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Sunday Homilies - April 22, 2012
पास्का का तीसरा इतवार
By फादर अजय एक्का
प्रेरित चरित 3:13-15,17-19; 1 योहन 2:1-5; लूकस 24:35-48

 

आज का पहला पाठ मसीह के दुःखभोग, मरण और पुनरूत्थान की ओर हमारा ध्यान आकर्शित करता है।  संत पेत्रुस यहूदियों के सामने येसु के पुनरूत्थान का साक्ष्य देते हुये कहते हैं- ’’भाइयों! आप लोग इस पर आश्चर्य क्यों कर रहे हैं?  आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।’’  वे आगे कहते हैं, ’’आप लोगों ने संत धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।  जीवन के अधिपति को को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया।’’

यदि आप बाइबिल के उन पृष्ठों पर दृष्टिपात करेंगे जो पुनरूत्थान संबंधित विवरणों को प्रस्तुत करते हैं तो पायेंगे कि ईसा की मृत्यु और पुनरूत्थान को किस विशालता से चित्रित किया गया है।  प्रायः प्रेरित चरित का प्रत्येक उपदेश क्रूसारोपण और पुनरूत्थान के चिह्न को अत्यंत केन्द्र में रखता है।  जब प्रथम शहीद स्तेफ़नुस मारे गये तब वे ईसा मसीह के यशस्वी पुनरूत्थान के दृश्य को निहारते हुए मरे।  सैकड़ो और हजारों शहीदों ने अत्यंत जघन्य मृत्यु का अनुसरण इसलिये किया कि ईसा मसीह मृत्यु से जी उठे।  यदि यह मात्र एक कल्पित कथा होती तो इतने सारे स्त्री-पुरूष अपने प्राणों की बलि नहीं चढ़ाते।

अब प्रष्न उठता है- ख्रीस्तीयों के जीवन में ये घटनाएं क्यों इतना महत्व रखती है?

ईसा मसीह ने अपनी मृत्यु के पूर्व बारह प्रेरितों के साथ अंतिम भोजन के समय कहा, ’’ अब मैं उनके पास जा रहा हूँ, जिससे मुझे भेजा . . . तुम्हारा कल्याण इसी में है कि मैं चला जाऊँ।  यदि मैं नहीं जाऊँगा तो सहायक तुम्हारे पास नहीं आयेगा।’’ (देखिये योहन 16:5-7)  यह वही ईश्वर का आत्मा, मसीह का आत्मा था जो ईसा के जीवनकाल में उनमें या उनके द्वारा क्रियाशील रहा।  आत्मा ईसा मसीह को परीक्षण के मरूस्थल में ले गया।  उन्होंने उन्हें जीवन लक्ष्य दिया और आश्चर्यजनक उपदेश देने के लिए चमत्कार करने की शक्ति प्रदान की।  किन्तु आत्मा ईसा के भौतिक, शारीरिक काया से सीमित था।  परन्तु जब वे पुनर्जीवित शरीर में महिमा मंडित हुये तब उनके द्वारा आत्मा सम्पूर्ण विश्व को प्रेरित और प्रोत्साहित करते हुए सभी ख्रीस्तीयों पर क्रियाशील हो सके।

इस प्रकार मसीही विश्वास, मृत्यु तक सीमित नहीं है।  ख्रीस्तीय केवल इसलिए जीवित, क्रियाशील और अपने धर्माचरण में संलग्न हैं कि जीवंत पुनर्जीवित मसीह आत्मा के द्वारा उन्हें प्रेरित करते हुए उनके साथ हैं।  मात्र पुनरूत्थान के कारण ही मैं और आप एक ख्रीस्तीय हैं और इसी प्रकार विश्व के करोड़ों ख्रीस्तीय भी पुनरूत्थान के कारण ही ख्रीस्तीय हैं।

निश्चय ही यह नितांत सत्य है कि बिना पुनरूत्थान के ख्रीस्तीय धर्म है ही नहीं।  उन्नीस सौ वर्ष पूर्व पौलुस ने यह स्पष्ट किया था, ’’यदि ईसा मसीह पुनर्जीवित नहीं हुए तो तुम्हारा विश्वास एक विभ्रम है और अभी भी तुम अपने पापों में हो’’  अंततः पुनरूत्थान का प्रमाण न तो खाली कब्र में है और न ही विवरणों या साक्ष्यों में, भले ही ये विश्वास दृढ़ करने में सहायक होते हैं।  ईसा मसीह की मृत्यु और पुनरूत्थान का प्रमाण दो हजार वर्षों की ईसाइयत में है जिसका अस्तित्व इन घटनाओं के बिना संभव नहीं होता।  कलीसिया के प्रारंभिक इतिहास में स्पष्ट है कि यहूदी नेताओं की सभा ईसाइयों को नष्ट कर देने का सर्वोत्तम रास्ता ढ़ूँढ़ने का प्रयास कर रही थी।  चर्चा के दौरान एक बुद्धिमान व्यक्ति ने एक साधारण सत्य को मार्मिक ढंग से इस प्रकार प्रस्तुत किया, ’’यदि यह योजना या आन्दोलन मनुष्यों का है, तो यह अपने आप नष्ट हो जायेगा।  परन्तु यदि यह ईश्वर का है, तो आप इन्हें नहीं मिटा सकेंगे और ईश्वर के विरोधी प्रमाणित होंगे।’’ (प्रेरित चरित 5:38-39)

संत योहन अपने पहले पत्र में कहते हैं कि येसु मसीह हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए क्रूस पर मर गये और ईश्वर से हमारा मेल कराया।  यदि हम येसु के प्रेम का उत्तर देना चाहते हैं तो हमें उनकी आज्ञाओं का पालन करना चाहिए।  उनकी आज्ञाएं क्या है?  हम एक-दूसरे को प्यार करे।  ’’जो अपने भाई को प्यार करता है, वह ज्योति में निवास करता है और कोई कारण नहीं कि उसे ठोकर लगे।  परन्तु जो अपने भाई से बैर करता है, वह अंधकार में है और अंधकार में चलता है।’’(1 योहन 2:10-11)  हम जानते हैं कि हमने मृत्यु से निकल कर जीवन में प्रवेश किया है क्योंकि हम अपने भाइयों एवं बहनों को प्यार करते हैं।  जो प्यार नहीं करता, वह मृत्यु में निवास करता है।  जो अपने भाई-बहनों से बैर करता है वह हत्यारा है।  हम सब जानते हैं कि किसी भी हत्यारे में अनन्त जीवन नहीं होता।  हम प्रेम के मर्म को इसी से पहचान जाते हैं कि ईसा ने हमारे लिए अपना जीवन अर्पित किया और हमें भी अपने भाइयों एवं बहनों के लिए अपना जीवन अर्पित करना चाहिए।

हम संत योहन के पहले पत्र 3:18 में पढ़ते हैं- ’’हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, हृदय से एक दूसरे को प्यार करें’’

मनुष्य की प्रकृति इस तरह की है कि वह बिना कर्म किए रह नहीं सकता।  वह हर हाल में कर्म करता रहता है।  कभी वह मोहवश काम करता है तो कभी अनजाने में लेकिन कर्म उसे करना ही पड़ता है।  संतजन मुनष्य को उस तरह का कर्म करने के लिए कहते हैं जिससे दूसरों का भी भला हो।  सभी संत अपने-अपने ढंग से मनुष्य को परहित की शिक्षा देते हैं।  जब तक मनुष्य के कर्म स्वैच्छिक न हों तब तक उसका उत्तम फल नहीं मिलता और बिना सोचे-समझे किए गए कर्म भी उत्तम फल नहीं देते।

अभिमान से मुक्त और फल को न चाहने वाले मनुष्य के कर्म उत्तम कर्म कहलाते हैं।  जब तक कर्म करने में आनन्द नहीं आता है मनुष्य आनंदित नहीं हो सकता है।  आनन्द कर्म में छिपा होता है न कि फल में।

जो कर्म में ही आनन्द को ढूंढ लेता है उसे फल ही इच्छा नहीं रहती है।  लेकिन कर्म करने में कुशलता भी होनी चाहिए।  मनुष्य बिना फल की कामना के कर्म नहीं कर पाता है।  फल दिखाई न दे तो मनुष्य कर्म करने में कुशलता नहीं रख पाता।  ऐसा अधिकांश मनुष्यों के साथ होता है।

जब तक फल का पता न हो तब तक हम कर्म नहीं करते है।  मनुष्य जब स्वैच्छिक रूप से कुशलता के साथ कर्म करता है तब उसे आनन्द रस की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है।  आनन्द प्राप्ति का एकमात्र मार्ग यही है अपने कर्मों को स्वैच्छिक रूप से ईश्वर की आज्ञा समझकर किया जाए।  अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिए।  ईश्वर के समक्ष कर्म समर्पण करने से फल की इच्छा नहीं रह जाती है।  समर्पित कर्म में कुशलता अधिक रहती है।  समर्पित कर्म में मनुष्य की योग्यता बढ़ती है, उसकी दक्षता निखरती है।  योग्य, कुशल और अभिमान से मुक्त मनुष्य के कर्म सर्वश्रेष्ठ होते हैं। 

जी हाँ, प्यारे भाइयों एवं बहनों हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त मनुष्य बनकर इस धरती पर आये और अपने पिता के कर्मों के द्वारा ही अपने आप को सर्वश्रष्ठ तथा ईश्वर का पुत्र साबित किया।  उन्होंने पिता की आज्ञा अनुसार उनके कार्यों तथा कर्तव्यों को निभाया।  पिता की आज्ञा को पूरी करने के लिए उन्होंने अपने प्राण त्याग देने से भी इंकार नहीं किया।  क्रूस मरण तक वे आज्ञाकारी बने रहें।  पिता के सेवाकार्य को पूरा करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।  इससे बढ़कर कोई बलिदान नहीं।  इसलिये येसु का दुःख मरण एवं पुनरूत्थान हम ख्रीस्तीय भाई-बहनों के लिए प्रेरणा तथा चिह्न है।

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