरिन्थियों 6:19-20)  जिस प्रकार प्रभु येसु ने येरुसालेम के मंदिर की पवित्रता को दूषित करने वाले सभी लोगों का वहाँ से भगाया उसी प्रकार ख्रीस्तीय समुदाय रूपी मंदिर तथा हमारे शरीर रूपी मंदिर की पवित्रता को दूषित करने वाले सभी ताकतों से हमें लड़ना होगा।  ख्रीस्त से प्राप्त शक्ति से ही हम इस लड़ाई में विजय हासिल कर सकते हैं।  आइए हम सबको पवित्र तथा नवीन बनाने वाले येसु को हमारे बीच में आमंत्रित करें कि वे इस पवित्रीकरण में हमारी सहायता करें।

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