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Sunday Homilies - November 11, 2012
वर्ष का बत्तीसवाँ इतवार
By फादर शाजी स्टेनीसुलाव
1 राजाओं 17:10-16; इब्रानियों 9:24-28; मारकुस 12:38-44

एक दिन एक सिस्टर आकर मदर तेरेसा से बोली, ‘‘दरवाजे पर एक भिखारी खड़ा है और वह आपसे मिलने का आग्रह कर रहा है।’’  यह सुनकर वह उनसे मिलन के लिये बाहर आई।  वह भिखारी भोजन एवं भीख के लिये नहीं वरन् अपनी कमाई मदर तेरेसा को भेंट के रूप में देने आया था।  उसके पास एक कटोरे में कुछ सिक्के थे जो एक या दो रूपये से ज्यादा नहीं थे।  उसने उन सिक्कों को मदर तेरेसा को दे दिया।  कुछ क्षण मदर तेरेसा दुविधा में खड़ी रहीं क्योंकि वे जानती थीं कि अगर वे उन सिक्कों को स्वीकार करती हैं तो उस भिखारी को उस रात भूखे पेट ही सोना पड़ेगा और यदि वे उन्हें  अस्वीकार करती हैं तो उससे उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी।  अंततः उन्होंने उसकी भेंट को स्वीकार करने का निश्चय किया तब वो भिखारी उनके हाथों का चुम्बन करके वहाँ से चला गया।  जब मदर अपने कमरे में वापस आईं तो बोलीं, ’’उसने मुझे जो कुछ उसके पास था, सब कुछ दान में दे दिया।  आज रात वह शायद भूखा ही सो जायेगा।  मैं इस भेंट को मुझे प्राप्त-नोबेल तथा अन्य पुरस्कारों से भी अधिक महत्व देती हूँ।

आज के सुसमाचार में देखते हैं कि येसु एक गरीब विधवा की अत्युŸाम उदारता की प्रशंसा करते हैं, जिसने अपना सब कुछ दान में दे दिया।  एक दिन जब येसु मंदिर में बैठे थे तब उन्होंने लोगों को दान-पेटी में सिक्के डालते हुए देखा।  कई धनी लोगों ने बहुत अधिक सिक्के दानस्वरूप दिये।  तब एक कंगाल विधवा आई और उसने दान-पेटी में दो अधेले अर्थात् एक पैसा डाल दिया।  यह देख येसु ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा-‘‘मैं तुमसे यह कहता हूँ खजाने में पैसा डालने वालों में से इस विधवा ने सबसे अधिक डाला है, क्योंकि सबने अपनी समृद्धि में से कुछ डाला है परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिये अपने पास जो था, वह सब दे डाला’’  येसु आज एक तरफ तो शास्त्रियों से सावधान रहने तथा उनकी पाखण्डता का अनुसरण न करने की चेतावनी देते हैं।  वहीं दूसरी ओर वे कंगाल विधवा की सच्ची उदारता, विनम्रता एवं दीनता पर प्रकाश डालते हैं।  यह विधवा स्वयं को तथा अपनी आवश्यकताओं को भूलकर अपना सबकुछ दूसरे ज़रूरतमंदों के लिये दे देती है।  यह त्याग उसने न तो अपनी प्रसिद्धि हेतु, न ही पड़ोसियों की प्रषंसा पाने हेतु किया, जबकि शास़्ि़त्रयों ने यहूदियों से प्रशंसा एवं आदर पाने के उद्देश्य से यह किया। 

हममें से कुछ सोचते होंगे कि उस विधवा ने जो किया वह मूर्खता थी क्योंकि उसने भविष्य की परवाह किये बिना अपना सब कुछ दे दिया।  मानवीय विचारों के अनुसार यह एक विवेकहीन कार्य था लेकिन येसु ने उस विधवा की सराहना की क्योंकि येसु अपने जीवन काल के दौरान ऐसा ही करने वाले थे।  उन्होंने स्वयं को क्रूस पर समर्पित किया और उसी साहसिक त्याग का फल आज हमें मिल रहा है।  वह ऐसी कौन-सी बात थी जिसने उस विधवा को अपना सबकुछ दान करने के लिये पे्ररित किया।  ईश्वर के संरक्षण में उसके भरोसे ने उसको यह महान कार्य करने के लिये प्रेरित किया।  विधवा ने बिना शर्त के स्वयं को ईश्वर के हाथों सौंप दिया इस तरह वह येसु की प्रशंसा पाने योग्य बनीं। 

आज के पहले पाठ में हम देखेते हैं कि सरेप्ता की विधवा के पास मुट्ठीभर आटा और कुप्पी में थोड़े-से तेल के अलावा कुछ नहीं था।  उस अकाल के समय वह उससे अपने तथा अपने बेटे के लिए रोटी पकाकर खाने को सोच रही थी।  तब नबी एलियस उससे रोटी माँगते हैं।  उदारता से अपनी निर्धनता में नबी को खिलाने पर उसे ईश्वर की आशिष मिलती है।  पानी बरसने तक न तो उसके बर्तन में आटा समाप्त हुआ और न ही तेल की कुप्पी खाली हुई।  इन विधवाओं के उदाहरणों से प्रभु हमें यह शिक्षा देते हैं कि हमें न केवल अपनी समृद्धी में बल्कि अल्पता में भी उदार रहना चाहिए।  प्रभु की शिक्षा के अनुसार गरीबों का ईश्वर के राज्य में विशेष स्थान है।  जिनका कोई नहीं है उनके लिए ईश्वर ही सबकुछ है।  जब ईश्वर हमारे लिए सबकुछ है तो किसी बात की चिंता नहीं, हमें किसी बात की कमी महसूस नहीं होती।  ईश्वर पर भरोसा रखने वाले ही खुशी व उदारता से दूसरों को दान दे सकते हैं।  जो अपनी सम्पत्ति पर ही भरोसा रखते हैं वे अपनी सम्पŸिा से अलग होना नहीं चाहते हैं।  उदार व्यक्ति का यह विचार है कि ईश्वर उसकी देखरेख करते हैं और इसलिये उसे भविष्य के लिए पूंजी इक्ट्ठा करने की आवष्यकता नहीं है। 

ईश्वर ने इस संसार में जिन वस्तुओं की सृष्टि की उन सब पर सभी मनुष्यों का अधिकार है।  अगर उन पर कुछ ही लोग अधिकार जताकर दूसरों को उनसे वंचित रखते हैं तो वह अन्याय है।  हमें अपनी सम्पत्ति को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहिए।  ईश्वर ही सबकुछ का मालिक है।  वास्तव में हम इस दुनिया में ईश्वर की सम्पत्ति के कारिन्द मात्र है।  ईश्वर की सम्पत्ति पर उनकी सभी संतानों का अधिकार है।  हम कौन होते है कि दूसरों को उस अधिकार से वंचित रखें।

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