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Sunday Homilies - October 28, 2012
वर्ष का तीसवाँ इतवार
By फादर जोस प्रकाश
यिरमियाह 31:7-9; इब्रानियों 5:1-16; मारकुस 10:46-53

हमारे ईश्वर चत्मकारों तथा अद्भूत कार्यों के ईश्वर है।  वे शक्तिशाली तथा महान हैं।  वे कहते हैं, ’’मैं, प्रभु, सब शरीरधारियों का ईश्वर हूँ।  क्या मेरे लिए कुछ भी असंभव है?’’  नबी यिरमियाह के ग्रंथ से आज के पहले पाठ में प्रभु लोगों को आनन्द मनाने तथा ईश्वर के स्तुतिगान करने का निमंत्रण देते हैं क्योंकि वे एक महान कार्य करने वाले है।  प्रभु अपनी प्रजा को निनीवे के निर्वासन से करीब सौ साल के बाद अपने देश लौटने की कृपा प्रदान करते हैं।  प्रभु कहते हैं, ’’वे रोते हुए चले गये थे, मैं उन्हें सांत्वना देकर वापस ले आऊँगा।  मैं उन्हें जलधाराओं के पास ले चलूँगा, मैं उन्हें सममतल मार्ग से ले चलूँगा, जिससे उन्हें ठोकर न लगे; क्योंकि मैं इस्राएल के लिए पिता जैसा हूँ और एफ्रईम मेरा पहलौठा है।’’  प्रभु ने अपने शक्तिशाली हाथों से इस्राएल को लम्बे निर्वासन के बाद पुनः एक स्वतंत्र प्रजा बनायी।  इस्राएल का निर्वासन पाप की गुलामी का प्रतीक है तथा उनका पुनः अपने देश लौटना मुक्ति का प्रतीक है।  जब हम जो पाप करते है तब हम निवार्सन में है।  इस निर्वासन से प्रभु ही हमें मुक्ति दिला सकते हैं।  वे हमें अपनी निजी प्रजा बनाना चाहते हैं न सिर्फ निजी प्रजा बल्कि अपनी प्रिय संतान।  संत पौलुस कहते है, ’’अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।’’ (गलातियों 4:7)

आज के सुसमाचार में हमने येरीखो बरतिमेउस नामक अंधे भिखारी के बारे में सुना।  अपने अंधेपन के कारण उसे अपना पेट भरने के लिए भीख माँगना तथा दूसरों की दया पर निर्भर रहना पड़ा।  शायद इस संर्दभ में उसने अपना आत्मसम्मान एवं आत्मविश्वास भी खो दिया।  प्रभु ने उसे उसकी दृष्टि लौटाई वो अंधा भिखारी भीख माँगना छोड़कर प्रभु का अनुयायी बन गया।  इस घटना से हम तीन सबक सीख सकते हैं। 

पहला, सबसे पहले हमें यह महसूस होता है कि बरतिमेउस प्रार्थना करने वाला व्यक्ति है।  जब उसने सुना कि प्रभु वहाँ से गुज़र रहे हैं तो वह पुकार-पुकार कर कहने लगा, ’’ईसा, दाऊद के पुत्र मुझ पर दया कीजिए’’  जब लोगों ने उसे चुप कराना चाहा तो वह और भी ज़ोर-ज़ोर से पुकारकर प्रार्थना करने लगा।  इस प्रार्थना की सुनवायी होती है और उसकी दृष्टि लौट आती है और वह मार्ग में प्रभु के पीछे हो लिया। 

दूसरी बात यह है कि उसका विश्वास गहरा था।  उसने पक्के विश्वास के साथ प्रभु के समक्ष विनती की।  इसी कारण प्रभु ने उससे कहा, ’’तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है’’  इब्रानियों के नाम पत्र में हम पढ़ते हैं, ’’विश्वास उन बातों की स्थिर प्रतीक्षा है, जिनकी हम आशा करते हैं और उन वस्तुओं के अस्तित्व के विशय में दृढ़ धारणा है, जिन्हें हम नहीं देखते।’’ (इब्रानियों 11:1)  विश्वास के कारण ही हाबिल, नूह, इब्राहिम और मूसा ईश्वर के कृपा पात्र बनें।  ’’विश्वास के अभाव में कोई ईश्वर का कृपापात्र नहीं बन सकता।  जो ईश्वर के निकट पहुँचना चाहता है, उसे विश्वास करना है कि ईश्वर है और वह उन लोगों का कल्याण करता है, जो उसकी खोज में लगे रहते हैं।’’ (इब्रानियों 11:6) 

तीसरी बात यह है कि बरतिमेउस चंगाई के बाद प्रभु का चेला बन गया।  इसका यह मतलब की उसे शरीरिक चंगाई के अलावा आध्यात्मिक चंगाई भी प्राप्त हुई।  उसकी आंतरिक आँखें खुल गयी।  वह अपने को और प्रभु को सही ढंग से देखने लगा।  उसने प्रभु को अपने प्रभु तथा मसीह के रूप में स्वीकार किया। 

हमारे जीवन में हम देखते हैं कि हमने भी प्रभु के चमत्कारों को अनुभव किया है।  उन्होंने हमें बड़ी कृपा तथा वरदान प्रदान किये हैं।  उन्होंने हमें पापों की क्षमा, शारीरिक चंगाई, बुरी आदतों की गुलामी से मुक्ति प्रदान की है।  क्या हम उनकी कृपा के प्रति कृतज्ञ बने रहते हैं।  स्तोत्रकार कहता है, ’’धर्मियों! प्रभु में आनन्द मनाओ!  स्तुतिगान करना भक्तों के लिए उचित है।’’ (स्तोत्र 33:1)  बरतेमिउस ने अपनी अटल प्रार्थना तथा आशावान विश्वास के कारण ही प्रभु से चंगाई प्राप्त की।  प्रभु हमें निमंत्रण देते हैं कि हम प्रार्थना में सभी विघ्न बाधाओं को दूर कर दृढ़ विश्वास के साथ अपने जीवन को प्रस्तुत करे ताकि हम प्रभु की महिमा का दर्शन कर पाये।  जिस प्रकार बरतेमिउस ने अपने भीख के कटोरे तथा कपड़े को छोड़कर प्रभु का अनुगमन किया उसी प्रकार हम भी अपने पापमय जीवन को छोड़कर खुशी के साथ प्रभु का अनुगमन करे।

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