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Sunday Homilies - May 26, 2013
पवित्र त्रित्व का त्योहार
By फ़ादर फ़्रांसिस स्करिया

आज हम पवित्र त्रित्व का त्योहार मना रहे हैं.  लेकिन अगर हम आज के पाठों में पवित्र त्रित्व के बारे में कुछ स्पष्ट शिक्षा देखना चाहते हैं, तो हम शायद निराश हो जायेंगे क्योंकि बाइबिल में हम न त्रित्व शब्द देखते हैं और न ही त्रित्व के बारे में स्पष्ट शिक्षा.  येसु की शिक्षा को समझने की कोशिष में आदिम कलीसियाई विश्वासियों को यह ज्ञात हुआ कि जिस ईश्वर की शिक्षा प्रभु येसु ने हमें दी है, उस के अनुसार ईश्वर त्रित्व हैं.

लेकिन इस त्रिएक ईश्वर को समझना कठिन है.  कहा जाता है कि एक बार त्रित्व के बारे में सोचते हुये सन्त अगस्तीन समुद्र के तट पर चल रहे थे.  रास्ते में उन्होंने एक ऎसे बालक को देखा जो रेत में एक गड्ढा बना कर उस में समुद्र का पानी एक बर्तन में लाकर डाल रहा था.  सन्त अगस्तीन ने उससे पूछा, तुम क्या कर रहे हो?  उस ने उत्तर दिया, मैं समुद्र का पानी इस गड्ढे में भर रहा हूँ.  सन्त ने उन से कहा, तुम यह कैसे सोच सकते हो कि इतने बडे सागर के पानी को तुम इस छोटे गड्ढे में डाल सकते हो?  तब उस ने कहा, और आप यह कैसे सोच सकते हैं कि आप के इस छोटे मस्तिष्क से आप ईश्वर के महान रहस्य को समझ पायेंगे.  ईश्वर रूपी महान रहस्य को समझना ईश्वर की कृपा के बिना हमारे लिये असंभव है.  हामरे प्रति अपने प्रेम के कारण ईश्वर अपने आप को हमारे लिये प्रकट करते हैं.  हमें चाहिये कि हम हृदय खोलकर इस सत्य को ग्रहण करें.

इस का हमें यह मतलब नहीं निकालना चाहिये कि हम ईश्वर का अनुभव नहीं कर सकते हैं.  जिस प्रकार हम वायु को न देखते हुये भी श्वास लेते हैं और जहाँ हमें श्वास लेने के लिये पर्याप्त वायु प्राप्त नहीं होती है, वहाँ हम परेशान होते हैं, उसी प्रकार हम दैनिक जीवन में हमारे ईश्वर का अनुभव करते हैं.  एक दिन एक बालक एक जूते-चप्पल की दुकान के सामने आँखें बन्द करके कुछ भुनभुना रहा था.  रास्ता चलती एक स्त्री ने उस से पूछा, बेटा तुम्हें क्या हो गया?  तब उस लडके ने उत्तर दिया, मैं ईश्वर से यह प्रार्थना कर रहा हूँ कि मुझे एक जोडी जूते दिला दें.  तब उस महिला ने उस से कहा, ईश्वर ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली है.  फ़िर उसने उस बालक को उसी दुकान में ले जाकर उसे एक जोडी जूते दिला दी.  इसके बाद जब वह महिला अपना रास्ता जा रही थी, तो बालक ने उस से पूछा, क्या आप ईश्वर की पत्नी हैं?  उस महिला ने मुस्कराते हुये जवाब दिया, मैं ईश्वर की पत्नी नहीं हूँ, उनकी अनेक सन्तानों में से एक हूँ.  हम कई बार दूसरों के मध्यम से ईश्वर का अनुभव करते हैं.  इसी प्रकार दूसरे लोग शायद हमारे माध्यम से ईश्वर का अनुभव करते होंगे.  ईश्वर को हम न देखते हुये भी वे हमारे साथ हैं.

भक्तजन अपने इश्वर के समान बनना चाहते हैं.  हम जिस इश्वर के भक्त हैं उनके समान बनना चाहते हैं.  हम त्रिएक इश्वर को माननेवाले हैं.  हमें उनके समान बनना चाहिये.  हमारे इश्वर की पहली विशेषता यह है कि वे व्यक्तियों का एक समुदाय हैं.  जो इस इश्वर को मानते हैं उन्हें चहिये कि वे व्यक्तिवाद से दूर होकर संबंधों से भरा समुदायिक जीवन को अपनायें, एक दूसरे के साथ मिलकर जीयें. 

आज की दुनिया में लोग अपने ही बारे में सोचते हैं, आपने स्वार्थ लाभ के लिये बहुत कुछ करते हैं.  जहाँ तीसरे व्यक्ति के लिये जगह नहीं है, वहाँ स्वार्थता अवश्य है.  आज के समुदाय में कई ऎसे पति-पत्नी हैं जो सन्तान उत्पन्न करना नहीं चाहते हैं, बच्चों को बोझ मानते हैं.  हमारे ईश्वर की यह चुनौती है कि हम स्वार्थता त्यागकर मिलकर रहना सीखें.  हमें दूसरों के लिये जगह बनाना चाहिये.  हमें दलबन्दी तथा अलगाववाद से ऊपर उठकर सबों की भलाई चाहना चाहिये.

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