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Sunday Homilies - September 02, 2012
वर्ष का बाईसवाँ इतवार
By फादर मरिया स्टीफ़न
विधि-विवरण 4:1-2,6-8; याकूब 1:17-18, 21ब-22,27; मारकुस 7:1-8,14-15,21-23

 रोमी साम्राज्य में, एक वृद्ध रब्बी, यहूदी धार्मिक गुरू कारागार में कै़द था।  उसे न्यूनतम भोजन-पानी मिलता था जिससे वह मात्र जी सके।  समय बीतने के साथ वह वृद्ध रब्बी दुबला पतला एवं कमज़ोर होता गया, यहाँ तक कि आखिर रब्बी के स्वास्थ्य की परख के लिये एक चिकित्सक को कारागार में आना पड़ा।  काफी जाँच पड़ताल के बाद चिकित्सक को समझ में आया कि उसकी बीमारी का कारण पीने के पानी की कमी थी।  भोजन के साथ जो पानी उस वृद्ध रब्बी को पीने के लिये दिया जाता था, वह उससे अपने हाथ और अंगुलियों को धोता था क्योंकि यहूदी रीति-रिवाज़ों के अनुसार भोजन के पहले हाथ और उँगलियों को धोना ज़रूरी समझा जाता था।  इस धर्मविधि के बाद पीने के लिए पानी नहीं बचता था।  इसी कारण वह बहुत बीमार हो गया तथा उसकी हालत नाज़ुक थी।

शुरूआत में यहूदियों के लिए दस आज्ञाएं तथा पुराने विधान की प्रथम पाँच किताबें बहुत ज़रूरी मानी जाती थी।  आगे चलते-चलते प्रभु येसु के जन्म के करीब पाँच सदियों पहले कुछ कानूनी विशेषज्ञ यहूदी समुदाय में उभरने लगे।  उन्हीं को शास्त्री कहते हैं।  उस समय तक यहूदियों के बीच कुछ धार्मिक मूल्य प्रचलित थे परन्तु शास्त्रियों ने इन मूल्यों को बारिकी से कानून का रूप दिया  हाँलाकि ये कानून लिखे नहीं गये थे।  इन कानूनों को वे दूसरों को सिखाते थे।  फलस्वरूप इन कानूनों का संग्रह पुरखों की परंपरा कहलाने लगा।  धीरे-धीरे ये कानून लिखित रूप में सामने आये।  इन कानूनों में शुद्धता संबंधी कानूनों को बहुत महत्व दिया गया।  इन कानूनों को मानने वाले कुछ पशु-पक्षियों को अशुद्ध मानने लगे।  महिला अपने प्रसव के बाद अशुद्ध मानी जाती थी।  कुष्ठ रोगी अशुद्ध माना जाता था।  कोई भी व्यक्ति मृत शरीर को छूने से अशुद्ध हो जाता था।  गैर-यहूदियों की संगति अशुद्धता का कारण मानी जाती थी।  इसी कारण बाजार से लौटने वाले यहूदी को अपने पूरे शरीर को धोकर शुद्ध बनाना पड़ता था। 

इस पुरखों की परंपरा के परिपेक्ष में हमें आज के सुसमाचार को पढ़ना और समझना चाहिए।  शास्त्रियों की यह शिकायत थी कि येसु के शिष्य बिना धोये हुए हाथों से रोटी खाकर पुरखों की परंपरा का उल्लंघन कर रहे हैं।  हमें मालूम है कि भोजन करने के पहले अपने हाथों को साफ करना चाहिए।  माता-पिता बच्चों को यह शिक्षा हमेशा देते रहते हैं।  रोटी खाते समय भोजन को कुटाणुओं से बचाना ज़रूरी है ताकि खाने वाला बीमार न हो।  इसी कारण शास्त्रियों की शिकायत सुनकर शायद हमें ऐसा लगता है कि वे ठीक तो कह रहे हैं।  परन्तु शास्त्रियों के लिये भोजन के पहले हाथ धोना एक धार्मिक विधि थी।  वे यह सिखाते थे कि जो बगैर हाथ धोये बिना भोजन करते हैं वे आध्यात्मिक रीति से अशुद्ध हो जाते हैं या पाप करते हैं।  उनका यह विचार था हाथ धोने की धार्मिक विधि के द्वारा वे अपने आप को ईश्वर के सामने शुद्ध कर सकते हैं।  उसकी संकुचित विचारधारा के कारण वे दूसरे समुदाय के लोगों को अशुद्ध मानते थे तथा उनसे दूर रहने की हर संभव कोशिश करते थे।  इस कोशिश में वे एक महत्वपूर्ण बात को भूल जाते हैं कि इस दुनिया के सभी मनुष्यों की सृष्टि ईश्वर ने ही की है और ईश्वर सभी लोगों का ख्याल रखते हैं।  प्रभु येसु जो पिता परमेष्वर के प्यार की शिक्षा लोगों को देना चाहते थे इस संकुचित विचारधारा से अपने को अलग करना चाहते थे तथा अपनी शिक्षा में इसका विरोध करते थे।  प्रभु येसु इन रीति-रिवाज़ों से ज्यादा मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देना चाहते थे।  इसी शिक्षा से प्रभावित होकर शिष्य हाथ धोये बिना भोजन पर बैठते हैं।  शास्त्रियों का अनुसरण करने वाले जब बारिकी से पुरखों की पंरपराका अनुसरण करते थे तो मानवीय मूल्यों की अवहेलना करते थे।

जब कानून मनुष्य से ज्यादा महत्व रखता है तो ऐसे समुदाय में मानवीय मूल्यों का आदर नहीं होता है।  इसी कारण शास्त्रियों के जीवन के खोखलेपन को दर्शाते हुए प्रभु उन्हें ढ़ोंगी कहते हैं और नबी इसायाह के शब्दों को दोहराते हुए कहते हैं, ’’ये लोग मुख से मेरा आदर करते हैं परन्तु इनका हृदय मुझ से दूर है।  ये व्यर्थ ही मेरी पूजा करते हैं; और जो शिक्षा ये देते हैं वो है मनुष्य के बनाये हुए नियम मात्र।’’  प्रभु चाहते हैं कि उनके शिष्यों का व्यवहार पुरखों की परंपरा तक ही सीमित न रहकर ईश्वर की आज्ञा को प्राथमिकता दे।  प्रभु अपने शिष्यों को यह सिखाते हैं कि वे आंतरिक शुद्धता पर ध्यान दे, अपने सोच-विचार में, विचारधाराओं में शुद्ध रहें।  शिष्यों के हृदय में व्यभिचार, चोरी, हत्या, परगमन, लोभ, विद्वेष, क्षलकपट आदि पापों को जड़ जमाने का अवसर न मिले। 

इसी बात को ही संत याकूब अपने पत्र में आज के दूसरे पाठ द्वारा हमारे सामने पेश करते हैं।  उनका कहना है कि हम न केवल वचन के श्रोता बने, बल्कि उसके पालनकर्त्ता भी बन जाये।  इस संदर्भ में संत याकूब शुद्धता तथा निर्मल धर्माचरण की परिभाषा विपत्ति में पड़े हुये अनाथों तथा विधवाओं की सहायता करना और अपने संसार के दूषण से बचाये रखना बताते हैं।  इस प्रकार आज का ईशवचन हमें आंतरिक रीति से तथा ईश्वर के सामने शुद्ध बनने का निमंत्रण देता है।

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