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Sunday Homilies - August 05, 2012
वर्ष का अठारहवाँ इतवार
By फादर दिलीप मिंज
निगर्मन 16: 2-4,12-15; एफेसियों 4:17,20-24; योहन 6:1-15

भोजन की लालसा मनुष्य के अनुभव से कहीं अधिक होती है।  आज के प्रथम पाठ में समस्त इस्राएली समुदाय नबी मूसा से शिकायत करता है और अच्छा स्वादिष्ट भोजन प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करता है।

            उनके पास उनकी वर्तमान नई स्वतंत्रता है किन्तु यह मेनु (डमदन) उसके समक्ष एक छोटा विकल्प प्रतीत होता है।  मिस्र की गुलामी को इस्राएली भूला भी नहीं पाये थे।  किन्तु गुलामी के उस देश की जगह को वे इसलिए याद करते हैं क्योंकि वे वहाँ सुख से बैठकर मांसाहारी भोजन इच्छानुसार किया करते थे।  अतः वे मूसा से शिकायत करते हैं कि वे उन्हें उस मरूभूमि में भूखों मरने ले आए हैं। 

            अपनी नई आजादी पर ध्यान केन्द्रित करने एवं उसका आनन्द लेने के बजाय समस्त इस्राराएली जनता अपने पेट की तृप्ति के लिए मिस्र लौट जाने के लिए तैयार हो गई थी।  भूख-प्यास के साथ उनकी आज़ादी से अधिक गुलामी में स्वादिष्ट भोजन इस्राएलियों के लिए अधिक आकर्षक था।

            ईश्वर पिता उनकी सारी शिकायतों पर ध्यान देते हैं और उनसे प्रतिज्ञा करते हैं कि वे अपनी इच्छा भर मांसाहारी भोजन करेंगे और रोटी खा सकेंगे।  और ईश्वर की प्रतिज्ञानुसार इस्राएलियों ने दूसरे दिन प्रातः ही मरूभूमि की धरातल पर उज्ज्वल मन्ना देखा।

            इस्राएलियों द्वारा इस सफेद रोटी के विषय में मूसा से पूछने पर उसने बताया कि वे सफेद रोटियाँ ईश्वर प्रदत्त स्वर्गीय रोटियाँ है जिन्हें ईश्वर ने उन्हें खाने को दिया है। 

            आज के सुसमाचार के पाठ के अंश में एक अन्य गलीली समुदाय अपने भूखे पेट की मांग का व्याख्यान करता है और भोजन के लिए अपनी लालसा को प्रकट करता है।  इस समय यह वही गलीली समूह (भीड़) जिसे पहले दिन प्रभु येसु ने उनकी इच्छाभर जाल की रोटियों से तृप्त किया था, कफ़रनाहूम तक प्रभु येसु का पीछा करता है, वही गलीली समुद्र के तट पर येसु अपना डेरा डाले हुए थे।  वही भीड़ पुनः उनसे भोजन पाने की इच्छा प्रकट करती है। 

            प्रभु येसु उनका अनुसरण करने वाली भूखी भीड़ को बताते हैं कि वह इसलिए उनका अनुसरण करती है कि उसने पिछले दिन अच्छे भोजन का स्वाद चखा था जो शारीरिक रूप से उसको तृप्त करता है।  वास्तव में उन लोगों को उस भोजन की लालसा करनी चाहिए जो अनंत जीवन के लिए उन्हें परितृप्त करता है।  मनुष्य को स्वर्गीय रोटी के लिए परिश्रम करना चाहिए।  ईश्वर की भेजी हुयी रोटी-प्रभु येसु है।  गलीली फौरन प्रभु येसु से उस चिह्न की मांग कर बैठते हैं जो उनके विश्वास को आधार दे सके।

            उनके पूर्वजों ने मरूभूमि में मन्ना खाया था जो एक चिह्न था।  जब प्रभु येसु ने बताया कि मरूभूमि में मूसा ने नहीं वरन् ईश्वर ने वह स्वर्गीय मन्ना प्रदान किया था।  स्वयं की तुलना उस स्वर्गीय रोटी से करते हैं जिसे पिता ईश्वर ने उन्हीं के रूप में मानव जाति के लिए स्वर्ग से प्रदान किया है।  प्रभु येसु अपने आप को अनन्त जीवन की रोटी बताते हैं, वह अनन्त जीवन की रोटी जिसे जो कोई विश्वास के साथ खायेगा वह आज से कभी भूखा नहीं होगा और कभी नहीं मरेगा।

प्रभु येसु ने गलीलियों के प्रति जो प्रतिज्ञा की थी वह वर्तमान में हम सबों के लिए दोहरायी जाती है।  वही प्रतिज्ञा यूखारिस्त में दोहरायी जाती है जिसे आज हम मनाते हैं।  इस समारोह में हम उसी भूख व लालसा के सहभागी होते हैं जिसे उन्होंने अनुभव किया था।  हम उस प्रेम के भूखे हैं जो हमें कभी निराश नहीं करता है।  हम उस वचन के भूखे हैं जो हमें कभी हतोत्साहित नहीं करते हैं।  हम उस रोटी के भूखे हैं जो हमें सदैव संतृप्त रखती है।

इस पवित्र यूखारिस्त में जिस निविदा को ईश्वर पिता ने हमारे लिए पेश किया है वो उनकी वाणी और संस्कार है।  जो वाणी हमारे लिए कही जाती है वो हमें उस रोटी की सहभागी बनाती है जो हम सबके लिए तोड़ी जाती है।  यह हमारे लिए ऐसी कोई कला-प्रर्दशनी नहीं जिसे हमें मूक निहारना चाहिए वरन् हम स्वयं बलिदान समारोह चढ़ाने आते हैं।

            पवित्र यूखारिस्त वह शब्द है जो कार्य में परिणत होता है।  यह कार्य प्रधान होता है।  यह जीवन की रोटी में सहभागी होने का कार्य है जो स्वयं प्रभु येसु के जीवन में सहभागी होना है।  हम प्रभु येसु की बलिवेदी पर पुनः आना जारी रखते हैं क्योंकि हम ईश्वर के प्रेम, शब्द अनंन जीवन की रोटी के भूखे हैं।

            पवित्र यूखारिस्त के बलिदान में बारम्बार सहभागी होने का अर्थ है कि हमें जीवित रहने के लिए जीवंत रोटी प्रभु की आवश्यकता है।  इस पवित्र यूखारिस्त में आज प्रभु येसु हम सबों से यही आशा देते हैं।

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