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Sunday Homilies - June 17, 2012
वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार
By फादर लॉरेंस फर्नान्डिस
एज़ेकिएल 17:22-24; 2 कुरिन्थियों 5:6-10; मारकुस 4:26-34

टी. एस. एलियट ने कहा था, ’’यह एक अजीब सी बात है कि हमारे शब्द बहुत ही अपर्याप्त हैं।  फिर भी जिस प्रकार एक दमे का रोगी तड़पते हुए श्वास लेता है उसी प्रकार एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को अपने मन की बातें बताने की जी तोड़ कोशिश करता है।’’  इसका कारण यह है कि प्रेम एक रहस्य है।  रहस्यों को व्यक्त करना आसान नहीं है।  प्रभु ने अपने जीवन काल में स्वर्गराज्य के रहस्यों को अपने कर्मों तथा वचनों द्वारा प्रकट करने की कोशिश की।  इसी कारण आज के सुसमाचार में प्रभु सवाल करते हैं, ’’हम ईश्वर के राज्य की तुलना किस से करे?’’  इस संदर्भ में प्रभु दो दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं।  पहला, बढ़ने वाले बीज़ का दृष्टांत और दूसरा राई के दाने का।  कई यहूदियों का यह विश्वास था कि अचानक और चमत्कारिक रूप से स्वर्ग का राज्य एक दिन प्रकट होगा।  लेकिन बढ़ने वाले बीज़ के दृष्टांत के द्वारा प्रभु येसु यह शिक्षा देते हैं कि स्वर्गराज्य की स्थापना बीज के अंकुरण तथा वृद्धि की तरह रहस्यमय है।  स्वर्गराज्य में एक अभियंत शक्ति है जिसके कारण वह विकसित होता जाता है तथा पूर्णता तक पहुँचता है।  जब हम स्वर्गराज्य को फैलाने की चेष्टा करते हैं तब हमें यह याद रखना चाहिए कि ईश्वर ही इसको अंकुरित होने तथा विकसित होने की शक्ति प्रदान करते हैं।  हमारा प्रयत्न इसी कारण एक सेवा मात्र है। 

            इस दृष्टांत से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि हम आलसी बनकर कुछ न करें।  यह सोचना गलत होगा कि स्वर्गराज्य को फैलाने में हमारा कोई योगदान ही नहीं है।  लेकिन प्रभु हमें याद दिलाते हैं कि रात-दिन परिश्रम करने के बावजूद भी हमें कभी यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारे परिश्रम के फलस्वरूप ही स्वर्गराज्य का विकास हुआ है।  ठीक उसी प्रकार जिस तरह दृष्टांत का बोने वाला रात को सोता और सुबह उठता है लेकिन उसको पता नहीं कि बीज कैसे उगता तथा बढ़ता जाता है।  प्रभु इस दृष्टांत के द्वारा हमें यह शिक्षा देते हैं कि हम विनम्रता तथा धैर्य के साथ स्वर्गराज्य को फैलाने के कार्य में अपना योगदान दे। 

            संत पौलुस कुरिन्थियों को लिखते हुए अपने पहले पत्र में यह बताते हैं कि उन्होंने विश्वास रूपी पौधा कुरिन्थियों के बीच रोपा था, अपोल्लोस ने उसे सींचा, किंतु ईश्वर ने ही उसे बढ़ा किया है।  संत पौलुस स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, ’’न तो रापने वाले का महत्व है और सींचने वाले का, बल्कि वृद्धि करने वाले अर्थात् ईश्वर का ही महत्व है।  रोपने वाला और सींचने वाला एक ही काम करते हैं और प्रत्येक अपने-अपने परिश्रम के अनुरूप अपनी मज़दूरी पायेगा।  हम ईश्वर के सहयोगी हैं और आप लोग हैं - ईश्वर की खेती, ईश्वर का भवन।’’ (1 कुरिन्थियों 3:7-9)

आज का सुसमाचार भाग राई के दाने का दृष्टांत भी हमारे सामने प्रस्तुत करता है।  सुसमाचार में कहा गया है कि राई दुनिया भर का सबसे छोटा दाना है परन्तु बढ़ते-बढ़ते वह सब पौधों से बढ़ा हो जाता है।  हम इस वाद-विवाद में न पड़े कि दुनिया में ऐसे बहुत से बीज है जो राई के दाने से छोटे हैं और ऐसे बहुत पौधे हैं जो राई के पौधे बहुत बड़े हैं।  प्रभु जो शिक्षा हमें देना चाहते हैं उसे हमें खुले हृदय से ग्रहण करना चाहिए।  वह शिक्षा यह है कि स्वर्गराज्य का अंकुरण कितना भी साधारण क्यों न हो बढ़ते-बढ़ते प्रभु की कृपा से वह अपने को बहुत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली साबित करता है।  प्रभु ईश्वर स्वर्गराज्य के महत्वपूर्ण कार्य को हम जैसे बलहीन व्यक्तियों द्वारा आगे बढ़ाते हैं।  इसी कारण संत पौलुस कुरिन्थियों को लिखते हैं, ’’इस बात पर विचार कीजिए कि बुलाये जाते समय दुनिया की दृष्टि में आप लोगों में बहुत कम लोग ज्ञानी, शक्तिशाली अथवा कुलीन थे।  ज्ञानियों को लज्जित करने के लिए ईश्वर ने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में मूर्ख हैं।  शक्तिशालियों को लज्जित करने के लिए उसने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में दुर्बल हैं।  गण्य-मान्य लोगों का घमण्ड चूर करने के लिए उसने उन लोगों को चुना है, जो दुनिया की दृष्टि में तुच्छ और नगण्य हैं, जिससे कोई भी मनुष्य ईश्वर के सामने गर्व न करे।’’ (1 कुरिन्थियों 1:26-29)  इसी स्वर्गराज्य के अंकुरण तथा विकास के बारे में दानिएल के ग्रंथ अध्याय 2 में हम पढ़ते हैं।  वाक्य 44 कहता है, ’’. . .स्वर्ग का ईश्वर एक ऐसे राज्य की स्थापना करेगा, जो अनन्त काल तक नष्ट नहीं होगा और जो दूसरे राष्ट्र के हाथ नहीं जायेगा।  वह इन राज्यों को चूर-चूर कर नष्ट कर देगा और सदा बना रहेगा’’  स्वर्ग राज्य की स्थापना तथा विकास ईश्वर का ही कार्य है ।  इस कार्य में हम जैसे निरे मनुष्यों को ईश्वर उपयोग में लाते हैं।  आइए हम विनम्रता तथा धैर्य के साथ प्रयत्न करते रहें ताकि हम अपना महत्वपूर्ण योगदान इस महान कार्य के लिए दे सकें।

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