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Sunday Homilies - November 04, 2012
वर्ष का इकतीसवाँ इतवार
By फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल
विधि-विवरण 6:2-6; इब्रानियों 7:23-28; मार्कुस 12:28ब-34

बाइबिल के पुराने विधान में अनेक जगहों पर हम ईश्वर के वचन को मूर्तिपूजा के विरुद्ध आवाज़ उठाते हुए देख सकते हैं।  बाइबिल की यह शिक्षा है कि मूर्तिपूजा ईश्वर की दृष्टि में कठोर पाप है, इसलिए मूर्तिपूजा करने वालों को ईश्वर दण्ड देते हैं।  आजकल मूर्तिपूजा के बारे में कम सुनने में आता है।  लेकिन मूर्तिपूजा आज भी हमारे समाज में प्रचलित है।  शायद हज़ारों साल पहले के समान नहीं लेकिन नये रूप में आज भी मूर्तिपूजा चल रही है।  ईश्वर को छोड़कर अन्य देवी-देवताओं की आराधना करना, या उनकी मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने के कार्य को अक्सर हम मूर्तिपूजा कहते हैं।  लेकिन मूर्तिपूजा का मतलब इस से भी ज्यादा विशाल है।  नष्वर वस्तुओं एवं बातों को अनष्वर मानकर उस के लिए जीवन बिताने को हम मूर्तिपूजा कह सकते हैं।  हमारे जीवन में जो स्थान हमें ईश्वर को देना है उन्हें भूलाकर यह स्थान ईश्वर की किसी सृष्टि को देना भी मूर्तिपूजा है।  इस मतलब से देखेंगे तो इस दुनिया में ऐसी बहुत सारी चीजें और वासनायें हैं जो नष्वर हैं फिर भी मनुष्य उन्हें अनष्वर मानते हुए जीवन में प्रथम स्थान देता है।  जब एक व्यक्ति धन दौलत को ही अपने जीवन का सब कुछ मानता है, और उसे पाने के लिए ही जीता है उस के लिए धन दौलत मूर्ति बन जाती है।  जब कोई अपनी बुरी आदतों या वासनाओं को पूरा करने के लिए ही अपना जीवन जीता है तो उसकी बुरी आदतें एवं वासनायें ही उसके लिए मूर्ति हैं।

आज के सुसमाचार में हमने सुना कि प्रभु येसु कहते हैं कि अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी बुद्धि ओर सारी शक्ति से प्यार करो।  प्रभु का कहना है कि मनुष्य की सिर्फ इसी में ही भलाई है कि वह अपने सारे हृदय से, अपनी सारी आत्मा, सारी बुद्धि और शक्ति से अपने पिता ईश्वर को प्यार करें।  दूसरे शब्दों में कहें तो मनुष्य के लिए इसी में ही भलाई है कि वह सर्वशक्तिमान ईश्वर की ही आराधना करें, सिर्फ उन्हें ही अपने जीवन का आधार बनाये।  लेकिन ज़रा सोचिये, आज मनुष्य के हृदय किन-किन बातों एवं विचारों से भरे हुए हैं।  उसकी सारी बुद्धि किस तरह के काम के लिए इस्तेमाल होती है और उसकी सारी शक्ति किस चीज़ की प्राप्ति के लिए उपयोग में लायी जाती है।  अकसर आज का मनुष्य अपनी शक्ति एवं बुद्धि का इस्तेमाल नष्वर चीजें पाने के लिए करता है और उसके हृदय एवं आत्मा नष्वर बातों से भरे हुए हैं और ये उसे विनाश की और ले जा रही है।  मनुष्य ने अनष्वर ईश्वर को छोडकर नष्वर चीजों एवं बातों को अपने जीवन का आधार बनाया है या जीवन में उनकी आराधना करता है।  क्यों यह मूर्तिपूजा नहीं है जिसके विरूद्ध ईश्वर बार बार हमें चेतावनी देते हैं?

बाइबिल में हम राजा दाऊद के बारे में बहुत पढ़ते हैं।  वह इस्राएल का एक महान राजा था, ईश्वर द्वारा विशेष रीति से चुना गया व्यक्ति था।  फिर भी समूएल के दूसरे ग्रन्थ अध्याय 11 में हम देख सकते हैं कि कैसे यह महान व्यक्ति पाप के गर्त में गिर जाता है और उसका जीवन दुख दर्द से भर जाता है।  जब तक उन्होंने सर्वशक्तिमान ईश्वर को अपने जीवन में पहला स्थान दिया, जीवन में सिर्फ उसी की आराधना की, तब तक वह कठिनाईयों के बीच में भी षांतिमय जीवन बिताता रहा।  लेकिन हम देख सकते हैं कि जब उसने अपने जीवन में पहला स्थान अपनी वासनाओं को दिया, तब वह कैसे पाप के चंगुल में फंस जाता है।  जब तक उसने अपने प्रभु ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी बुद्धि और सारी शक्ति से प्यार किया उसका जीवन षांतिमय था।  लेकिन जब वह अपने ईश्वर को भूलकर उनकी सृष्टि को अधिक प्यार करने लगा तो हम देखते है कि वह कितना दुखित हो जाता है।  बिलकुल इसी प्रकार नये विधान में हम यूदस के बारे में पढ़ते हैं।  करीब तीन साल तक वह प्रभु येसु के साथ रहा फिर भी वह प्रभु से ज्यादा धन को प्यार करता था।  उसने अपनी बुद्धि एवं शक्ति का इस्तेमाल धन पाने के लिए ही किया और हम जानते हैं उसका अन्त भी बहुत निराशाजनक था।  इसलिए आज के सुसमाचार में प्रभु येसु हमें याद दिलाते हैं कि हमारी भलाई इसी में है कि हम हमारे जीवन में ईश्वर को पहला स्थान दे या सबसे ज्यादा हम ईश्वर को ही प्यार करें, उसी की आराधना करें।

आज के सुसमाचार के दूसरे भाग में प्रभु येसु सबसे बड़ी आज्ञा का दूसरा भाग हमें समझाते हुए कहते हैं कि अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।  सबसे बड़ी आज्ञा के पहले भाग में प्रभु येसु ने हमें समझाया कि ईश्वर को प्यार करने में ही हमारी भलाई है और दूसरे भाग में हमें ईश्वर को कैसे प्यार करना चाहिये बताया।  अपने पड़ोसी को प्यार करते हुए ईश्वरीय प्रेम प्रकट करने के लिए आज के सुसमाचार द्वारा प्रभु येसु हम से कहते हैं।

एक बार धन्य मदर तेरेसा अपनी नयी सिस्टर्स को कोढ़ियों की सेवा करना सिखा रही थी।  मदर ने सिस्टर लोगों को कोढ़ियों की देखभाल करने के बारे में, उनके घावों को साफ करके मलम लगाकर उस पर पट्टी बाँधने के बारे में उन्हें सिखा रही थी।  ये सब सिखाने के बाद मदर ने सिस्टर गणों को कोढ़ियों की सेवा करने के लिए अपने ही एक कोन्वेंट में भेजा।  जाने से पहले मदर ने उनको एक विशेष बात बताई।  वह विशेष बात यह थीः ’’तुम जानते हो कि मिस्सा बलिदान के समय किस प्रकार एक पुरोहित पवित्र रोटी एवं दाखरस को अपने हाथों में लेते हैं, वे उसे पूर्ण भक्ति एवं आदर के साथ ही अपने हाथों में लेते हैं क्योंकि वह रोटी एवं दाखरस प्रभु येसु का शरीर एवं रक्त है।  कोढियों की सेवा करते समय यह याद रखना की उनका शरीर दूसरे रूप में प्रभु येसु का ही शरीर है।  इसलिए पूर्ण भक्ति एवं आदर के साथ ही उनके शरीर या घावों पर हाथ रखना।  यह कहने के बाद मदर ने उन्हें काढ़ियों की देखभाल करने के लिए भेजा। 

शाम होते ही सभी सिस्टर्स वापस आयीं और मदर ने देखा की उनमें से एक सिस्टर बहुत खुश थी।  मदर ने उसको बुलाया और उसके बहुत आनंदित होने का कारण पूछा।  उस छोटी सिस्टर ने जो दिन भर कोढियों की सेवा कर रही थी, कहा कि दिन भर वह प्रभु येसु के शरीर को स्पर्ष कर रही थी, दिन भर उसे यह अनुभव हुआ कि वह प्रभु की सेवा कर रही थी। 

असीसी के संत फ्रांसिस के जीवन में भी हम ऐसी ही एक घटना देख सकते हंै।  अपने मन परिर्वतन के पहले संत कोढियों से बहुत नफरत करते थे।  लेकिन प्रभु येसु को अनुभव करने के बाद एक बार संत ने अपने रास्ते में ऐसे एक कोढ़ी को देखा जिसका पूरा शरीर घावों से भरा हुआ था।  उन्होंने पहले की तरह मुड़कर वापस दौड़ने की सोची, लेकिन उनकी ही अन्तरात्मा ने उन्हें रोका और उस मनुष्य के निकट भेजा।  वे पहली बार एक कोढी के निकट जा रहे थे।  थोड़ा सा डरे हुए भी थे फिर भी उस के पास गये और मन ही मन प्रभु को पुकारकर उस कोढी को गले लगाया और उसके हर एक घाव को चुम्बने लगे।  जैसे ही वे उन घावों को चुंबते जा रहे थे एक के बाद एक हर एक घाव ठीक होता जा रहा था।  अन्त में उस मनुष्य के शरीर में सिर्फ पाँच घाव ही थे और साथ ही वह मनुष्य भी अदृश्य हो गया तब संत को अहसास हुआ की वह प्रभु येसु ही थे। 

आज के सुसमाचार के दूसरे भाग में अपने पडोसियों में प्रभु येसु को देखकर उसे प्यार करने के लिए प्रभु येसु हमें प्रेरणा देते हैं क्योंकि इस के अलावा ईश्वर को प्यार करना संभव नहीं है।  संत योहन अपने दूसरे पत्र 4, 20 में कहते हैं ’‘यदि कोई यह कहता कि मैं ईश्वर को प्यार करता हूँ और वह अपने भाई से बैर करता, तो वह झूठा है।  यदि वह अपने भाई को जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता, तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी नहीं देखा प्यार नहीं कर सकता।’‘ आज के सुसमाचार द्वारा प्रभु हम से कहते हैं कि हमारी भलाई इसी में है कि हम हमारे जीवन में प्रभु को प्रथम स्थान देकर उसे प्यार करें और इस प्यार को हमारे दैनिक जीवन में प्रकट करें।" cols="70">
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