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Sunday Homilies - June 02, 2013
वर्ष का नौवाँ इतवार
By जुनेडियुस टोप्पो

विधि-विवरण 5:12-15; 2 कुरिन्थियों 4:6-11; मारकुस 2:23-3:6

यहूदी लोग विश्राम दिवस का सख्ती के साथ पालन करते थे।  यहूदी लोग उत्पत्तिा ग्रंथ में दिये गये सृष्टि के विवरण के आधार पर विश्राम दिवस का पालन करते थे।  जिस प्रकार छः दिन तक सृष्टि कार्य करने के बाद साँतवे दिन प्रभु ईश्वर ने विश्राम किया उसी प्रकार इस्राएलियों से यह आशा रखी जाती थी कि वे भी विश्राम के दिन का पालन करें।  आज का पहला पाठ हमारे सामने यह भी रखता है कि विश्राम के दिन के पालन से लोगों को विश्राम करने का एक दिन हर सप्ताह में मिल जाता है।  इस्राएली लोग जो मिस्र देश में गुलाम थे यह भली-भांति जानते थे कि आराम का जीवन में क्या महत्व है।  विश्राम के दिन मालिक और नौकर, देशी और परदेशी दोनों आराम करते हैं।  विश्राम के दिन को पवित्र दिन भी माना जाता था।  यहूदियों की प्रथा के अनुसार प्रभु येसु के जीवनकाल तक शनिवार यानि सप्ताह का आखिरी दिन, विश्राम का दिन तथा पवित्र दिन माना जाता था। 

प्रभु येसु के पुनरूत्थान तथा पवित्र आत्मा के आगमन के बाद इस परंपरा में परिवर्तन आ गया।  प्रभु येसु का पुनरूत्थान सप्ताह के पहले दिन हुआ था।  इसी कारण ख्रीस्त विश्वासियों के लिए सप्ताह का पहला दिन ही महत्वपूर्ण बन गया।  उस दिन विश्वासीगण एक साथ मिलते थे, प्रेरितों की शिक्षा सुनते थे तथा प्रीति-भोज में भाग लेते थे।  यहूदी लोग शनिवार को पवित्र मानते थे तो ख्रीस्त भाई-बहन इससे हटकर इतवार को पवित्र मानने लगे।  धीरे-धीरे पूरी कलीसिया में एक नई परंपरा शुरू हो गयी।

कलीसियाई नियम के अनुसार रविवार के दिन विश्वासीगण अपनी-अपनी पल्लियों में एकत्र होते हैं तथा मिस्सा बलिदान में भक्ति-भाव से भाग लेते हैं।  प्रभु ईश्वर मनुष्य का उद्धार उसके समुदाय में ही रचते हैं।  इस्राएल तथा कलीसिया के इतिहास में हम यह देखते हैं कि प्रभु हमेशा अपनी प्रजा की रक्षा करते हैं।  जब कभी उन्होंने किसी व्यक्ति को अगुआ के रूप में चुना तब ईश्वर ने यह चयन अपनी प्रजा की भलाई को ध्यान में रखते हुए किया।  जब-जब इन नेताओं ने ईश्वर की प्रजा की भलाई को छोड़कर अन्य स्वार्थी मतलबों के लिए अपना काम किया तब-तब ईश्वर ने उनको फटकार लगायी।  ईश्वर की योजना में समुदाय का बहुत बड़ा स्थान है।  कलीसियाई समुदाय एक सामाजिक समूह होने के अतिरिक्त प्रभु येसु का शरीर भी है।  शरीर के द्वारा ही हम किसी भी व्यक्ति की उपस्थिती को पहचानते हैं।  शरीर में ही किसी की पहचान होती है।  ख्रीस्त विश्वासी अपने आप में प्रभु येसु के शरीर के अंग है।  जब इतवार के दिन ख्रीस्त विश्वासी अपनी स्थानीय कलीसिया के अन्य भाई-बहनों के साथ एकत्र होते हैं तब वे मिलकर प्रभु के शरीर को एक दृष्य रूप प्रदान करते हैं।

रविवारीय पूजन-विधि की अगुआई करने वाले पुरोहित एक तरफ रोटी और दाखरस पर आशिष की प्रार्थना पढ़कर प्रभु की आज्ञा अनुसार तथा प्रभु की कृपा से उन्हें प्रभु येसु के शरीर और रक्त में बदल देते हैं।  दूसरी तरफ वे विश्वासी भाई-बहनों को, प्रभु येसु ख्रीस्त के अंगों को एकत्र कर ख्रीस्त के दृष्य शरीर को स्थानीय कलीसियाई समुदाय में रूप लेने की प्रक्रिया में अपना योगदान प्रदान करते हैं।  इस प्रकार जो विश्वासी रविवारीय मिस्सा बलिदान में भाग लेकर प्रभु येसु के शरीर और रक्त को ग्रहण करते हैं दूसरों के साथ मिलकर प्रभु येसु के शरीर बनते भी हैं।  शायद बिरले ही कलीसिया के कई सदस्य इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को ठीक ढ़ंग से समझना चाहते है या समझ पाते हैं। 

रविवार पवित्र दिन माना जाता है।  गुलामी में रहने वालों के लिए वह स्वतंत्रता तथा आराम का दिन है।  इसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाये तो वह आध्यात्मिक स्वतंत्रता का दिन भी है।  जो आध्यात्मिक रीति से स्वतंत्र हैं, वे भले कार्य करते हैं।  इसी सच्चाई को मन में रखते हुए प्रभु पूछते हैं, ’’विश्राम के दिन भलाई करना उचित है अथवा बुराई, जान बचाना अथवा मार डालना’’? आज का सुसमाचार हमें यह कहता है कि प्रभु को सुनने वाले इस सवाल के जवाब में चुप रहें क्योंकि उन्हें मालूम था कि विश्राम का दिन भलाई करने तथा जान बचाने का दिन है न कि बुराई करने या मार डालने का।  जिस सच्चाई को वे हृदय से जानते थे उसे वे मुँह से प्रकट करना नहीं चाहते थे।  इस पर प्रभु येसु सूखे हाथ वाले मनुष्य को चंगा कर यह प्रमाणित करते हैं कि विश्राम दिवस को पवित्र रखने का मतलब अपने भले कार्य के द्वारा ईश्वरीय महिमा को प्रकट करना है।  ख्रीस्त विश्वासीगण अपने भले कार्यों के द्वारा, जैसे संत पौलुस कुरिन्थियों को लिखते हुए आज के दूसरे पाठ में कहते हैं, येसु के जीवन को उनके नष्वर शरीर में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करते हैं।  इस कारण यह उचित ही है कि ख्रीस्त विश्वासी रविवारीय आचरण को एक मिस्सा बलिदान में भाग लेने तक ही सीमित न रखकर दूसरों की भलाई तथा समुदाय के सेवा के कार्यों में लगे रहें।

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