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Sunday Homilies - October 21, 2012
वर्ष का उन्तीसवाँ इतवार
By फादर रोनाल्ड वाँन
 

इसायाह 53:10-11; इब्रानियों 4:14-16; मारकुस 10:35-43

संघर्ष मानव जीवन का पर्याय है।  बिना संघर्ष या दुःख-तकलीफ के किसी भी उपलब्धि को हासिल करना संभव नहीं है।  यह बात अलग है कि जिस प्रकृति का हमारा लक्ष्य होगा उसी प्रवृत्ति का हमारा संघर्ष भी होगा।  प्रभु येसु £ीस्त का लक्ष्य समस्त मानवजाति को पाप की दासता से मुक्त करना था।  और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रभु ने सेवा का माध्यम चुना था।  हम सभी जानते हैं कि सेवा करना इतना आसान नहीं होता वह भी जब सारी मानव जाति इसकी विषय-वस्तु हो।

प्रभु येसु के जीवन के अंतिम दिनों का मुख्य कार्य अपने षिष्यों के प्रषिक्षण को पूरा करना था।  प्रभु यह चाहते थे कि उनके षिष्य यह अच्छी तरह से सीख लें कि उनका मानवजाति को बचाने का लक्ष्य केवल दुःखभोग एवं मृत्यु के द्वारा ही संभव है और षिष्यगण यदि इसे अपनाने को तैयार हो तो ही वे उनके षिष्य रह सकते हैं।  आज के सुसमाचार के ठीक पहले के वाक्यांश इसी बात को दर्षाते हैं।  प्रभु मारकुस 10:32-34 में स्पष्ट रूप से कहते हैं, ’’वे येरूसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। . . . ईसा बारहों को फिर अलग ले जा कर उन्हें बताने लगे कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी, ’’देखो हम येरूसालेम जा रहे हैं।  मानव पुत्र महायाजकों और शास्त्रियों के हवाले कर दिया जायेगा।  वे उसे प्राणदण्ड की आज्ञा सुनाकर ग़ैर-यहूदियों के हवाले कर देंगे, उसका उनहास करेंगे, उस पर थूकंेगे, उसे कोड़े लगायेंगे और मार डालेंगे; लेकिन तीसरे दिन वह जी उठेगा।’’

आज के सुसमाचार को सुनकर लगता है कि षिष्य या तो प्रभु की बात समझे नहीं थे या फिर उन्होंने इसे समझने से इंकार कर दिया था।  जल्द ही वे दुनियावी महिमा के अपने सपनों में खो जाते हैं, जहाँ वे सर्वोत्तम एवं सर्वोच्च स्थान पर विराजित हो सकेंगे।  याकूब एवं योहन का प्रभु से यह निवेदन कि ’’अपने राज्य की महिमा में हम दोनों को अपने साथ बैठने दीजिए- एक को अपने दायें और एक को अपने बायें’’ इसी बात प्रमाणित करता है।  इसके बात बाकि के दस प्रेरितों का उन पर क्रोधित होना यह दर्षाता है कि उनकी भी सोच एवं महत्वाकांक्षा याकूब एवं योहन से भिन्न नहीं थी।  सभी प्रेरितों की स्वर्गराज्य के विषय में गलत धारणाओं को दूर करते हुए प्रभु उन्हें स्वर्ग राज्य में सर्वोत्तम एवं सर्वोच्च स्थान पाने का तरीका सीखलाते हैं।  वह तरीका है सेवाभाव।  संसार के अधिपति जो वास्तविक अर्थों में जनहित के लिए चुने जाते हैं अपने स्वार्थ एवं लालच के कारण उसी जनता पर निरंकुश शासन एवं उनका शोषण करते हैं जिसकी उन्हें सेवा करना चाहिए।  प्रभु कहते हैं कि ऐसा उनके षिष्यों के बीच नहीं होना चाहिए।  क्योंकि यदि वास्तव में कोई बड़ा होना चाहता है तो उसे सबसे छोटा बनना चाहिए।  यह तभी संभव होगा जब वह अपने से छोटे से छोटे की सेवा कर उनका उद्धार कर सके।  ऐसा प्रभु न सिर्फ अपने वचनों से बल्कि अपने कार्यों से प्रमाणित भी करते हैं।  इसलिये प्रभु कहते हैं, ’’मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने और बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।’’

इतिहास साक्षी है कि कोई भी मनुष्य अपनी शक्ति एवं सम्प्रभुता के बल पर दुनिया पर हमेशा राज नहीं कर सका है।  कुछ समय के लिए वे बड़े शासक अवष्य बने लेकिन जैसे ही उनकी शक्ति कमज़ोर होती है कोई अन्य आकर उन्हें हटा देता है।  कई शासकों को तो अपने जीवन के अंतिम दिन जेल की कोठरी में बिताने पड़े तो कइयों को असमय मौत का मुँह देखना पड़ा।  इन शासकों का उत्थान व पतन इसलिए होता है कि उनका राज्य इस दुनिया तक ही सीमित रहता है तथा वे अपने राज्य का गठन एवं शासन दुनियावी मापदण्डों के अनुरूप करते हैं।  प्रभु अपने षिष्यों को इससे भिन्न होने को कहते हैं क्योंकि जिस राज्य की घोषणा एवं गठन प्रभु करते हैं वह इस दुनिया से परे है।  षिष्यों को जरूरत इस बात की थी कि वे प्रभु के राज्य के रहस्यों को समझें।  

इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि किस तरह निहत्थे लोगों ने बिना धन-दौलत एवं शक्ति के बल पर दुनिया में वह स्थान पाया जो बड़े-बड़े शक्तिशाली शासक नहीं पा सके।  हमारे युग में इसका सर्वोत्तम उदाहरण मदर तेरेसा का है।  अपने जीवन को उन्होंने लोगों की सेवा में लगा दिया।  अपनी सेवा के द्वारा वे इतनी महान बन गयी कि संसार के बड़े-बड़े शासक उनसे मिलकर अपने को धन्य समझते थे।  मदर तेरेसा ऐसा इसलिए कर पायी कि उन्होंने प्रभु के स्वर्गराज्य को न सिर्फ समझ लिया था बल्कि उस तक पहुँचने का रास्ता भी पहचान गयी थी।  वह रास्ता था लोगों की सेवा।  वे कहा करती थी कि उन्हें लोगों के घावों में क्रूसित प्रभु के घाव नज़र आते है।  ऐसी महान मनोवृत्ति मदर ने बना ली थी।  जो कोई भी इस बात को समझ लेता है उसका जीवन एवं कार्यप्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन आ जाता है।  इसलिए अगर कोई कहे कि मैं ख्रीस्तीय हूँ एवं उसके कार्यों में सेवाभाव न हो तो लोग उसकी अन्य बातों से भले ही प्रभावित हों एवं प्रषंसा करें, पर उनपर पर इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता कि वह ख्रीस्तीय है।  सच्चा ख्रीस्तीय सेवाभाव लोगों के लिए उनके ख्रीस्तीय होने की उनकी पहचान बन जाता है। 

सेवाभाव के साथ एक अन्य बात हमेशा जुड़ी रहती है।  वह है दुःख-तकलीफ।  जब कभी भी हम सेवा करते हैं तो इसकी कीमत हमें चुकानी पड़ती है।  यह कीमत चाहे धन की हो या फिर अत्याचार की।  सेवाभाव में लगे लोगों को कई बार लोगों की गलतफहमी, कुंठित विचारधारा, द्वेष एवं पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है।  इस कारण सेवा का मार्ग दुःख का मार्ग बन जाता है।  प्रभु ने अपने जीवन में इन नकारात्मक शक्तियों को महसूस किया एवं इस का सामना सकारात्मक ढंग से किया तथा इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर भी चुकानी पड़ी।  इसलिये जब कभी भी प्रभु द्वारा बताये सेवा के मार्ग पर दुःख-तकलीफों का सामना हो तो हमें हमेशा प्रभु के जीवन पर मन्न् करना चाहिए।  इब्रानियों के नाम पत्र में लेखक भी पीडि़त £ीस्तीयों को ढ़ाढस बंधाते हुए कहते हैं कि, ’’ हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।’’

जब याकूब एवं योहन ने प्रभु से ’’अपने राज्य की महिमा में हम दोनों को अपने साथ बैठने दीजिए- एक को अपने दायें और एक को अपने बायें’’ का निवेदन किया तब प्रभु उनसे पूछते हैं कि क्या ’’जो प्याला मुझे पीना है, क्या तुम उसे पी सकते हो?’’  इस पर उनका उत्तर था, ’’हम यह कर सकते हैं’’  भले ही याकूब एवं योहन ने यह कहा हो कि वे यह कर सकते हैं लेकिन यह निष्चित है कि उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि प्रभु के प्याले को पीने का मतलब प्रभु के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर करना है, यहाँ तक की अपना जीवन भी।  लेकिन यही याकूब एवं योहन जब प्रभु के राज्य को पहचान जाते हैं तो अपना जीवन प्रभु के सुसमाचार की सेवा में समर्पित कर देते हुए शहीद हो जाते हैं।  याकूब शहीद होने वाले प्रथम प्रेरित थे, वहीं योहन आखिरी।  ये दोनों भाई जो सांसरिक महिमा के बारे में सोचा करते थे अपना जीवन प्रभु के लिए इसलिये शहीद कर सके कि उन्होंने प्रभु के स्वर्गराज्य को पहचान लिया था। 

संत पौलुस कुरिन्थियों के नाम पहले पत्र 16-17 में ख्रीस्तीयों से कहते है, ’’क्या आषिष का वह प्याला, जिस पर हम आषिष की प्रार्थना पढ़ते हैं, हमें मसीह के रक्त के सहभागी नहीं बनाता? हम सब यूखारिस्तीय संस्कार में प्रभु के उसी प्याले से पीते हैं जिसे प्रभु ने संत याकूब एवं योहन को पीने के लिए पूछा था।  अगर हम प्रभु के प्याले के सहभागी हैं तो क्या हमें प्रभु के कार्यों में सहभागी नहीं बनना चाहिए?  आइए, हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम वास्तविक अर्थों में प्रभु के प्याले के सहभागी बन जायें एवं सेवाभाव के द्वारा उस प्याले की प्रतिज्ञाओं को पूरा करें।

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