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Sunday Homilies - June 24, 2012
वर्ष का बारहवाँ इतवार
By फादर जुनेडियुस टोप्पो
योब 38,1:8-11; 2 कुरिन्थियों 5:14-17; मारकुस 4:35-41

जो कोई समाचार पत्र पढ़ते रहते हैं उन्हें यह अवष्य ज्ञात हैं कि रोज़ उसमें किसी न किसी प्राकृतिक आपदा के बारे में उल्लेख होता है।  इस पृथ्वी पर हर जगह कोई न कोई आपदा हर साल होती ही है।  किसी जगह पर बाढ़ आती है तो किसी जगह पर अकाल।  कोई तूफान से पीडि़त है तो सूखे से।  जितना हम प्रकृति पर आश्रित रहते हैं उतना हम पर आपदा का प्रभाव भी पड़ता है।  तूफान या बाढ़ कई लोगों के लिए चिंता का विषय है।  समुद्री तूफान से मछुये तथा समुद्री जहाज में सफर करने वाले बहुत ही प्रभावित होते हैं।  समाज रूपी समुद्र में जब हमारा जीवन रूपी नाव आगे बढ़ती है तब हमें भी कई दफ़ा आँधी-तूफान का सामना करना पड़ता है।  हमारी जीवन रूपी नाव जितनी मज़बूत रहती उतनी ही हिम्मत हम बाँध सकते हैं।  जिस प्रकार शीषे के महल में रहने वालों को हर पत्थर से डरना पड़ता है उसी प्रकार जब हमारा जीवन शीषे की तरह होता है तब हमें भी हर परिस्थिती से डरना पड़ेगा।  मेरा तात्पर्य यह है कि जो विश्वास करता है उसका जीवन मज़बूत रहता है जैस संत मत्ती के सुसमाचार में हर पढ़ते हैं जो ईश वचन पर आधारित जीवन बिताता है वह पत्थर पर अपने जीवन की नींव डालता है।  लेकिन जो ईश्वर वचन के आधार जीवन नहीं बिताता वह बालू पर अपने घर की नींव डालता है।  जो घर पत्थर पर बना हुआ है उसपर बाढ़ और आँधी का प्रभाव नहीं पड़ता।  परन्तु जो घर बालू पर बना हुआ है उसका बाढ़ और आँधी के समय सर्वनाश होता है। 

इसी बात को सुसमाचार में एक घटनाक्रम के द्वारा हमारे सामने प्रस्तुत किया गया है।  आँधी तूफान में फँसे नाव में सवार शिष्य अपने आप को बहुत असुरक्षित महसूस करते हैं।  इसी कारण वे डर जाते हैं।  उन्हीं के साथ प्रभु येसु भी सवार थे।  जब शिष्य डर के मारे काँप रहे थे तथा चिल्ला-चिल्ला कर अपने डर का प्रकट कर रहे थे तब प्रभु येसु दुंबाल में तकिया लगाये सो रहे थे।  यहाँ दुंबाल में तकिया लगाकर सोने का मतलब सर्वशक्तिमान तथा सर्वगुणसंपन्न परम दयालु पिता ईश्वर में विश्वास रखकर अपनी चिंताओं को दूर करके आंतरिक शांति महसूस करना है।  शिष्य प्रभु को यह कहकर जगाते हैं कि हम डूब रहे हैं।  वे प्रभु से सवाल करते हैं, ’’क्या आपको इसकी कोई चिंता नहीं?’’  प्रभु ने जवाब में पहले वायु को डाँटा, फिर शिष्यों को भी। 

प्रभु ने वायु को डाँट कर समुद्र से कहा, ’’शांत हो!  थम जा!’’  सुसमाचार का लेखक कहता है ’’वायु मंद हो गयी और पूर्ण शांति छा गयी।’’ प्रकृति पर ईश्वर का पूरा-पूरा अधिकार है।  ईश्वर ने प्रकृति की सृष्टि मनुष्य की सेवा में की और उस पर मनुष्य को अधिकार भी दिया।  लेकिन उत्पत्ति ग्रंथ हमें यह भी बताता है कि प्रकृति का संतुलन पाप के कारण बिगड़ गया परन्तु ईश्वर का सृष्टिकर्त्ता होने के नाते प्रकृति पर अधिकार हमेशा बना रहता है। 

प्रभु ने शिष्यों को भी डाँटा।  क्योंकि उन्हें, ’’अब तक विश्वास नहीं’’ था।  आज के सुसमाचार के पाठ के अंत में शिष्यों के एक प्रश्न का उल्लेख किया गया है, ’’आखिर यह कौन है?  वायु और समुद्र भी उनकी आज्ञा मानते हैं।’’  यह प्रष्न हमें यह बताता है कि शिष्यों के लिए प्रभु येसु अभी तक पूरी तरह परिचित नहीं है।  प्रभु को अभी तक उन्होंने ठीक से नहीं पहचाना है।  प्रभु की क्षमता तथा व्यक्तित्व  से वे अभी भी अपरिचित हैं।

मरियम को स्वर्गदूत ग्रबिएल द्वारा संदेश दिये जाते समय येसु का नाम इम्मानूएलरखने का आदेश दिया गया था।  इम्मानूएल का अर्थ है-’’ईश्वर हमारे साथ है’’  जब ईश्वर शिष्यों के साथ है तब भी वे डरे सहमे रहते हैं क्योंकि वे अपनी शक्ति पर विश्वास करते हैं न कि ईश्वर की।  इसी कारण वे डर जाते हैं तथा चिंतित रहते हैं और प्रभु येसु को कोई चिंता नहीं। 

हमें चाहिए कि जिंदगी के आँधी-तूफान के समय ईश्वर पर भरोसा रखें क्योंकि ईश्वर जो सर्वशक्ति संपन्न है हमारे साथ रहते हैं।  हमें विश्वास करना चाहिए कि ईश्वर का प्रकृति की सभी ताकतों के ऊपर अधिकार है।  इसी बात को आज का पहला पाठ प्रकट करता है।  योब के ग्रंथ के द्वारा हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर सर्वशक्तिमता तथा सर्वज्ञेता सामने मनुष्य को नम्रतापूर्वक झुक जाना चाहिए।  हो सकता है योब के समान ईश्वर हमारी भी परीक्षा ले।  क्या हम योब के समान विजयी बन सकते हैं?  योब को उस ईश्वर पर विश्वास था जिन्होंने उस से कहा, ’’जब समुद्र गर्त्त में से फूट निकला था तो किसने द्वार लगाकर उसे रोका था?  मैने उसे बादलों की चादर पहना दी थी और कुहरे के वस्त्रों लपेट लिया था।  मैने उसकी सीमाओं को निश्चित किया था और द्वार तथा सिटकिनी उससे यह कहा था, ’तू यहीं तक आ सकेगा, आगे नहीं; तेरी तंरगों का घमण्ड यहीं चूर कर दिया जायेगा।’’  इस प्रकार प्रभु अपने भक्तों के चारों ओर सुरक्षा का घेरा बनाते हैं।  उस सुरक्षा घेरे के अंदर रहने वाले भक्त को ’’दुंबाल में तकिया लगाये’’ सोने से हिचकिचाना नहीं चाहिए।

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