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Sunday Homilies - November 25, 2012
ख्रीस्त राजा का पर्व
By फादर अंथोनी आक्कानाथ
दानिएल 7:13-14; प्रकाशना 1:5-8; योहन 18:33ब-37

आज का रविवार एक महत्वपूर्ण रविवार है क्योंकि यह ख्रीस्तीय पूजनवर्ष के अनुसार आखिरी रविवार है।  पिछले आगमन में जब ख्रीस्तीय पूजनवर्ष प्रारंभ हुआ था तब हमारा ध्यानाकर्षण उस स्वप्न और आशा की ओर किया गया था जिसका केन्द्र बिन्दु गौशाले में जन्मा मुक्तिदाता राजा था।  अतः आज यह लाज़िमी है कि हम उस पिछले आगमन की हमारी आशा और स्वप्न की उपलब्धि पर मन्न् करें।   ख्रीस्त, जो गौशाले में जन्मे, ने हमारे जीवन के लिये आदर्श प्रस्तुत किया कि हम संसार की ज्योति बनकर जीये।  वे मृत्यु और पुनरुत्थान द्वारा रहस्यमय रूप से ईश्वरीय कृपा को हमारे लिये लेकर आये।  वही ख्रीस्त सारे संसार का सच्चा राजा है।  वे मेहनती बढ़ई, उत्साही और प्रचण्ड प्रचारक संसार का केन्द्र बिन्दु है, सभी प्राणियों का मूल, आदि और अंत हैं।

महान राजाओं की जो तस्वीर दुनिया का इतिहास हमारे सामने रखता है उसके अनुसार राजा का जन्म राजमहल में होता है, वह सब सुख-सुविधाओं का जीवन बिताता है, वह शूर-वीर बनकर सभी शत्रुओं को हिंसा के द्वारा मिटा देता है और लोग उनकी सेवा करते हैं।  प्रभु येसु का राजत्व इससे भिन्न है।  प्रभु येसु कोई दुनियावी, पराक्रमी हिंसक राजा नही हैं।  सच्चा राजा प्रजा की सुख-षाँति को प्राथमिकता देता हैं।  ख्रीस्त वह सच्चा राजा हैं जो हमें सत्य, शांति और स्वतंत्रता की दुनिया में ले चलते हैं।

यह वह राजा हैं जो सत्य की शिक्षा देते हैं।  संत योहन ने अपने सुसमाचार में 21 बार सत्यशब्द का प्रयोग किया है।  स्पष्ट है उनके लिये इसका बहुत महत्व है।  प्रभु येसु सत्य के राजा हैं, वे ही सत्य हैं, प्रभु येसु ने सत्य के विषय में शिक्षा दी ताकि सत्य हमारे अंदर प्रवेश करे।  वे संसार में आये जिससे वे सत्य के विषय में साक्ष्य दे सकें।  सत्य का आत्मा उनमें विराजमान था, वस्तुतः हम भी सत्य से संबंध रखते हैं, क्यांेकि हम उनकी वाणी सुनते हैं।

पिलातुस ने येसु से पूछा, तो तुम राजा हो?  येसु ने उत्तर दिया, आपने ठीक कहा, मैं राजा हूँ, इसलिये ही मैंने जन्म लिया है, और संसार में आया हूँ, जिससे कि मैं सत्य के विषय में साक्ष्य दे सकूँ।  वे सब जो सत्य के हैं, मेरी आवाज़ सुनते हैं।’’  इसका मतलब है ख्रीस्त हमें सत्य में आत्मसात होने के लिये बुलाते हैं।  ख्रीस्त राजा वह सत्य हमें सिखाते हैं कि ईश्वर का राज्य हमारे बीच है (देखिए लूकस 17:20)  यह राज्य वहाँ विद्यमान है जहाँ हमारी दृष्टि दूसरों को अपने भाई-बहन के रूप में देखती है।  यह राज्य वहाँ हैं जहाँ हम बेघर, अनाथों, बंदियों, एड्स रोगियों, आदि की देखभाल करते हैं।

यह राज्य केवल भविष्य का वह समय नहीं है जब ख्रीस्त विजयी रूप में संसार में आयेंगे, बल्कि यह राज्य वर्तमान में हमारे हृदयों में है।  यदि हम उनके लिये अपना हृदय खोलते हैं तो ख्रीस्त आज हमारे हृदय में आयेंगे, वे जीवन को कृपाओं से भर देंगे जो हमें दूसरों के साथ इस राज्य का अनुभव करने में सहायता करती हैं।

क्या आपने कभी गौर किया है कि संत योहन के अनुसार पिलातुस और येसु के बीच वार्तालाप एक प्रश्न पर समाप्त हो गया!  प्रभु येसु ने पिलातुस के सवाल का जवाब नहीं दिया-सत्य क्या है?  परन्तु यदि हम सोचें कि उसका जवाब क्या हो सकता था, तो सुसमाचार के बाकी भाग पढने से हम अनुमान लगा सकते हैं कि प्रभु येसु, पिलातुस को यही उत्तर देते- मेरे पुत्र, सत्य यही है कि ईश्वर तुम्हें प्यार करते हैं और मुझसे तुम कैसा भी व्यवहार करो वे तुम्हें अपनाने को तैयार हैं।  यह सत्य तुम्हारा जीवन बदलने के लिये पर्याप्त है और तुम्हें ईश्वर की महिमा के मार्ग पर ले चलने के लिये भी।  योहन के सुसमाचार में प्रभु येसु ने कहा है, ’’मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूँ’’  पिलातुस के प्रश्न का उत्तर!  सत्य तो उसके सामने खड़ा था। 

यह वह राजा हैं जो शांति का पाठ पढाता हैं।  संत योहन का सुसमाचार पिलातुस के प्रसंग को प्रस्तुत करता है जहाँ पिलातुत दर्पण में तो देखता है परन्तु उसे कुछ दिखाई नहीं देता।  पिलातुस प्रभु येसु से प्रश्न करता है और अनुमान लगाने की कोशिश करता है कि यह मनुष्य जो उसके सामने खड़ा है, उसके राज्य के लिये खतरा तो नहीं है।  उसके महल के बाहर गलियों में चर्चा है कि वह उसके राज्य के लिये खतरनाक है।  बाहर लोग उन्हें यहूदियों का राजा घोषित कर रहे थे, दाऊद के पुत्र कहकर पुकार रहे थे।  और पिलातुस इसका अर्थ भली-भाँति जानता था।  इसलिये पिलातुस येसु से पूछता है, ’’तो तुम राजा हो’’? 

प्रारंभिक कलीसिया सत्य को पहचानती थी और उन्हें अपना प्रभु और राजा मानती थी।  इसके खातिर उन्हें जीवन में कठिनाईयाँ और कैद झेलनी पड़ी थी।  उनकी उद्घोषणा कि येसु ख्रीस्त प्रभु हैं, को एक राजनैतिक प्रारूप दिया गया।  उन्हें प्राण दण्ड भी सहना पडा।  प्रारंभिक कलीसिया के दिनों में प्रभु येसु के राज्य को राजनैतिक दृष्टि से देखा गया।  उन दिनों यह कहना कि येसु ख्रीस्त प्रभु हैं, का अर्थ अन्य लोगों द्वारा यह लगाया गया था कि वे लोग उनके प्रभु, कैसर और उसके राज्य के विरोधी हैं।  यह घोषणा कैसर के विरुद्ध विद्रोह करने का दुःसाहस माना जाता था।

परन्तु, आज हम प्रभु येसु को स्वतंत्रतापूर्वक अपना राजा और प्रभु घोषित कर सकते हैं।  हमारे लिये वे राजा हैं जो अपने दुःखभोग और क्रूस द्वारा शांति का सबक देते हैं।  हमारे ख्रीस्त राजा ने विजयी होने के लिये सरकार, सैनिकों या शस्त्रों को हासिल नहीं किया बल्कि उन्होंने मृत्यु और पाप को परास्त किया है।  क्रूस पर बहाये रक्त से हमें उनकी शांति मिलती है।  पाप और मृत्यु पर उनकी विजय हमें जीवन की भीषण परिस्थितियों में भी शांति देती है।  कलोसियों के नाम पत्र में संत पौलुस ने क्रूस पर बहाये रक्त से शांति मिलने की चर्चा की है।  वे लिखते हैं कि ख्रीस्त का दुखभोग और मृत्यु, हमारे दुखभोग और मृत्यु को नया अर्थ, नया मूल्य और महत्व देता है।  हमें मालूम है कि उन्होंने जो कुछ सहा, उसके कारण हम हमारे जीवन की परीक्षाओं में अकेले नहीं हैं।  उन्होंने हमारी अगुवाई की है और राह दिखायी है, साथ ही हमारे जीवन के कठिन मार्ग में वे हमारे साथ रहते हैं।  यही है ख्रीस्त राजा का चमत्कारिक रूप।  ख्रीस्त राजा की शांति, उनका अनुसरण, कष्ट सहन, पीडा और कभी-कभी मृत्यु द्वारा प्राप्त होती है।  पिता ईश्वर के रहस्यपूर्ण शांति का वरदान हमारे प्रभु येसु के द्वारा हमारे जीवन की छोटी-बड़ी मुश्किलों में तथा मृत्यु के समय भी प्राप्त होता रहता है।

यह वह राजा हैं जो स्वतंत्रता का पाठ पढाता है।  प्रभु येसु कहते हैं, ’’सत्य तुम्हें स्वतंत्र बना देगा’’  सत्य की अनुभूति हमें सचमुच स्वतंत्र बना देती है।  यह हमें ईश्वर का प्रेम पाने के लिये स्वतंत्र बना देती है।  सत्य एक कृपा है।  ईश्वरीय कृपा ही सत्य है, यह एक रहस्य है।  एक बेशकीमती मोती है, एक खोया हुआ सिक्का है जिसके मिलने पर आनंद मनाया जाता है।  यह कृपा हमें दूसरों को भाई-बहन के रूप में प्यार करने की शक्ति देती है।  यह कृपा हमें प्रत्येक सृष्टि में ईश्वर का अनुभव कराती है।  यह कृपा हमें दर्पण में अपने आपको देखने की कृपा देती है कि हम जैसे हैं वैसे ही ईश्वर हमें प्यार करते हंै।  ख्रीस्त राजा हैं, सचमुच ख्रीस्त राजा हैं जो सत्य के द्वारा हमें स्वतंत्र बनाते हैं।  संत पौलुस के कुरिन्थियों के नाम पत्र 3:17 के अनुसार ईश्वर आत्मा है, जहाँ ईश्वर का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।

मैं यह विश्वास करता हूँ कि ख्रीस्त राजा मेरा वह प्रभु है जो मुझे स्वतंत्रता प्रदान करता है।  जब मैं कहता हूँ कि येसु ख्रीस्त प्रभु है तब मैं अपनी भक्ति और सम्मान पुनर्जीवित ख्रीस्त को देता हूँ।  मैं एक बेहतर प्रेरित के रूप में अपने को समर्पित करता हूँ।  यही वह स्वतंत्रता है जिसके लिये ख्रीस्त प्रभु मुझे प्रेरित करते हैं।  वे उदाहरण देकर मेरा मार्गदर्शन करते हैं।  मैं ख्रीस्त को प्रभु कहता हूँ क्योंकि ख्रीस्त मुझसे पहले वहाँ जाते हैं जहाँ मुझे जाना है।  जिस मार्ग पर मुझे चलना है उसपर वह मुझसे पहले चले हैं।  जब मैं ख्रीस्त प्रभु के पीछे-पीछे जाता हूँ, उनका प्रभुत्व धीरे-धीरे मेरे लिये और स्पष्ट होता जाता है, जैसे संत पौलुस कुरिंथियों को लिखे अपने पहले पत्र 13:12 में कहते हैं- ’’अभी तो हमें दर्पण में धुँधला दीख पड़ता है, परन्तु तब हम आमने-सामने देखेंगे।  अभी जो कुछ मैं देखता हूँ वह अपूर्ण है, लेकिन तब जब पूर्णता आ जायेगी, तो जो कुछ अपूर्ण है व पूर्ण हो जायेगा।’’  राजा राजेश्वर ख्रीस्त राजा की जय।

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