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Sunday Homilies - December 02, 2012
आगमन का पहला इतवार
By फादर फ्रांसिस स्करिया

01. आगमन का पहला इतवार

यिरमियाह 33:14-16; 1 थेसलनीकियों 3:12-4:2; लूकस 21:25-28, 34-36

(फादर फ्रांसिस स्करिया)

आगमन प्रतीक्षा का समय है।  आज हम आगमन काल में प्रवेश कर रहे हैं।  नबी येरेमियस के समय यहूदियों पर बहुत अत्याचार किया जाता था।  अत्याचार ने उनमें विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं उत्पन्न की।  कई लोग निराश हो गये।  नबी उनको आश्वासन देते हुए कहते हैं कि ईश्वर एक दिन मसीह के द्वारा उनके लिए पुनः न्याय की स्थापना करेंगे।  तब लोग मानने लगेंगे कि प्रभु ही हमारा न्याय है  हमारे बीच में भी अत्याचार सहने वाले बहुत हैं।  विभिन्न प्रकार से और मात्रा में लोग अत्याचार सहते हैं।  किसी अत्याचार का फल चाय में चीनी की कमी के समान है तो किसी का जीवन ही अत्याचार से बर्बाद हो गया है।  प्रभु ही अत्याचार सहनेवालों के लिए न्याय हैं।

सन् 2005 में अखबारों में एक खबर बहुत दिनों तक सुर्खियों में थी।  एक लड़की के साथ उसके ससुर ने बलात्कार किया।  समाचार पत्रों में विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं प्रकट की गई थी।  किसी ने कहा यह बहुत बुरा हुआ, इसके लिए कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए  ससुर के बचाव में भी कुछ लोग आगे आये थे।  इस प्रकार की खबरों की संख्या में आज भी कमी नही है।  ऐसे अत्याचारों के सामने साधारण जनता क्या करती है?  कुछ लोग हताश हो जाते हैं।  कुछ लोग नफ़रत और बदले की भावना लिये जलते हैं।  कुछ लोग इसकी चिन्ता नही करते हैं क्योंकि यह दूसरों की समस्या है, उनकी नही।

हम, जो प्रभु का सन्देश लोगों को सुनाना चाहते हैं, अत्याचार सहनेवालों के प्रति क्या दृष्टिकोण अपनाते हैं? प्रभु का न्याय उनतक पहुँचाने में हमें कोई कसर नही छोड़ना चाहिए। 

आगमन तैयारी का भी समय है।  यह तैयारी हम भ्रातृप्रेम द्वारा कर सकते हैं।  ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए हमें एक दूसरे को प्यार करना चाहिए।  भ्रातृप्रेम में आगे बढ़ने के लिए हमें दो चीज़ों की ज़रूरत है - ईश्वर की आशिष और हमारा कठिन परिश्रम।

सुसमाचार हमें समझाता है कि जागरूकता और प्रार्थना आगमन की तैयारी के दो अंग हैं।  ईश्वर अपने राज्य की स्थापना करना चाहते हैं।  लेकिन जिस दुनिया में हम सचमुच रह रहे हैं उसमें यह काम आसानी से नही हो पायेगा।  कल्पना कीजिए एक ऐसे मकान की जो बहुत पुराना हो और सालों से उसमें कोई नहीं रहता हो।  उसकी दीवालें टूट रही हैं, खिड़की दरवाजे़ सड़ गये हैं।  आवारा जानवर आराम से उसके अन्दर बाहर घूम रहे हैं।  कई लोग उसमें कचरा भी फेंक रहे हैं।  उस जगह पर एक नया मकान खड़ा करने के लिए हमें पहले उस जर्जर मकान को गिराना, कचड़ा साफ करना, प्रदूषित वातावरण को स्वच्छ बनाना होगा।  हमारी भी यही दशा हो सकती है।  स्वर्गराज्य की स्थापना हेतु हमें अपनी जिन्दगी की पुरानी और जर्जर इमारतों को गिराना होगा।  हमारे मन और हृदय को स्वच्छ बनाना होगा।  बुराइयों की बदबू को हमसे दूर भगाना होगा।  इसमें हमें जागरूकता और परिश्रम की ज़रूरत हैं।  आइए हम ईश्वर से कृपा माँगे कि वे हमें इस कार्य में मदद करें।  साथ ही साथ हम यह दृढ़संकल्प भी करें कि बुराई को दूर भगाने तथा ईश्वर के न्याय का स्वागत करने में हम कोई कसर नहीं छोडेंगे। 

कुछ दिन पहले मैंने समाचार पत्र में पढ़ा कि जर्मनी में एक सात मंजिला इमारत को इसलिए गिरा दिया गया कि विशेषज्ञों के अनुसार उसके निर्माणकार्य में बड़ी लापरवाही बरती गयी थी। सरकार इसी जगह पर एक 20 मंजिला इमारत खड़ी करेगी।  शायद हमारी व्यक्तिगत जीवनरूपी इमारत में भी कुछ कमियाँ होंगी, कुछ लापरवाही बरती गयी होगी।  यही समय है उसे गिराकर एक नई इमारत बनाने का, एक नया जीवन शुरू करने का।

पहले हम यह सोचते हुए बहुत चिंतित हुआ करते थे कि यूरोपीय देशों में बहुत ही कम लोग धार्मिक कार्यों में भाग ले रहे थे।  आज यह बीमारी हमारे बीच में भी फैल रही है।  आप और मैं इस बीमारी के शिकार हो सकते हैं।  इसलिए हमें भी सतर्क रहना चाहिए और साथ ही साथ प्रार्थना भी करनी चाहिए।  मान लीजिए कि हमारे देश की फौज दुश्मन के क्षेत्र में काफी अंदर पहुँच गयी हैं और उनकी बन्दूकों में कारतूस नहीं है, तो क्या होगा?  दुश्मन की सेना हमारे सैनिकों को आसानी से हराकर उन्हें बंदी बना लेगी। शायद आज हमारी परिस्थिति भी इससे भिन्न नहीं है।  हमारा विश्वास इतना पक्का नहीं है कि हम प्रलोभनों पर आसानी से विजय पा सकें।  हमारे पास प्रार्थनारूपी अस्त्र-शस्त्र की कमी है जिससे हम शैतानरूपी दुश्मन को भगा सकें।  आगमन का यह पहला इतवार लेखा-जोखा लेने का समय है। 

क्या आप में से किसी ने कभी इतनी निराशा का अनुभव किया है कि आपको लगा कि आगे चलना मुश्किल है, आपके सामने कोई रास्ता नही है, कोई विकल्प नहीं है?  एक शराबी व्यक्ति के बारे में सोचिए!  उसे लगता है कि वह शराब का गुलाम है और अपने परिश्रम मात्र से उससे छुटकारा नहीं पा सकता।  शराब के कारण उसकी नौकरी छूट गयी, उसकेे परिवार से उसे बिछुड़ना पड़ा और उसे लगता है कि शराब छोड़ना उसके बस की बात नही है।  वह अपने को बहुत शक्तिहीन और मज़बूर महसूस करता है।  वास्तव में इस प्रकार की शक्तिहीनता में आशा जन्म लेती है।  ऐसी स्थिति में वह ईश्वर में अपना विश्वास जगा सकता है और ईश्वर को अपने जीवन में जगह दे सकता है।  यही आशा नबी येरिमियस इस्राएलियों को दे रहे थे।  हमारे मुक्तिदाता येसु इसी अनुभव के लिए हमें बुला रहे हैं।

आईये हम आगमन काल में प्रवेश करते हुए अपने को इस अनुभव के लिये तैयार करें और अपने जीवन में नयी आशा जगायें।

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