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Sunday Homilies - July 01, 2012
वर्ष का तेरहवाँ इतवार
By फादर सौन्दर्यराजन
सुलेमान 1:13:15, 2:23-24;  2 कुरिन्थियों 8:7-9, 13-15; मारकुस 5:21-43

आज के पाठों द्वारा कलीसिया हमें यह शिक्षा देती है कि ईश्वर हमें जीवन देने वाले हैं।   ईश्वर जीवन ही है।  फिर भी येसु में ईश्वर मृत्यु को स्वीकारते हैं ताकि हम जीवित रहे।  उन्होंने हमारी गरीबी को स्वीकारा ताकि हम धनी बने। 

आज के सुसमाचार में दो चंगाईयों का विवरण है।  प्रभु येसु के समुद्र के तट पर पहुँचने पर वहाँ एक विशाल जन-समूह एकत्र हो गया।  हम कल्पना कर सकते हैं कि उस भीड़ में ज्यादातर किस प्रकार के लोग एकत्र हुये होगे।  प्रभु येसु को सुनने वालों में ज्यादातर समाज के निम्न तबके के लोग थे।  जहाँ कहीं भी वे प्रभु की उपस्थिति के बारे में सुनते थे वहाँ वे एकत्र हो जाते थे।  इस प्रकार उस समय भी एक बड़ी भीड़ उनके पीछे हो ली और लोग चारों ओर से उन पर गिरे पड़ते थे।  सुसमाचार के लेखक उस भीड़ से दो व्यक्तियों को अलग करके हमारे सामने लाते हैं जिनका व्यवहार भीड़ के व्यवहार से ज़रूर भिन्न था।  उन में पहला था जैरुस जोकि सभागृह का अधिकारी था।  वह प्रभु के चरणों पर गिर पड़ा और यह कहते हुए प्रभु से अनुनय विनय करता रहा, ’’मेरी बेटी मरने को है।  आइए और उसपर हाथ रखिए जिससे वह अच्छी हो जाये और जीवित रह सके।’’  जैसे-जैसे प्रभु उनके साथ जा रहे थे भीड़ भी उनके साथ चलने लगी।  प्रभु के पहुँचने के पहले ही उस अधिकारी के यहाँ से लोग आकर सूचना देते हैं कि उसकी बेटी मर चुकी है और अब प्रभु को तकलीफ देने की ज़रूरत नहीं है।  उन लोगों को यह विश्वास नहीं था कि उस लड़की के मरने के बाद भी प्रभु कुछ कर सकते हैं।  प्रभु जैरुस का मनोबल बढ़ाते हुए उस मरी हुई लड़की का हाथ पकड़ कर उसे पुनः जीवन देते हैं।

उसी प्रकार आज के सुसमाचार में एक स्त्री जोकि रक्तस्राव से पीडि़त थी प्रभु येसु की चंगाई प्राप्त करती है।  वह बारह साल से रक्तस्राव से पीडि़त थी।  अनेकोनेक वैद्यों के इलाज के कारण उसे बहुत कष्ट सहना पड़ा था और अपना सब कुछ खर्च करने पर भी उसे कोई लाभ नहीं हुआ था बल्कि वह और भी बीमार हो गयी थी।  यहूदियों की परंपरा के अनुसार जो स्त्री रक्तस्राव से पीडि़त होती है उसे अपने परिवार तथा समाज से अलग रहना पड़ता था।  जब हमें यह बताया जाता है कि वह स्त्री बारह साल से रक्तस्राव से पीडि़त थी तो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि वह इतने सालों से न केवल शारीरिक रूप से पीडि़त थी बल्कि अकेलापन, तिरस्कार तथा निंदा के कारण मानसिक रीति से भी पीडि़त थी।  उसको लोगों के सामने या उनकी संगति में आने या रहने का हक नहीं था फिर भी इस निराशाजनक परिस्थिति में हिम्मत बटोर कर वह प्रभु के सामने आती है।  वह जो अछूत मानी जाती है खुद प्रभु का कपड़ा भर छूना चाहती है।  उसका यह दृढ़ विश्वास था कि ऐसा करने से वह ठीक हो जायेगी।  और ऐसा ही होता है।  भीड़ में और उसमें यह अंतर था कि उसने विश्वास के साथ प्रभु के कपड़े मात्र को स्पर्श किया लेकिन भीड़ के लोग येसु पर गिरे पड़ने पर भी किसी चमत्कार का अनुभव नहीं कर पाते हैं।  हम जो प्रभु येसु ख्रीस्त में विश्वास करते हैं अकसर भीड़ के समान ही है।  हम प्रभु के साथ चलते तो हैं, उनको स्पर्श करते भी हैं, उन पर गिर पड़ते भी।  मगर चंगाई का अनुभव हम से बहुत दूर है।  हर मिस्सा बलिदान में भाग लेते हैं, प्रार्थनाएं बोलते है, नौरोजी प्रार्थना के समय हाथ जोड़कर खडे़ रहते हैं, अपनी जीभों पर परम प्रसाद ग्रहण भी करते हैं लेकिन हृदय में विश्वास की कमी है। 

सुसमाचार की स्त्री ने समाज के रीति रिवाज़ों, पुरानी पंरपराओं तथा सामाजिक दबावों के बावजूद भी गहरे विश्वास कारण प्रभु की चंगाई के योग्य पायी जाती है।  यह स्त्री खुद प्रभु का स्पर्श करना चाहती है।  दूसरी ओर जैरुस चाहता है कि प्रभु उसकी बेटी को स्पर्श करे।  दोनों विश्वास के कार्य है।  दोनों चमत्कार के कारण बनते हैं।  हो सकता है कि लंबे समय तक हम किसी ऐसी परिस्थिति से गुज़र रहे हैं जो बिगड़ती जा रही है परन्तु किसी न किसी दबाव में आकर या प्रभाव में पड़कर हम प्रभु की चंगाई से वंचित रह जाते हैं।  जैरुस के घर से जो लोग आये थे उनके मन में शायद प्रभु पर विश्वास नहीं था।  यह भी हो सकता है कि शायद उन्होंने सोचा लड़की तो मर चुकी है फिर अन्य यहूदी नेताओं को अप्रसन्न करते हुए इस लोकप्रिय गुरू को घर में क्यों आने दे!  शायद यह भी सच हो कि जैरुस का विश्वास भी इतना पक्का नहीं था।  उस अवसर पर उसे हिम्मत बंधाते हुए तथा उसे विश्वास में सुदृढ़ बनाते हुए प्रभु कहते हैं, ’’डरिये नहीं।  बस विश्वास कीजिए।’’ आइए हम हमारे विश्वास में हमारी कमज़ोरी को हम प्रभु के सामने कबूल करे।  ताकि प्रभु अपने वचन मात्र से हमें विश्वास में सुदृढ़ बनाते हुए हमें अपनी चंगाई का अनुभव कराये।  जब हम यूखारिस्तीय समारोह में भाग लेते हैं तो भीड़ के समान नहीं बल्कि जैरुस तथा रक्तस्राव से पीडि़त स्त्री के तरह हम भी प्रभु से चंगाई प्राप्त करने में सक्षम हो।

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