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Sunday Homilies - October 14, 2012
वर्ष का अट्ठाईसवाँ इतवार
By फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल
प्रज्ञा 7:7-11; इब्रानियों 4:12-13; मार्कुस 10:17-30

संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 10 में हम देखते हैं कि एक शास्त्री ने आकर प्रभु से पूछा, “गुरुवर! अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए“?  यह सुनकर प्रभु ने उससे पुछा, “संहिता में क्या लिखा है?“  असने उत्तर दिया, “अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्वि से प्यार करो, और अपने पडोसी को अपने समान प्यार करो  इस पर प्रभु येसु ने उससे कहा, “तुमने ठीक उतर दिया।  यही करो और तुम जीवन प्राप्त करोगो  आज के सुसमाचार में भी हमने एैसा ही एक घटना के बारें में सुना।  एक युवक आकर प्रभु येसु से वही प्रश्न पुछता है जो शास्त्री ने प्रभु येसु से पूछा था अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए“?  प्रभु युवक से आज्ञाओं के बारे में पूछते हैं और युवक कहता है कि उसने बचपन से ही इन सबी आज्ञाओं का पालन किया है।  यह सुनकर प्रभु उस से कहते हैं कि तुम में एक बात की कमी है, जाओ अपना सब कुछ बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। 

हमने यहाँ दो अलग घटनायें देखी।  इन दोनों के द्वारा प्रभु येसु हमसे एक ही बात कहना चाहते हैं कि ईश्वरीय राज्य में प्रवेश करने केलिए हमें सबसे ज्यादा ईश्वर को, और अपने समान अपने पडोसी को प्यार करना चाहिए।  पहली घटना में यह बात बिलकुल साफ है कि प्रभु येसु शास्त्री से कहते हैं कि अपने ईश्वर को अपनी सारी आत्मा, सारी शक्ति और बुद्धि से प्यार करो और अपने पडोसी को अपने समान प्यार करो, तुम जीवन प्राप्त करोगे।  लेकिन आज के सुसमाचार में यह बात इतना साफ नहीं है, फिर भी मनन चिन्तन करने से हमें मालूम होता है कि अखिर इस घटना में भी प्रभु वही शिक्षा देते हैं जो उन्होंने शास्त्री को दी थी। 

युवक ने कहा कि उसने अपने जीवन में सभी आज्ञाओं का पालन किया है लेकिन जब प्रभु ने उससे कहा कि अपना धन बेचकर गरीबों को दान दे दो, तो वह उदास हो गया क्योंकि वह ईश्वर या ईश्वर राज्य से ज्यादा अपने धन को प्यार करता था।  वह अपनी सारी शक्ति से अपने ईश्वर को नहीं लेकिन धन संपति को प्यार किया।  इसलिए वह उदास हो गया।  प्रभु येसु यहाँ उस युवक से उस चीज को छोडने के लिए कहते हैं जिसे वह ईश्वर से या ईश्वरीय राज्य से ज्यादा प्यार करता है। 

युवक ने सभी आज्ञाओं का पालन किया तथा अपने आपको पापों से दूर रखा।  फिर भी वह जीवन में  ईश्वर को या ईश्वरीय राज्य का अनुभव नहीं कर सका क्योंकि वह ईश्वर से ज्यादा धन को प्यार करता था।  आज्ञाओं का पालन करना या पापों से दूर रहना स्वर्गराज्य में प्रवेश करने केलिए काफी नहीं है।  आज्ञाओं का पालन कोई भी कर सकता है और यह करने केलिए अनेक कारण भी हो सकते हैं।  कोई डर के मारे आज्ञाओं का पालन करता है तो कोइ दूसरों को दिखाने के लिए।  लेकिन प्रभु हमसे चाहते हैं कि सर्वप्रथम हम ईश्वरीय प्यार की अज्ञाओं का पालन करें एवं पापों से दूर रहें। 

प्रभु के जीवन में हम देख सकते हैं कि उन्होंने आज्ञाओं का पालन किया और अपने आप को पापों से दूर रखा।  लेकिन इससे भी बढ़कर उन्होंने अपने पिता को प्यार किया।  इसके साथ-साथ उन्होंने हमें भी इतना प्यार किया कि हमारे लिए वे क्रूस पर मर गये।  हमारा धार्मिक नियमों का पालन, प्रार्थनामय जीवन तब ही पूर्ण होगा जब हम प्रभु येसु के समान ईश्वर एवं अपने पडोसी को प्यार कर सकते हैं।  तभी हम प्रभु के समान सब कुछ त्यागकर दूसरों के लिए अपना जीवन समर्पित कर सकते हैं।

संत लूकस के सुसमाचार में हम खोये हुए लडके का दृष्टान्त पढते हैं।  जब भी हम इस दृष्टान्त के बारे में सोचते हैं, दोनों पुत्रों में से हम छोटे पुत्र को ज्यादा याद करते हैं।  हम बडे पुत्र के बारे में बहुत कम सोचते हैं।  परंतु प्रभु येसु यह दृष्टांत ऐसे पापियों से नहीं कहा था जिन्हें छोटा पुत्र प्रतिनिधित्व करता है लेकिन फरीसी, शास्त्री आदी लोगों से कहा था जिन्हें दृष्टांत में बडा लडका प्रतिनिधित्व करता है।  इसका मतलब यह है कि दृष्टांत में छोटे लडके से ज्यादा बडे लडके पर हमें ध्यान देना चाहिए।  इस दृष्टान्त में बडे पुत्र को एक आज्ञाकारी पुत्र के रूप में दर्शाया गया है।  पहली नज़र में इसमें हम कोई कमी नहीं देख सकते हैं।  परंतु जब हम गहराई से अध्ययन करते हैं, तब उसकी व्यक्तित्व की बहुत कमियाँ दिखने लगती हंै।  सबसे ज्यादा यह है कि वह अपने पिता के साथ रहने के बावजूद भी अपने पिता के समान नहीं बन सका।  पिता के समान अपने छोटे भाई को प्यार नहीं कर सका, पिता के समान क्षमा नहीं कर सका।  इसी प्रकार फरीसी और शास्त्री जैसे लोग जिन्हें प्रभु येसु ने यह दृष्टांत सुनाया था, आज्ञाओं का पालन करते हैं, पापों से दूर रहते हैं, फिर भी अपने ईश्वर से बहुंत दूर रहते हैं, अपने ईश्वर के समान व्यवहार नहीं करते हैं। 

प्रभु येसु ने हमें बुलाया हैं न केवल आज्ञाओं का पालन करने केलिए, या पापों से दूर रहने के लिए लेकिन इनसे ज्यादा पिता परमेश्वर के समान बनने, पिता परमेष्वर के समान व्यवहार करने और उनके समान प्यार करने के लिए।  हमारा आत्मिक जीवन तभी पूर्ण होगा, जब हम आज्ञाओं का पालन करते हुए एवं पापों से दूर रहते हुए हमारे सारे हृदय, सारी आत्मा, सारी शक्ति एवं सारी बुद्धि से ईश्वर को और अपने पडोसी को अपने समान प्यार कर सकते हैं।  हम भी सुसमाचार के युवक के समान जीवन में आज्ञाओं का पालन करते होंगे, पापों से दूर रहते होंगे, लेकिन आज प्रभु येसु हमें भी चुनैती देते हैं कि हम इससे भी आगे बढ़े और जीवन में ईश्वरीय राज्य का अनुभव कर सकें।

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