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Sunday Homilies - April 05, 2012
पवित्र गुरुवार
By फादर फ्रांसिस स्करिया
निर्गमन 12:1-8,11-14; 1 कुरिन्थियों 11:23-26; योहन 13:1-15

 

आज की धर्मविधि और पाठों में चार प्रमुख बातें हमारे सामने आती हैं।  वे हैं (1) यूखारिस्तीय संस्कार की स्थापना, (2) पुरोहिताई संस्कार की स्थापना, (3) प्रेम की नई आज्ञा, तथा (4) सेवा का महत्व।

योहन 13:1 में सुसमाचार का लेखक कहता है कि प्रभु येसु अब अपने प्रेम का सबसे उत्तम प्रमाण देने वाले थे।  प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है?  इस विषय में प्रभु स्वयं कहते हैं, ’’इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित कर दे’’ (योहन 15:13)  प्रभु येसु स्वयं यह उत्तम प्रमाण अपना जीवन देकर देते हैं।  इसी जीवन की आहुति को प्रभु पवित्र यूखारिस्तीय संस्कार का रूप देते हैं।  कलवारी पहाड़ पर अपने जीवन का बलिदान देकर उन्होंने प्रेम का उत्तम प्रमाण दिया।  हर यूखारिस्तीय समारोह में प्रभु येसु इसी बलिदान में हमें भी सहभागी बनाते हैं।  जब मिस्सा बलिदान चढ़ाया जाता है तब प्रभु येसु स्वयं बलिवस्तु, बलिवेदी तथा याजक बनकर अपने प्राण परमपिता को अर्पित करते हैं।  जब हम इस बलिदान में भाग लेते हैं तब हमें भी सांस्कारिक रूप से प्रभु येसु ख्रीस्त के साथ-साथ अपने-अपने जीवन को भी परमपिता को अर्पित करने का अवसर मिलता है।  यह एक सांस्कारिक अभिव्यक्ति से समाप्त नहीं होता बल्कि इससे हमारे जीवन को यह प्रेरणा मिलती है कि हम अपने वास्तविक जीवन से दूसरों को प्रेम का प्रमाण देते रहें।  यूखारिस्तीय समारोह हम में यह चेतना जगाता है कि हम दूसरों की सेवा में अपना जीवन बितायें, अपना जीवन दूसरों की भलाई के लिए अर्पित करें।

परम प्रसाद में अपना शरीर और रक्त हमें प्रदान कर प्रभु येसु हमें अपने ही शरीर का भाग बनाते हैं।  उनके रक्त का संचार हमारी नस-नस में होने लगता है।  वे हमें मज़बूत बनाते हैं कि हम अपना जीवन दूसरों के लिए जीये। 

आज हम पुरोहिताई संस्कार की स्थापना की भी याद करते हैं।  पुरोहित का जीवन प्रेम का प्रमाण है।  वह अपने परिवार को छोड़कर ईश्वर के परिवार को, ईश्वर की सन्तानों के परिवार को अपनाता है।  पुरोहित के इस नये परिवार में जो संबंध कायम है, वह खून का नहीं, बल्कि वचन और संस्कार का है जो खून से भी अधिक मज़बूत है।  पुरोहित दूसरों के लिए जीने और मरने के लिए बुलाये गये हैं।  आज भी प्रभु सैकड़ों युवकों को इस पवित्र कार्य के लिए बुलाते हैं।  परन्तु कई लोग इस बुलावे की आवाज़ सुन नहीं पाते या सुनना नहीं चाहते हैं।  उन्हें दूसरी आवाज़ें और अधिक जोर से सुनाई देती है या और अधिक मीठी लगती है।  आज हमारी यह प्रार्थना है कि ज्यादा से ज्यादा लोग प्रभु के बुलावे को स्वीकार करें और जो उसे स्वीकार करते हैं उसी के अनुसार आचरण भी करें।

आज की धर्मविधि में तीसरी बात जो हमारे सामने आती है, वह प्रेम की नई आज्ञा की है।  पुराने व्यवस्थान में बदला या प्रतिकार को सीमित रखने की चेष्ठा हमें देखने को मिलती है।  इसी कारण लोगों को ’’आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत’’ का नियम दिया गया था।  इसका मतलब है, जितना तुम्हें भोगना पड़ता है उतना ही तुम्हें प्रतिकार करने का अधिकार है।  लेकिन प्रभु शत्रुओं को प्रेम करने को सिखाते हैं और अत्याचार करने वालों को क्षमा प्रदान करने का अह्वान करते हैं।  प्रभु को मालूम था कि शिष्यों में से एक उन्हें पकड़वाने वाला था और दूसरा उनको अस्वीकार करने वाला।  उन्हें यह भी मालूम था बाकी शिष्य भाग जायेंगे।  फिर भी वे उस अवसर पर अपने प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण देते हैं।  उन्हें यह भी मालूम था कि यहूदी नेता उनका विरोध कर रहे हैं और जिन्हें उनसे चंगाई मिली थी, जिनकी भूख उन्होंने मिटायी थी और जिनकी मदद उन्होंने की थी वे सब-के-सब उन्हें छोड़कर भाग जायेंगे।  इस पर प्रभु न तो प्रतिकार का शिकार बनते हैं और न ही निराशा में पड़ जाते हैं।  बल्कि जब वे सबसे ज्यादा नफ़रत तथा तिरस्कार पाते हैं तब वे सबसे ज़्यादा प्रेम करते हैं।  वे अपने प्रेम का सब से उत्तम प्रमाण दे कर अपने जीवन की कुर्बानी उन्हीं लोगों की मुक्ति के लिए देते हैं जो उनके विरुद्ध षड़यंत्र रचते हैं।  यह नमूना प्रस्तुत करते हुए प्रभु अपने शिष्यों को प्रेम की नई आज्ञा देते हैं।  इसलिए वे अपने को नमूने के रूप में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, ’’जिस प्रकार मैंने तुम लोगों को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक-दूसरे को प्यार करो।’’ (योहन 13:35)

इस अवसर पर प्रभु सेवा का महत्व भी हमें समझाते हैं।  सुसमाचार की कुछ प्रमुख घटनाएं केवल संत योहन के सुसमाचार में ही हम पाते हैं जैसे काना का विवाह-भोज, प्रभु से समारी स्त्री की मुलाकात, प्रभु से निकोदेमुस की रात में भेंट, लाज़रुस को जिलाना आदि।  इसी प्रकार प्रभु द्वारा अंतिम भोज के समय शिष्यों के पैर धोये जाने की घटना भी सन्त योहन के सुसमाचार में ही हम पाते हैं।  सन्त लूकस के सुसमाचार (अध्याय 22) के अनुसार परम प्रसाद की स्थापना के तुरन्त बाद ही शिष्यों में यह विवाद छिड़ गया कि हम में किस को सबसे बड़ा समझा जाना चाहिए।  शायद इसी संदर्भ में ही प्रभु भोजन पर से उठकर अपने कमर में अंगोछा बाँध कर, एक दास के समान परात में पानी भर कर अपने ही शिष्यों के पैर धोते हैं तथा उन्हें इसी प्रकार दूसरों की सेवा करने का आदेश देते हैं।

आइए हम भी अपने प्रेम का प्रमाण सेवा तथा बलिदान में प्रकट करें।  यह यूखारिस्तीय समारोह हमें इसके लिए प्रेरित करे।

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