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Sunday Homilies - March 18, 2012
चालीसे का चैथा इतवार
By फादर सुसई पी.
2 इतिहास ग्रंथ 36:14-16, 19-23; एफ़ेसियों 2:4-10; योहन 3:14-21

 

हम मानवजाति के इतिहास में विभिन्न धर्मों में बलिदान की पंरपरा को देखते हैं।  हर धर्म में लोग विभिन्न वस्तुओं को बलि के रूप में ईश्वर को चढ़ाते हैं।  जब हम इन परंपराओं पर नज़र डालते हैं तब हमारे सामने इन बलिदानों के तीन प्रमुख भाग प्रकट होते हैं।  पहला, मनुष्य का चढ़ावा, दूसरा ईश्वर की स्वीकृती एवं तीसरा, ईश्वर और मनुष्य के बीच आदान-प्रदान।  मनुष्य ईष्वर को कुछ चढ़ाता है।  ईश्वर उस चढ़ावे को ग्रहण करते हैं।  ईष्वर भेंट चढ़ाने वाले मनुष्य के साथ मिलकर प्रीति भोज के सहभागी बनते हैं।  हम देखते हैं कि विभिन्न प्रार्थना सभाओं के बाद लोग प्रसाद बंटाते हैं।  इसपर हम मन्न् चिंतन करे तो हमें यह ज्ञात होता है कि धार्मिक बलिदान किसी धार्मिक विधि तक सीमित न रहकर ईश्वर एवं मनुष्य के बीच संबंध को मज़बूत बनाने में साधन बनता है।  जब हम इस दृष्टि से देखते हैं तो इस दुनिया में जितने भी बलिदान चढ़ाये गये है उनमें क्रूस का बलिदान सर्वप्रथम एवं सर्वश्रेष्ठ है।

            आज के पाठ क्रूस के इस महत्व को दर्शाते हैं।  सुसमाचार में हमने प्रभु येसु और निकोदेमुस के संवाद को सुना।  निकोदेमुस बहुत ही ज्ञानी व्यक्ति थे।  प्रभु येसु योहन 3:10 में उन्हें इस्राएल के गुरू कहते हैं।  प्रभु येसु निकोदेमुस से कहते हैं कि, ’’जिस तरह मूसा ने मरूभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है, जिससे जो उसमें विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’  निकोदेमुस को इस्राएल के गुरू होने के कारण यह मालूम था कि प्रभु पुराने विधान के किस घटनाक्रम का जि़क्र कर रहे थे।  उत्पत्ति ग्रंथ में हम देखते है कि साँप मृत्यु का कारण बनता है।  मरूभूमि में जब विषैले साँप ने इस्राएलियों को काटा था तो प्रभु ने मूसा को यह आदेश दिया था कि वे काँसे के साँप को बनाये ताकि लोग विषैले साँप के काटने पर काँसे के साँप की ओर देखकर मरने से बच जाये।  जब प्रभु येसु मानव पुत्र के ऊपर उठाये जाने की बात करते हैं और उसकी तुलना मूरूभूमि में उठाये काँसे के साँप से करते है तो ज्ञानी निकोदेमुस खुले दिल से सच्चाई की तलाश करते हैं एवं वे भली भांति इसका अर्थ समझ जाते हैं।

चालीसे का समय हमें प्रेरित करता है कि हम प्रभु येसु के क्रूस पर ऊपर उठाये जाने के महत्व पर मन्न् चिंतन करें।  क्रूस का बलिदान ईष्वर और मानव का बलिदान है।  मानव पुत्र के ऊपर उठाये जाने की स्मृति में यूखारिस्तीय समारोह में याजक पवित्र रोटी को पहली बार ऊपर उठाते हैं।  रोटी तैयार करने के बाद पुरोहित रोटी को ऊपर उठाकर पृथ्वी की उपज़ एवं मानव के परिश्रम के फल को पिता ईश्वर को समर्पित करते हैं।  यह सारी मानव जाति की ओर से पूजन समुदाय का चढ़ावा है।  जब इस प्रकार रोटी उठाई जाती है तब निर्बल एवं अयोग्य मानव की ईश्वर के समक्ष यह कामना प्रकट होती है कि उसके परिश्रम को ईश्वर अपनी आशिष से सफल बनायें।  दूसरी बार प्रभु येसु की ही आशिष की प्रार्थना के शब्दों को दोहराते हुए जब याजक रोटी को ऊपर उठाते हैं तो मानव के बलिदान को ईश्वरीय स्वीकृती प्रकट होती है।  पुरोहित तीसरी बार रोटी को ऊपर उठाकर बलिदान को ईश्वर के पुत्र के द्वारा, उन्हीं के साथ और उन्हीं में परम पिता को चढ़ाते हैं तो पुनः पूजन समुदाय पास्का रहस्य की ऊँचाई को छू लेता है।  चैथी बार पुरोहित रोटी को ऊपर उठाकर ईष्वर और मानव के संबंध को मज़बूत करने हेतु विश्वासीगणों को निमंत्रण देते हैं कि वे ईष्वर के प्रीति भोज में भाग ले और ईश्वर के ही जीवन भाग बन जाये।

इस प्रकार बार-बार रोटी को ऊपर उठाकर पुरोहित पूरे पूजन समुदाय से आह्वान करते हैं कि वे मानव पुत्र के ऊपर उठाये जाने के महत्वपूर्ण रहस्य में शामिल हो जाये।  जब कभी हम यूखारिस्तीय समारोह में भाग लेते हैं तो अपने आपको बारंबार याद दिलाना चाहिए कि हमें भी उसी प्रभु के साथ ऊपर उठाया जाना है।  प्रभु हमें ऊपर उठाने के लिए ही इस धरती पर आये हैं।  ऊपर उठाये जाने का यह भी अर्थ है कि हम हमारे इस जीवन को स्वर्ग की ओर बार-बार उठाये ताकि ईष्वर उसे ग्रहण कर हमारे प्रयत्नों पर आशिष दे।  इस चालीसे काल में प्रभु हमें निमंत्रण देते हैं कि हम हमारे दैनिक जीवन के कार्य-कलापों को प्रभु के क्रूस के साथ परमपिता के समक्ष समर्पित करे।  यही नये विधान की मुक्ति का संदेश है।  मुक्ति के संदेष का केन्द्र बिन्दु क्रूस है और इसी केन्द्र बिन्दु को समझने के लिए प्रभु येसु न केवल निकोदेमुस को निमंत्रण देते हैं बल्कि हम में से हर एक ख्रीस्तान के लिए यह एक निमंत्रण एवं चुनौती है।

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