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Sunday Homilies - July 15, 2012
वर्ष का पंद्रहवाँ इतवार
By फादर ईश्वरदास मिंज
आमोस 7:12-15; एफे़सियों 1:3:14; मारकुस 6:7-13

आज के प्रथम पा��  को सही रूप से समझने के लिए नबी आमोस ने जिस राजनैतिक परिवेश में जीवन बिताया उसको जानना और समझना बहुत ज़रूरी है।  राजा सुलेमान की मृत्यु उपरांत उसका राज्य दो भागों में विभाजित हो गया।  राजा सुलेमान का बेटा यरोबआम राजा बना।  अब बारह वंषों में दो ही वंशों ने यरोबआम की अधीनता स्वीकार की।  दस दूसरे वंषों ने अपने अलग राज्यों की स्थापना की।  इस तरह दो राज्यों का निर्माण हुआ। 

यूदा का राज्य- जिसमें दो वंश सम्मिलित थे, जिसकी राजधानी (केन्द्र) येरुसालेम ही थी और इस्राएल का राज्य जिसमें दस वंश शामिल हुई।  उन्होंने अपना अलग राज्य बनाया तथा अपना राजा भी चुन लिया।  इस राज्य का केन्द्र समारिया था।  किन्तु काफी लम्बे अरसे तक इस्राएल एवं यूदा के बीच शीत युद्ध चलता रहा।  दोनों राज्यों के लोग पूजा-पा�� ों के लिये येरूसालेम ही आते थे।  किन्तु कुछ वर्ष गुजरने के पश्चात् इस्राएल के राजा में भय समाने लगा कि यदि इसी तरह इस्राएली लोग पूजा के लिये येरुसालेम जाते रहे तो एक दिन उसका राज्य यूदा के राज्य में विलीन हो जायेगा और वह अपनी राज गद्दी खो बै�� ेगा।  इसलिये इस खतरे से बचने के लिए उसने अपनी प्रजा के लिए इस्राएल में ही पूजा-पा��  के लिए बेतेल नामक जगह में मंदिर का निर्माण कराया।  बेतेल का अर्थ है ईश्वर का घर। इस्राएलियों के लिए बेतेल एक पवित्र जगह थी, क्योंकि प्राचीन काल में इब्राहिम ने प्रतिज्ञात देश पहुँचने पर यहीं पर पूजा-पा��  किया था।  फिर इसके बाद इसहाक के दो पुत्र याकूब और एसाब ने भी यहाँ ईश्वर की पूजा की थी।  इस तरह से बेतेल में दस वंषों का मंदिर बना और जो याजक इस मंदिर की देखरेख करते थे उनका खर्चा राजा की ओर से उ�� ाया जाता था।  इस मंदिर का मुख्य  याजक अमस्या था।  इस मुख्य याजक के अलावा और भी कई दूसरे पुजारी थे।  वास्तव में अधिकांश याजक और नबी अपने आप को ईश्वर का संदेशवाहक बताकर धर्म के नाम पर अपनी रोजी-रोटी कमा रहे थे।  किन्तु उनमें से अधिकांश झू�� े नबी थे।  ईश्वर ने आमोस को यूदा के राज्य से चुन इस्राएल-राज्य में धर्म उपदेश के लिए भेजा।  ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए नबी आमोस बेतेल के राजकीय मंदिर में उपदेश देने पहुँचा।  दो कारणों से नबी आमोस का कार्य जटिल था।  एक तो आमोस बेतेल का ना होकर यूदा का था।  दूसरा, उसके कार्य को क�� िन बनाने वाला तत्व यह था कि उस समय इस्राएल आर्थिक दृष्टिकोण से फलफूल रहा था।  अतः न तो नेतागण और न ही वहाँ के लोग किसी प्रकार के उपदेषों को सुनने को तैयार थे।  नबी आमोस के उपदेशों का तिरस्कार करने वालों में मुख्य तौर पर बेतेल के याजक वर्ग ही थे जिनका रखरखाव राजा के द्वारा होता था।  उनके लिए स्वयं की रोजी-रोटी की कोई चिंता नहीं थी।  अतः याजकों की ऐसी ऐशो-आराम की व्यवस्था को अमस्या बिगड़ने नहीं देना चाहता था।  इसलिए उन्होंने नबी आमोस का विरोध किया।  वह उन्हें बेतेल से चले जाने को कहता है।  बेतेल के कई याजक और नबी धर्मोपदेश को अपना जीविकोपार्जन का साधन बना चुके थे।  आमोस ईश्वर से प्रेरित होकर अमस्या को सटीक जवाब देते हैं, वे कहते हैं, ’’मैं न तो नबी था और न ही नबी की संतान।  मैं चरवाहा था और गूल्लर का पेड़ छाटने वाला।  मैं झुण्ड चरा ही रहा था कि प्रभु ने मुझे बुलाया और मुझसे कहा, ’जाओ! मेरी प्रजा इस्राएल के लिए भविष्यवाणी करो। (आमोस 7:14-15)  अतः सचमुच आमोस ईश्वर का संदेशवाहक था।  वह अपने जीविर्कोपार्जन के लिए उपदेश नहीं दे रहा था।

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि किस प्रकार येसु अपने चेले को ईश्वर का काम करने के लिए भेजते हैं।  येसु के साथ बहुत सारे थे, किन्तु येसु जिन्हें चाहते थे उन्हें ही उन्होंने व्यक्तिगत रूप से चुन लिया ताकि वे उन्हें प्रशिक्षण दे सकें और तब यह चेले येसु के इस दुनिया के विदा हो जाने के बाद येसु के कार्य का जारी रखेंगे।  उनको दो-दो करके भेजते समय येसु ने तीन बातों पर ज़ोर दिया।  सबसे प्रथम कि ईश्वर का राज्य आ गया है, यानि सबको पाप का परित्याग करने का निमत्रंण देना और सबको ईश्वर के प्यार के विधान के अंतगर्त रहने के लिए कहना।  दूसरी बात उनके लिए ध्यान देने वाली थी कि वे ईश्वर द्वारा भेजे गये हैं।  इसलिये वे मानवीय साधनों जैसे ताकत, धन, पदवी आदि पर निर्भर न रहे।  तीसरी ध्यान देने योग्य बात थी कि वे बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखें क्योंकि उनकी बीमारी से चंगाई उनकी आध्यात्मिकता को दिर्षाती थी।  ये सब निर्देष येसु के चेलों के लिए (जो उनके वचनों के उपदेशक) महत्वपूर्ण पा��  सिखलाते है।  ईश्वर स्वयं अपने सुसमाचार प्रचारकों को चुनता है न कि प्रचारक उनकों।  उन्होंने आमोस को चुना जो लिखना पढ़ना नहीं जानता था।  उन्होंने निरक्षर मछुआरों को अपना शिष्य बनाया।  ईश्वर ने न तो धनवान को और न तीक्षण बुद्धि वाले को अपना संदेशवाहक बनाया।  उनका ऐसा करने का उद्देश्य यह है कि ईश्वरीय ज्ञान और शाक्ति उन लोगों के द्वारा आगे बढ़े जो संसार की दृष्टि में नगण्य है।

किसी भी व्यक्ति को अपनी जीविका चलानके के लिए सुसमाचार प्रचारक नहीं बनना चाहिए।  यदि कोई ऐसा करे तो वह झू�� े नबी के नाम से पुकारा जायेगा।  सुसमाचार प्रचारकों को बीमार लोगों से विशेष लगाव होना चाहिए।  येसु ख्रीस्त ने स्वयं अपने शिष्यों से कहा बीमारों को चंगा करो।  फिर वे खुद बीमारों से मिलने गये और उन्होंने उन पर हाथ रखकर प्रार्थना की और उन्हें चंगा किया।  मिशनरी कोई ड़ॉक्टर नहीं होता है किन्तु अपने ज्ञान के मुताबिक वह अपने आप को बीमारों की सेवा में लगाता है।  वही काफी और बहुत है।

हम सब जानते है कि प्रचारकों को ख्रीस्तानुरूप होना चाहिए।  किन्तु वह हाड़मांस के बने हुये है।  वे ख्रीस्त का अनुकरण करने की कोशिश करते हैं किन्तु फिर भी वे गिर जाते हैं।  मानवीय कमजोरियाँ ईश्वर के चुने हुओं के साथ जारी रहती है।  ये मानवीय कमज़ोरियाँ उनके द्वारा ईश्वर के संदेश को सुनने में हमारा बाधक तत्व नहीं बनाना चाहिए।  हमारे लिए महत्व की बात ईश्वर का संदेश है न कि संदेशवाहक क्या कहता है, कैसे जीता, क्या पहनता और क्या खाता।  क्योंकि जो स्वेच्छा से प्रभु के संदेशवाहक बने हैं तथा ईश्वर के वचन के कारण अपने माता-पिता और कुटुम्ब को छोड़ दिया है, उनकी सुनने तथा उनका स्वागत करने को कहा गया है।  संत पौलुस अपने समय के ख्रीस्तीयों को निम्न शब्दों में अनुरोध करते हुए कहते हैं, ’’भाईयों!  हमारी आप से एक प्रार्थना है।  जो लोग आपके बीच परिश्रम करते हैं प्रभु में आपके अधिकारी है और आपको उपदेश देते हैं, आप उनकी आज्ञा का पालन करें और प्रेमपूर्वक उनका सम्मान करें, क्योंकि वे आपके लिये परिश्रम करते हैं।  आपस में मेल रखें।’’ (1थेसे. 5:12-13)  हम इन संदेशवाहकों और उनके विश्वास के वरदान के लिए ईश्वर को धन्यवाद दे।

 

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