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Sunday Homilies - August 19, 2012
वर्ष का बीसवाँ इतवार
By फादर शाजी स्टेनीसलोस
सूक्ति 9:1-6; एफ़ेसियों 5:15-20; योहन 6:51-58

फादर शाजी स्टेनीसलोस

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु सारी मानव जाति को अपने शरीर एवं रक्त को भोजन एवं पेय के रूप में प्रदान करने का वादा करते हैं ।  येसु ख्रीस्त ने अपनी उस प्रतिज्ञा को अपनी अंतिम ब्यारी के समय यूखारिस्त की स्थापना करके पूरा किया।  यूखारिस्त में येसु साधारण रोटी एवं दाखरस को अपने शरीर एवं रक्त में परिवर्तित कर हमारा भोजन एवं पेय बन जाते हैं।  इस प्रकार वे स्वयं को हमारे लिये प्रदान करते हैं।  येसु का यह महान कार्य पूर्ण रूप से सार्थक तब हुआ जब क्रूस पर उनके शरीर को छेदा गया।  हम अपने किसी मित्र के घर भोजन के लिए आमंत्रित किए जाते हैं तो अक्सर भोजन के दौरान वे कहते हैं, ’आपको यह खाना चाहिये’, ’यह हमारे बगीचे का है’, ’मैंने इसे स्वयं पकाया हैआदि।  वे यह सोचते हैं कि जितना अधिक वे भोजन द्वारा स्वयं का परिचय कराते हैं उतनी अधिक उनकी प्रशंसा की जाएगी।  शायद किसी भी मित्र ने यह नहीं कहा होगा कि मैं स्वयं को इस भोजन के रूप में तुम्हें देता हूँ।  परन्तु येसु ने अंतिम ब्यारी के दौरान यूखारिस्त की स्थापना करते हुए कहा, ‘‘यह मेरा शरीर है जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है, यह प्याला मेरे रक्त का नूतन विधान है, यह तुम्हारे लिए बहाया जा रहा है।’’

आप उस प्रीतिभोज के बारे में क्या कहेंगे, जिसमें अतिथिगण आपसी वार्तालाप से वंचित रहते हैं। ऐसी स्थिति में क्या आप वहाँ खुशी महसूस करेंगे?  उस खाने से बेहतर होगा घर पर ही साधारण भोज का स्वाद लेना।  एक साथ भोजन करना संबंध जोड़ने तथा बढ़ाने का समय।  खाने की चीज़ों से ज्यादा आपस में भागीदारी तथा आदान-प्रदान महत्वपूर्ण होता है। 

यूखारिस्तीय समारोह भी ईश्वर तथा दूसरों से संबंध जोड़ने का समय है।  यूखारिस्तीय समारोह में भाग लेने वालों को आपसी संबंध तथा मित्रता में आगे बढ़ना ज़रूरी है।  एक व्यक्ति इतवार के दिन मिस्सा बलिदान के दौरान सबसे आगे टोपी पहने हुये बैठा था।  उस समुदाय में बैठे कई लोगों को यह अजीब-सा लगा।  कुछ लोग इससे परेशान भी नज़र आये।  एक-दो व्यक्तियों के उसके पास जाकर यह बताने पर भी कि चर्च के अंदर टोपी मत पहनिये, उस आदमी पर कुछ असर नहीं हुआ।  पल्ली पुरोहित ने मिस्सा के बाद उसके पास जाकर कहा कि गिरजाघर में टोपी पहनकर बैठना उचित नहीं है।  उस सज्जन ने जबाव दिया, ’’मुझे यह पहले से ही मालूम है।  किन्तु मेरे टोपी पहनने का एक विशेष उद्देश्य है।  मैंने सोचा कि यही एक ऐसा तरीका है, जिसके कारण दूसरे लोग मुझसे बात करने आयेंगे।  पिछले एक साल मे मैं इस गिरजाघर में आ रहा हूँ।  लेकिन मैंने कभी किसी के चेहरे पर कोई मुस्कान नहीं देखी।  पुरोहित के अंतिम आशिष देते ही लोग जल्दी-जल्दी अपने घर की ओर प्रस्थान करते हैं।  कोई किसी से मिलने या बात करने को तैयार नहीं है।  मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि यूखारिस्तीय समारोह में भक्तिभाव से भाग लेने के बावजूद भी मैं यहाँ भाइचारे की भावना महसूस नहीं कर सका हूँ।  आज पहली बार कुछ लोगों ने मुझसे बात की, वह भी मेरी गलती बताने के लिए।  क्या यूखारिस्त में हमारी सहभागिता हमें आपसी प्रेम तथा भाईचारा में बढ़ाने हेतु सक्षम नहीं बनाती है?’’

यूखारिस्त में हम येसु से वास्तविक संबंध स्थापित कर सकते हैं।  येसु ने अपने जीवनकाल में लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किये।  यूखारिस्त हमें येसु की इस मनोवृत्ति को आत्मसात करने योग्य बनाता है।  इसलिये मदर तेरेसा कहती है-‘‘हम दिन की शुरूआत रोटी के माध्यम से करते हैं और दिन के दौरान गरीबों में छिपे येसु से मिलने का प्रयास करते हैं।’’

हम सदैव पवित्र परम प्रसाद ग्रहण करना पसंद करते हैं।  किन्तु हम उन लोगों की दुर्दशा की परवाह नहीं करते, जो भूख, बीमारी, अन्याय एवं अत्याचार के बोझ से दबकर दिन-रात मेहनत करते हैं।   जिस प्रकार एक बच्चे को माँ के प्यार एवं माँ की उपस्थिति की आवश्यकता है उसी प्रकार हमें भी हमारे बीच येसु की उपस्थिति का अनुभव करने के लिए यूखारिस्तीय संस्कार की आवश्यकता है।  हर रविवार को मिस्सा बलिदान में भाग लेने का आशय सिर्फ कलीसिया के नियमों का पालन करना ही नहीं, किन्तु हमें अपने बीच येसु की उपस्थिति का अनुभव करना है।  यदि हम यूखारिस्त के दौरान अपने बीच येसु की उपस्थिति का अनुभव करने में समर्थ होते हैं तो हम इस दुनिया के सबसे सौभाग्यशाली इन्सान होंगे।  कई महान व्यक्तियों के जीवन चरित्र से हमें यह ज्ञात होता है कि यूखारिस्त ही उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा थी।  अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय जाॅन एफ.कैनेडी का भी ऐसा ही विश्वास था।  1963 में चुनाव प्रचार के दौरान वे मिस्सा में भाग लेने के लिए एक कान्वेंट के प्रार्थनालय मंे गये।  मिस्सा के पश्चात् सिस्टरों ने पूछा कि इतने व्यस्त जीवन के बावजूद भी वे मिस्सा में भाग लेने के लिए कैसे समय निकाल पाते हैं तो उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘मेरी यही कोशिश रही है कि मैं हर रोज मिस्सा में भाग लूं, क्योंकि इसी के द्वारा मुझे दैनिक कार्य करने की प्रेरणा एवं शक्ति मिलती है।’’

यूखारिस्त द्वारा येसु हमें शक्ति एवं साहस प्रदान कर हमारे जीवन में परिवर्तन लाना चाहते हैं।  आइए हम इस महान संस्कार को हमारे ख्रीस्तीय जीवन का प्रेरणा-स्रोत्र बनाये तथा न केवल भक्तिभाव से इस समारोह में भाग ले वरन् ज़रूरतमंदों की सेवा में अपने जीवन को अर्पित भी करें।

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