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Sunday Homilies - April 21, 2013
पास्का का चौथा इतवार
By फादर मेलविन चुल्लिकल

इस्राएल ईश्वर की चुनी हुई प्रजा थी और शुरू से ही वह ईश्वर की छत्र-छाया में रही।  हर कदम पर ईश्वर उनका मार्गदर्षक रहा।  मि़स्र की दासता से ईश्वर ने इस्राएलियों को बचाया।  ईश्वर उन्हें रास्ता दिखाने के लिए दिन में बादल के खम्भे के रूप में और रात को उन्हें प्रका देने के लिए अग्नि-स्तम्भ के रूप में उनके आगे-आगे चलता रहा (निर्गमन 13:21)  पड़ोसी देशों के राजाओं को देखकर इस्राएलियों ने अपने लिए भी एक शासक की माँग ईश्वर के सामने रखी।  ईश्वर ने उनकी यह माँग पूरी करते हुए इस्राएलियों के राजा के रुप में साऊल को नियुक्त किया (1 समूएल 8:9)  निर्वासन के बाद इस्राएलियों के नेतृत्व का बोझ फ़रीसियों और शास्त्रियों के कंधों पर आ पड़ा।  लेकिन वे इस्राएलियों का उपयुक्त मार्गदर्शन करने में कामयाब नहीं ठहरे।  वे स्वयं गलत रास्ते पर चल रहे थे।  वे गरीबों, विधवाओं, परदेशियों और समाज के निम्न जाति के लोगों को गिरी हुई दृष्टि से देखते और उनके साथ अत्याचार और अन्याय करते थे।  वे अपने स्वार्थ-लाभ के लिए नियमों की व्याख्या अपनी ज़रूरतों के अनुसार करते थे।  उनके इस बुरे आचरण और व्यवहार के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रभु ईश्वर नबी एज़ेकिएल के ज़रिए (एज़ेकिएल 34) फटकार लगाते हैं।  जिनको समाज का मार्गदर्शन करना था] वे समाज के लिए एक बोझ बन गये।  फ़रीसियों और शास्त्रियों के इस आचरण से लोग तंग आ गये थे।  लोगों के मन में सन्देह पैदा होने लगा कि किसका अनुगमन करें और किसका नहीं।  वे अपने आप को बिना चरवाहे की भेड़ों के समान महसूस कर रहे थे।  ऐसे ही कुछ उलझे हुए लोगों से प्रभु येसु कहते हैं, ‘मैं हूँ सच्चा गड़ेरिया’’  प्रभु येसु में सच्चे गडे़रिये के सम्पूर्ण गुण थे।  उन्होंने अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये।  यही गडे़रिया आज हमें अपनी आवाज़ पहचानने और उसका अनुगमन करने के लिए बुला रहे हैं।

आज कल हम शोर गुल की दुनिया में रहते हैं।  सुबह से लेकर शाम तक हम कई प्रकार की आवाजें सुनते हैं जैसे पक्षियों की, मंदिर, मस्ज़िद और पल्लियों में प्रार्थना की, गाड़ियों, रेडियो, टी. वी., अलग अलग लोगों की आवाजें आदि।  इनमें से कुछ आवाज़ हम पहचान लेते हैं तो कुछ पहचान नहीं पाते हैं।  कोई भी आवाज़ पहचानने के लिए उसे कम से कम एक-दो बार सुनना पड़ता है।  अगर लोगों की आवाज़ है तो कभी-कभी इसे बार-बार भी सुनना पड़ता है।  अगर एक-दो साल या कई साल बाद हम फोन पर किसी की आवाज़ सुनते हैं तो शायद उसे जल्दी पकड़ नहीं पायेंगे।  जब कोई फोन पर हमारी आवाज़ पहचान या समझ लेता है तो हम कितने खुश हो जाते हैं।  हमें लगता है कि वे हमें भूले नहीं है।  किसी भी आवाज़ को पहचानने के लिए, विशेषकर लोगों की आवाज़ पहचानने के लिए दो बातें जरुरी हैं। वे हैं उनकी आवाज़ एक या दो बार सुनना और लगातार संपर्क में बने रहना।  अगर हम अपने आप को येसु की भेड़ें समझते हैं तो हमें भी इन चीज़ों पर ध्यान देना चाहिए।  हमें उनकी आवाज़ पहचानना चाहिए।  विभिन्न प्रकार के माध्यमों से ईश्वर हम से रोज़ बात करते हैं, जैसे बाइबिल द्वारा, अलग अलग लोगों  के ज़रिए, कुछ घटनाओं द्वारा, धर्म गुरुओं की बातों द्वारा आदि।  जब सांसारिक चीज़ों की आवाज़ हमारे कानों में गूँजती रहती है तो ईश्वर की आवाज़ को इनसे अलग करना हमारे लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है।  लेकिन येसु चाहते हैं कि हम उनकी भेडे़ बनें और उनकी आवाज़ पहचानें।

यह हम निसंदेह जानते हैं कि प्रभु येसु हमें पहचानते हैं।  वे हमें न केवल पहचानते हैं, परन्तु हमें अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं।  इसलिये वे हमारे प्यार के खातिर अपने जीवन की कुर्बानी देते हैं।  इस पर हमारी क्या प्रतिक्रिया है?  क्या हम प्रभु की आवाज़ को पहचानते हैं?  प्रभु हमें हर दिन आवाज़ देते रहते हैं।  जिस प्रकार एक गड़ेरिया अपनी भेड़ों को समय-समय पर अपनी आवाज़ से पथ प्रदर्षन करता है, वैसे ही प्रभु हमारा मार्गदर्षन करते हैं।  कभी-कभी हम जीवन की समस्याओं तथा चिंताओं में इतने उलझे हुए रहते हैं कि प्रभु की आवाज़ सुन नहीं पाते हैं।  ऐसा भी हो सकता है कि हम अपने जीवन में किसी विशेष व्यक्ति या व्यक्तियों को इतना महत्व देते हैं कि हम उन्हीं की आवाज़ सुनने लगते है, ईश्वर की नहीं।  कभी-कभी हमें प्रभु की आवाज़ सुनने और समझने के लिए किसी दूसरे की मदद की ज़रूरत पड़ती है।  माता-पिताओं का कर्तव्य है कि अपने बच्चों को प्रभु की आवाज़ सुनने एवं पहचानने में मदद करें।

यदा-कदा हम जीवन में इतने व्यस्त रहते हैं कि कोई दोस्त, पुरोहित या बुजुर्ग व्यक्ति की मदद से ही हम ईश्वर की आवाज़ को पहचान पाते हैं।  कभी ईश्वर की आवाज़ मीठी होती है तो कभी कड़वी, लेकिन जिस प्रकार दवाई कड़वी होती है, ईश्वर का रास्ता कठिन महसूस होता है परन्तु मुक्ति उसी में है।

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