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Sunday Homilies - May 20, 2012
पवित्र शुक्रवार
By फादर थोमस फि़लिप
इसायाह 52:13-53:12; इब्रानियों 4:14-16:7-9; योहन 18:1-19,42

एक फौजी अपने माँ-बाप को फोन पर बताता है कि वह छुट्टी पर घर आ रहा है।  माँ-बाप खुश हो जाते हैं।  वह यह भी कहता है कि उसने साथ उसका एक दोस्त भी आ रहा है।  यह सुनकर माँ-बाप और भी खुश हो गये।  लेकिन बेटे ने आगे कहा कि एक बम धमाके में उसके दोस्त का एक पैर और हाथ नष्ट हो गया है।  तब उसके माता-पिता ने निराशाजनक लहज़े में कहा, अगर ऐसा है तो हमारे लिए उसकी देखभाल करना मुशकिल होगा।  इसलिये उन्होंने उस दोस्त को अपने साथ लाने से मना कर दिया।  वह अपने दोस्त को नहीं छोड़ सकता था इसलिए उसने कहा कि वह अपने दोस्त की देखभाल स्वयं करेगा।  लेकिन माता-पिता ने उसकी बात नहीं मानी और फोन रख दिया।  एक सप्ताह के बाद उसके माता-पिता को पुलिस ने फोन करके थाने में बुलाया।   जब वे मुरदाघर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि उनके बेटे का एक हाथ और पैर नहीं था।  पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक उसने आत्महत्या कर ली थी।  अपनी नयी विकलांग दशा के बारे में अपने ही माता-पिता के मनोभावों को जानने के लिए ही उसने अपने काल्पनिक दोस्त की विकलांगकता का जि़क्र किया था। 

इस दुनिया में कई लोग दूसरों को प्यार करने का दावा करते हैं।  कोई दूसरों के पैसे या संपत्ति के लालच तो कोई अपने स्वार्थ के लिए इस प्रकार का दावा करते हैं।  इस दुनिया में माँ की ममता सच्चे और गहरे प्यार का नमूना मानी जाती है।  फिर भी समाचार पत्रों में या टेलीविज़न में हम कभी-कभी कुछ चैकानें वाले घटनाक्रम के बारे में पढ़ते या सुनते हैं जहाँ एक माँ ही अपने बच्चे की हत्या करती है, बच्चे को बेच देती है या उसे कूड़ेदान में फेंक देती है।  पुराने विधान में हम पढ़ते हैं कि प्रभु अपने प्रेम को माँ की ममता से भी ज्यादा श्रेष्ठ बताते हैं।  ’’क्या स्त्री अपना दुधमुँहा बच्चा भूला सकती है?  क्या वह अपनी गोद के पुत्र पर तरस नहीं खायेगी?  यदि वह भूला भी दे, तो भी मैं तुम्हें नहीं भुलाऊँगा।’’ (इसायाह 49:15)  किसी के प्यार का प्रमाण निष्ठा तथा बलिदान की भावना ही दे सकती है।  हम जिससे प्यार करते हैं उसके लिए हम समय निकालते हैं, अपना पैसा खर्च करते हैं और तकलीफ उठाते हैं।  हम उसकी हर संभव मदद करते हैं और उसकी भलाई की कामना करते हैं।  जब हमें कुछ मुसीबतों का सामना भी करना पड़ता है तो प्यार के खातिर हम उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।  सच्चे प्यार की परख निस्वार्थ भावना में होती है इसी कारण नये विधान में प्रभु हमें बताते हैं, ’’इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिए अपने प्राण अर्पित कर दे।’’ (योहन 15:13)  प्रभु की यह शिक्षा शब्द मात्र तक सीमित न रहकर प्रभु के जीवन और मरण में हमें देखने को मिलती है।  प्रभु येसु ने अपने जीवन के द्वारा हर मनुष्य के प्रति अपना प्रेम दिखाया।  प्रेम से प्रेरित होकर ही प्रभु ने कोढ़ी को चंगा किया, मुरदों को जिलाया और भूखों को खिलाया।  कोढ़ी को जिसे लोग अछूत मानते थे प्रभु ने प्यार से स्पर्श कर शुद्ध किया।   प्रभु ने मृत बालिका को प्यार से प्रेरित होकर, हाथ पकड़कर जीवनदान दिया।  भूखें लोगों को देखकर प्रभु को तरस आया और प्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने उनको खिलाया।  प्रेम के कारण ही प्रभु ने पापियों का आतिथ्य स्वीकार किया तथा नाकेदारों के साथ दोस्ती का हाथ बटाया।  उन्होंने अपने शिष्यों को मित्र कहकर संबोधित किया।  अंत में पापी मानवजाति के प्रति प्रेम से प्रेरित होकर उन्होंने अपने प्राण की आहुति दी। 

मित्रों के लिए तकलीफ उठाना स्वाभाविक माना जा सकता है।  लेकिन प्रेम की महानता तब हमारे सामने आती है जब उसकी कोई सीमा नहीं होती।  वही प्रेम महान है जो मित्रों और शत्रुओं को बराबरी से देखता है।  इसी कारण संत पौलुस रोमियों को लिखते हुए कहते हैं, ’’हम निस्सहाय ही थे जब मसीह निर्धारित समय पर विधर्मियों के लिए मर गये।  धार्मिक मनुष्य के लिए शायद ही कोई अपने प्राण अर्पित करे।  फिर भी हो सकता कि भले मनुष्य के लिए कोई मरने को तैयार हो जाये, किन्तु हम पापी ही थे जब मसीह हमारे लिए मर गये थे।  इससे ईश्वर ने हमारे प्रति अपने प्रेम का प्रमाण दिया है।’’ (रोमियों 5:6-8)

आज पिता परमेष्वर मुझे और आपको अपने प्यार का प्रमाण देते हैं।  आज की धर्मविधि में इसी कारण क्रूस की उपासना की जाती है।  इस विधि में क्रूस के काँटों को कलीसिया हमारे सामने प्रस्तुत करती है और हमें याद दिलाती है कि यह मसीह के प्रेम का प्रमाण है।  कलीसिया में विभिन्न प्रथाओं के अनुसार प्रभु येसु के घावों पर कई लोग मन्न् चिंतन करते हैं।  इससे संबधित उपासना विधि भी कई जगह प्रचलित है।  इस दुनिया में जब प्यार असली को नकली प्यार से अलग करना मुशकिल है तब कई दफ़ा निस्वार्थ एक मरीचिका बनकर रह जाता है। 

शायद आज की पूजन विधि की यही चुनौती है कि हम प्रभु येसु से और उनके क्रूस से सच्चे प्यार का सबक सीखें क्योंकि प्रभु स्वयं कहते हैं, ’’यदि तुम एक दूसरे को प्यार करोगे तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो।’’ (योहन 13:35)  आज मरण का त्योहार है और क्रूस रास्ते पर चलना ही ख्रीस्त विश्वासियों की बुलाहट है।  क्रूस पर से भी शायद प्रभु आपसे और मुझ से कह रहे हैं, ’’मेरे पीछे हो लें’’

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Sunday Homilies - May 20, 2012
पास्का का सातवाँ इतवार
By फादर हैरीसन मार्कोस
प्रेरित चरित 1:15-17,20,20स-26; 1 योहन 4:11-16; योहन 17:11ब-19

यह हमारा साधारण अनुभव है कि जब माता-पिता बुढ़ापे की ओर बढ़ते हैं तो वे अपने बच्चों के बारे में चिंतित रहते हैं।  वे सोचने लगते हैं कि उनके चल बसने के बाद परिवार की क्या हालत होगी, बच्चे किस प्रकार परेशानियों तथा समस्याओं का सामना करेंगे?  बच्चों के ऊपर क्या बीतेगी?  इसी कारण वे अपने ही जीवनकाल में बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए धन इकट्ठा करते, रोजगार के अवसर ढूंढ़ते तथा बैंक के खातों में उनके नाम से पैसा जमा करते हैं।  वे अपने बच्चों के लिए परमपिता ईश्वर से दुआ करना नहीं भूलते।

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु अपने शिष्यों के लिए प्राण पीड़ा तथा क्रूस मरण के पहले विशेष प्रार्थना करते हैं।  सुसमाचार में प्रभु की कई प्रार्थनाओं का उल्लेख पाया जाता है।  कई बार प्रभु निर्जन स्थान पर या पहाड़ी पर प्रार्थना करने जाते हैं।  शायद प्रार्थना के समय जिन शब्दों का प्रभु ने उपयोग किया उन शब्दों को शिष्य भी सुन नहीं पाये थे।  लेकिन प्रभु की कुछ प्रार्थनायें ऐसी है जो शिष्यों एवं अन्यों के द्वारा स्पष्ट रूप से सुनी गयी थी।  लाज़रूस की कब्र के सामने जो प्रार्थना कही गयी थी उसे वहाँ एकत्रित लोगों ने सुनी।  सुसमाचार में उल्लेखित प्रभु की प्रार्थनाओं में योहन 17 में दी गयी प्रार्थना सबसे लम्बी है।  इसे महापुरोहित मसीह की प्रार्थना कहते हैं।

प्रभु का सुसमाचारिय कार्य उसकी समाप्ति तक पहुँच रहा था।  उनके इस संसार से विदा लेने का समय निकट आ चुका था।  जो कार्य उन्होंने शुरू किया था उसे पिता की इच्छा के अनुसार पृथ्वी के कोने-कोने तक तथा संसार के अंत तक जारी रखना था।  उन्होंने यह जिम्मेदारी विशेष रीति से बारह प्रेरितों को सौंप दी थी।  उनका कार्य आसान नहीं था।  उन्हें सांसारिक शक्तियों से लड़ना पड़ेगा, दुनियावी विचारधाराओं का खण्डन करना पडे़गा, संसार के अधिपतियों के सामने भी निडर होकर सुसमाचार सुनाना पड़ेगा, अपने वचन तथा कर्म से सुसमाचार की प्रामाणिता को व्यक्त करना पडे़गा।  येसु ने इस प्रकार की बड़ी जिम्मेदारी शिष्यों के कंधों पर रख दी थी।  इसी संदर्भ में हमें आज के सुसमाचार को देखना चाहिए।  प्रभु न केवल बारह प्रेरितों के लिए बल्कि भविष्य के सभी विश्वासियों के लिए प्रार्थना करते हैं।  प्रभु का लक्ष्य अपने प्रेमी पिता को महिमांवित करना था।  इसलिए वे पिता के कार्य को इस दुनिया में जारी रखने के लिए सभी विश्वासियों तथा सुसमाचार के सेवकों के लिए प्रार्थना करते हैं। 

इस प्रार्थना में विश्वासियों की एकता को प्रभु बहुत महत्व देते हैं।  वे कहते हैं, ’’उन्हें अपने नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रख जिससे वे हमारी ही तरह एक बने रहें’’  जब प्रभु शिष्यों के साथ रहते थे तब भी शिष्यों के बीच वाद-विवाद होता था, मतभेद सामने आते थे।  उन अवसरों पर प्रभु ने उन्हें स्वर्गराज्य के मूल्यों के आधार पर समझाया और उन मतभेदों से ऊपर उठने में सहायता प्रदान की।  प्रभु के चले जाने के बाद उन्हें एकता के लिए पवित्र आत्मा की बड़ी ज़रूरत होगी।

इस प्रार्थना में प्रभु प्रेरितों की आनन्द-प्राप्ति के लिए भी प्रार्थना करते हैं।  स्वर्गराज्य का संदेश आनन्द का संदेश है।  वे दुखियों को दिलासा, पीडि़तों को राहत तथा बंदियों को रिहाई की खबर सुनाते हैं।  सुसमाचार को जो ग्रहण करते हैं वे हृदय में अनंत आनन्द का अनुभव करते हैं।  सुसमाचार वाहक दुःखी नहीं हो सकता।  दुःखी सुसमाचारवाहक एक विरोधाभास है।  एक टीचर, वेल्डर या डॉक्टर दुःखी होने पर भी अपना काम कर सकता है।  परन्तु प्रभु के सुसमाचार वाहक दुःखी होकर अपना कर्त्तव्य नहीं निभा सकते क्योंकि सुसमाचार आनन्द का समाचार है।  इसी कारण प्रभु अपने शिष्यों के लिए परमपिता से आनन्द की कृपा माँगते हैं। 

प्रभु के स्वर्ग चले जाने के बाद शिष्य अपने दायित्व को बड़ी जिम्मेदारी के साथ निभाते हैं।  ईश्वरीय योजना के अनुसार बारह प्रेरित इस्राएल के बारह पूर्वजों का स्थान लेते हैं।  इसी कारण प्रेरितों की संख्या यूदस के मृत्यु के कारण घट जाने पर उनकी जगह पर वे एक नये शिष्य के चुनाव करने का निर्णय लेते हैं।  इसके लिए वे एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढ़ते हैं जो योहन के बपतिस्मा से लेकर प्रभु के स्वर्गारोहण तक शिष्यों के साथ था।  जब उनके सामने दो ऐसे व्यक्ति प्रस्तुत किये जाते हैं तो ईश्वर की इच्छा जानने के लिए प्रेरित चिट्ठी डालते हैं।  इस प्रकार प्रेरित प्रारंभिक कलीसिया की गतिविधियों में ईश्वर की इच्छा को महत्व देते हैं।  आज हमारी यह चुनौती है कि हम कलीसिया की सभी गतिविधियों में ईश्वर की इच्छा को सर्वोच्च स्थान देते हुए अपने सुसमाचार फैलाने के कार्य को जारी रखे।

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